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Kaushambi News: सरस्वती नदी में छह स्थानों पर शुरू होगा भूजल पुनर्भरण
Fri, 29 May 2026 12:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Fri, 29 May 2026 12:00 AM IST
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नमामि गंगे परियोजना के तहत सूखी सरस्वती नदी को पुनर्जीवित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। वैज्ञानिकों ने कौशाम्बी सहित छह स्थानों को चिह्नित कर मैनेज्ड एक्वीफर रिचार्ज (एमएआर) योजना पर काम शुरू कर दिया है।
इस परियोजना के जरिये गंगा और यमुना नदी की प्राकृतिक कनेक्टिविटी का उपयोग कर भूमिगत जलभृतों को पुनर्भरित किया जाएगा। भूजल स्तर की निगरानी के लिए ऑटोमैटिक वाटर लेवल इंडिकेटर्स लगाए जाएंगे, जिनसे रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी।
राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुभाष चंद्रा के अनुसार वर्ष 2018 में डेनमार्क के स्काईटेम इलेक्ट्रोमैग्नेटिक उपकरण की मदद से प्रयागराज के संगम क्षेत्र से कौशाम्बी के सरायअकिल तक हेलीबोर्न ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वेक्षण कराया गया था। इसमें जमीन के भीतर मौजूद प्राचीन जलधाराओं का अध्ययन किया गया।
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इसके बाद वर्ष 2021 में कौशाम्बी से कानपुर के बिल्हौर और गजनेर तक करीब आठ हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत खोज अभियान चलाया गया। रिपोर्ट में 15 से 50 मीटर गहराई के बीच फतेहपुर के खागा क्षेत्र के पास पश्चिम दिशा में दबी सरस्वती नदी की दो मजबूत शाखाओं के साक्ष्य मिले। यह धारा 10 से 15 मीटर मोटी जलोढ़ मिट्टी की परत के नीचे पाई गई।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी एक शाखा चार से छह किलोमीटर चौड़ी होकर कानपुर के बिल्हौर तक जाती है, जबकि दूसरी शाखा करीब 160 किलोमीटर दूर गजनेर तक पहुंचती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि यह नदी कभी विशाल जल भंडार का प्रमुख स्रोत रही होगी। अब गंगा और यमुना से प्राकृतिक रूप से जुड़े पेलियो चैनलों के माध्यम से कौशाम्बी के शमशाबाद सहित छह स्थलों पर पायलट परियोजना के तहत मैनेज्ड एक्वीफर रिचार्ज की संरचनाएं विकसित की जा रही हैं।
इस योजना से कौशाम्बी, फतेहपुर और कानपुर जनपदों में भूजल संकट कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि परियोजना की लागत को लेकर अभी कोई सार्वजनिक जानकारी साझा नहीं की गई है। संवाद
क्या है एमएआर तकनीक
प्रबंधित भूजलभृत पुनर्भरण (एमएआर) जल संरक्षण की आधुनिक तकनीक है, जिसमें बारिश और नदियों के पानी को नियंत्रित तरीके से भूमिगत जलभृतों तक पहुंचाया जाता है। इसके लिए पेलियो चैनल और इंजेक्शन कुओं का उपयोग किया जाता है। पेलियो चैनलों से पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है, जबकि इंजेक्शन कुओं के जरिए छना हुआ पानी गहराई तक पहुंचाया जाता है। इससे भूजल स्तर बढ़ाने के साथ भविष्य के लिए जल भंडारण सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
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इस परियोजना के जरिये गंगा और यमुना नदी की प्राकृतिक कनेक्टिविटी का उपयोग कर भूमिगत जलभृतों को पुनर्भरित किया जाएगा। भूजल स्तर की निगरानी के लिए ऑटोमैटिक वाटर लेवल इंडिकेटर्स लगाए जाएंगे, जिनसे रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी।
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राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुभाष चंद्रा के अनुसार वर्ष 2018 में डेनमार्क के स्काईटेम इलेक्ट्रोमैग्नेटिक उपकरण की मदद से प्रयागराज के संगम क्षेत्र से कौशाम्बी के सरायअकिल तक हेलीबोर्न ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वेक्षण कराया गया था। इसमें जमीन के भीतर मौजूद प्राचीन जलधाराओं का अध्ययन किया गया।
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इसके बाद वर्ष 2021 में कौशाम्बी से कानपुर के बिल्हौर और गजनेर तक करीब आठ हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत खोज अभियान चलाया गया। रिपोर्ट में 15 से 50 मीटर गहराई के बीच फतेहपुर के खागा क्षेत्र के पास पश्चिम दिशा में दबी सरस्वती नदी की दो मजबूत शाखाओं के साक्ष्य मिले। यह धारा 10 से 15 मीटर मोटी जलोढ़ मिट्टी की परत के नीचे पाई गई।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी एक शाखा चार से छह किलोमीटर चौड़ी होकर कानपुर के बिल्हौर तक जाती है, जबकि दूसरी शाखा करीब 160 किलोमीटर दूर गजनेर तक पहुंचती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि यह नदी कभी विशाल जल भंडार का प्रमुख स्रोत रही होगी। अब गंगा और यमुना से प्राकृतिक रूप से जुड़े पेलियो चैनलों के माध्यम से कौशाम्बी के शमशाबाद सहित छह स्थलों पर पायलट परियोजना के तहत मैनेज्ड एक्वीफर रिचार्ज की संरचनाएं विकसित की जा रही हैं।
इस योजना से कौशाम्बी, फतेहपुर और कानपुर जनपदों में भूजल संकट कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि परियोजना की लागत को लेकर अभी कोई सार्वजनिक जानकारी साझा नहीं की गई है। संवाद
क्या है एमएआर तकनीक
प्रबंधित भूजलभृत पुनर्भरण (एमएआर) जल संरक्षण की आधुनिक तकनीक है, जिसमें बारिश और नदियों के पानी को नियंत्रित तरीके से भूमिगत जलभृतों तक पहुंचाया जाता है। इसके लिए पेलियो चैनल और इंजेक्शन कुओं का उपयोग किया जाता है। पेलियो चैनलों से पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है, जबकि इंजेक्शन कुओं के जरिए छना हुआ पानी गहराई तक पहुंचाया जाता है। इससे भूजल स्तर बढ़ाने के साथ भविष्य के लिए जल भंडारण सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।