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दो माह भी किताबों का बोझ नहीं सहन कर सके सरकारी बस्ते
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kaushambi news
- फोटो : KAUSHAMBI
मंझनपुर। परिषदीय स्कूलों में पढने वाले ज्यादातर बच्चों के बैग फट चुके हैं। बदहाल बैग की बार-बार सिलाई कराने में अभिभावक परेशान हैं। ज्यादातर अभिभावक अब अपने बच्चों की किताबें थैला में भरकर भेजने लगे हैं। खुद अभिभावक बैग की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जिले के 1410 परिषदीय स्कूलों में पढने वाले एक लाख 61 हजार 187 बच्चों को स्कूल बैग का वितरण किए जाने का दावा किया गया। सरकारी दावे के मुताबिक वितरण दो महीने पहले हो चुका है। जबकि तमाम स्कूलों में बैग कुछ दिन पहले ही बांटे गए। बैग की गुणवत्ता खराब होने के कारण वह किताबों का बोझ सहन नहीं कर पा रहे हैं। प्राथमिक स्कूल तियरा के ज्यादातर बच्चों के बैग फट चुके हैं। बैग की या तो चेन फेल हो जाती है या फिर वह कंधे के पास बार्डर से फट रहे हैं। बैग के अंदर की तरफ कपड़े में चिपटी पॉलीथिन की परत भी पपड़ी बनकर निकल रही है। उधर जिले की आठों बीआरसी की पड़ताल किया जाए तो शिक्षा विभाग के अंदर चल रहे बड़े खेल का खुलासा हो सकता है। दरअसल जिस मकसद से बीआरसी की स्थापना की गई है वह असल में विभाग का स्टोर बन कर रह गई है। पंजीकरण के सापेक्ष स्कूलों में 50 फीसदी से कम बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। इन्हीं बच्चों को बैग बांटा गया है। बाकी के बचे बैग को अगले शैक्षिक सत्र में खपाने के लिए बीआरसी में छिपाकर रखा गया है।
ठेकेदार से होती है सेटिंग
मंझनपुर। शिक्षा विभाग के सूत्रों की माने तो शैक्षिक सत्र की शुरुआत में बच्चों का शत-प्रतिशत पंजीकरण कराने का दबाव रहता है। इसी वजह से अध्यापक गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालकों से जानकारी लेकर पांच साल से ज्यादा उम्र वाले बच्चों का फर्जी तरीके से अपने यहां दाखिला दिखा देते हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते होते हैं। विभाग के अफसर भी सब जानकर भी अंजान बने रहते हैं। इससे विभागीय अफसरों को दोहरा फायदा होता है। एक तरह पंजीकरण करने में अव्वल आना दूसरी तरफ किताब, मोजा-जूता, बैग, एमडीएम आदि में पैसा बचना।
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एमडीएम से मेल नहीं खाती हाजिरी
मंझनपुर। जिले के स्कूलों में हाजिरी रजिस्टर की हकीकत एमडीएम से परे रहती है। स्कूलों में बच्चों की संख्या भले ही कम रहे लेकिन स्कूल बंद होने के दौरान एमडीएम में बच्चों की संख्या ज्यादा दिखा दी जाती है।
शासन स्तर से बैग का टेंडर हुआ है। स्थानीय स्तर पर कुछ नहीं हुआ। खंड शिक्षाधिकारियों ने बैग वितरण कराया भी है। फिलहाल गुणवत्ता को लेकर कहीं से शिकायत नहीं आई है।
स्वराज भूषण, प्रभारी बीएसए
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जिले के 1410 परिषदीय स्कूलों में पढने वाले एक लाख 61 हजार 187 बच्चों को स्कूल बैग का वितरण किए जाने का दावा किया गया। सरकारी दावे के मुताबिक वितरण दो महीने पहले हो चुका है। जबकि तमाम स्कूलों में बैग कुछ दिन पहले ही बांटे गए। बैग की गुणवत्ता खराब होने के कारण वह किताबों का बोझ सहन नहीं कर पा रहे हैं। प्राथमिक स्कूल तियरा के ज्यादातर बच्चों के बैग फट चुके हैं। बैग की या तो चेन फेल हो जाती है या फिर वह कंधे के पास बार्डर से फट रहे हैं। बैग के अंदर की तरफ कपड़े में चिपटी पॉलीथिन की परत भी पपड़ी बनकर निकल रही है। उधर जिले की आठों बीआरसी की पड़ताल किया जाए तो शिक्षा विभाग के अंदर चल रहे बड़े खेल का खुलासा हो सकता है। दरअसल जिस मकसद से बीआरसी की स्थापना की गई है वह असल में विभाग का स्टोर बन कर रह गई है। पंजीकरण के सापेक्ष स्कूलों में 50 फीसदी से कम बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। इन्हीं बच्चों को बैग बांटा गया है। बाकी के बचे बैग को अगले शैक्षिक सत्र में खपाने के लिए बीआरसी में छिपाकर रखा गया है।
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ठेकेदार से होती है सेटिंग
मंझनपुर। शिक्षा विभाग के सूत्रों की माने तो शैक्षिक सत्र की शुरुआत में बच्चों का शत-प्रतिशत पंजीकरण कराने का दबाव रहता है। इसी वजह से अध्यापक गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालकों से जानकारी लेकर पांच साल से ज्यादा उम्र वाले बच्चों का फर्जी तरीके से अपने यहां दाखिला दिखा देते हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते होते हैं। विभाग के अफसर भी सब जानकर भी अंजान बने रहते हैं। इससे विभागीय अफसरों को दोहरा फायदा होता है। एक तरह पंजीकरण करने में अव्वल आना दूसरी तरफ किताब, मोजा-जूता, बैग, एमडीएम आदि में पैसा बचना।
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एमडीएम से मेल नहीं खाती हाजिरी
मंझनपुर। जिले के स्कूलों में हाजिरी रजिस्टर की हकीकत एमडीएम से परे रहती है। स्कूलों में बच्चों की संख्या भले ही कम रहे लेकिन स्कूल बंद होने के दौरान एमडीएम में बच्चों की संख्या ज्यादा दिखा दी जाती है।
शासन स्तर से बैग का टेंडर हुआ है। स्थानीय स्तर पर कुछ नहीं हुआ। खंड शिक्षाधिकारियों ने बैग वितरण कराया भी है। फिलहाल गुणवत्ता को लेकर कहीं से शिकायत नहीं आई है।
स्वराज भूषण, प्रभारी बीएसए