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कृषि कानूनों की वापसी पर खुशी से झूमे किसान, बांटीं मिठाईंयां

Sat, 20 Nov 2021 12:30 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 20 Nov 2021 12:30 AM IST
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Farmers jumped with joy on the return of agricultural laws, distributed sweets
Farmers jumped with joy on the return of agricultural laws, distributed sweets - फोटो : KAUSHAMBI
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषण के बाद किसान खुश हैं। नेताओं ने इसे किसानों के संघर्षों का नतीजा और सरकार की हार बताया साथ ही कहा कि यह किसानों के आंदोलन का नतीजा है। शुक्रवार की सुबह जब प्रधानमंत्री मोदी ने अपना इसकी घोषणा की तो किसान खुशी से झूम उठे। खुशी जाहिर करते हुए किसानों ने इस फैसले का स्वागत किया और एक दूसरे को मिठाई खिलाई।
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शुक्रवार को मंझनपुर स्थित भारतीय किसान यूनियन कार्यालय पर जिलाध्यक्ष नूरूल इस्लाम की अगुवाई में पदाधिकारियों ने एकत्र होकर एक-दूसरे को लड्डू खिलाकर खुशी जाहिर की। जिलाध्यक्ष ने कहा कि यह जीत देश के गरीबों, किसानों, मजदूरों के संघर्ष का नतीजा है।
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इस मौके पर सिद्घशरण गुप्ता, गणेश प्रसाद, अलोपी, रणविजय, रमाकांत, बच्चालाल, सूर्यभान यादव, नमो मिश्रा, सर्फराज अहमद मुन्नीलाल आदि मौजूद रहे। समर्थ किसान पार्टी के मुखिया अजय सोनी के उदिहिन स्थित आवास पर जुटे कार्यकर्ताओं ने तीन कृषि कानून वापस होने पर एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी का इजहार किया।
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इस मौके पर राम नरेश मौर्य, डॉ. शिव प्रसाद वर्मा, जय सिंह यादव, मुन्ना लाल दिवाकर, झंडुल लोधी, विपिन पांडेय, राम प्रसाद मौर्य, राम सुमेर सोनी, अर्जुन सिंह पटेल, बच्चा लाल गौतम, जुम्मन अली, सुबराती मियां आदि मौजूद रहे। इसी तरह भाकियू के चायल तहसील अध्यक्ष चंदू तिवारी की अगुवाई में इकट्ठा हुए किसानों ने खुशी जाहिर करते हुए मिठाईंयां बांटीं।
किसानों के प्रदर्शन के सामने आखिरकार सरकार ने हार मान ली। कृषि कानून वापसी की घोषणा सराहनीय है। लेकिन केवल इससे काम चलने वाला नहीं है। आंदोलन तब तक वापस नहीं होगा, जब तक तीनों कृषि कानून संसद में रद्द नहीं होते। हम उस दिन का इंतजार करेंगे।
नूरुल इस्लाम, जिलाध्यक्ष-भाकियू
देश के करोड़ों किसानों के जीवन को नर्क बना देने वाले काले कृषि कानूनों की केंद्र सरकार द्वारा वापसी निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है। हमारा मानना है कि इन तीनों कृषि कानूनों की वापसी के साथ ही देश के किसानों को असली आजादी हासिल हुई है और अब से आगे देश का किसान आत्मनिर्भर महसूस करेगा।
अजय सोनी-राष्ट्रीय अध्यक्ष,समर्थ किसान पार्टी
सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि देश की जनता प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद दे रही है। किसानों के आगे भाजपा सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। सरकार ने अपना फैसला वापस लेकर क्षमा मांगते हुए सभी देशवासियों का दिल भी जीत लिया है।
चंदू तिवारी-किसान, तहसील अध्यक्ष भाकियू
किसानों की प्रतिक्रिया भांप कर सरकार ने कृषि कानून वापस लिया है। निश्चित ही इससे किसानों की जीत हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैसला है स्वागत योग्य है। इसमें किसानों की जीत के साथ साथ प्रधानमंत्री ने सौ करोड़ देशवासियों का भी दिल जीता है।
समुंदर सिंह पटेल-किसान नेता, मूरतगंज
बोले राजनीतिक दलों के नेता, चुनाव में हार के डर से मोदी सरकार ने वापस लिए कानून
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करते हुए आंदोलन कर रहे किसानों से घर वापस लौटने की अपील की है। इस एलान के बाद राजनीतिक दलों ने अलग-अलग प्रतिक्रिया दी की है। सपा, कांग्रेस, बसपा ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष अरुण विद्यार्थी ने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के डर से प्रधानमंत्री को अचानक सच्चाई समझ में आने लगी। यह देश किसानों का है, किसान ही इस देश के सच्चे रखवाले हैं और कोई सरकार किसानों के हित को कुचलकर इस देश को नहीं चला सकती है।
सपा जिलाध्यक्ष दयाशंकर यादव ने कहा कि सरकार भूमि अधिग्रहण व काले क़ानूनों से ग़रीबों-किसानों को ठगना चाह रही थी। लेकिन सपा की पूर्वांचल विजय यात्रा में उमड़े हुजूम से डरकर प्रधानमंत्री को काले-कानून वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। सरकार बताए सैंकड़ों किसानों की मौत के दोषियों को सजा कब मिलेगी।
बसपा जिलाध्यक्ष संतोष कुमार गौतम ने कहा कि कृषि कानूनों को रद्द करने का फैसला सरकार को काफी पहले ले लेना चाहिए था। आंदोलन के दौरान जिन किसानों की मौत हुई है, सरकार उन्हें आर्थिक मदद दे। उनके परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए। अपना दल कमेरावादी के प्रदेश प्रवक्ता विनोद कसेरा ने कहा कि अन्नदाताओं के सत्याग्रह के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानून को वापस लिया है, जो किसानों के संघर्ष की विजय है।

भाजपा सरकार सूबे में विधान सभा चुनाव में हार की आशंका के मद्देनजर यह कानून वापस लिया है। इन कानूनों के द्वारा किसानों को पूंजीपतियों के हाथ में बेचने की तैयारी थी, जिसे किसानों के 12 महीने चले सत्याग्रह ने सफल नहीं होने दिया।
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