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अब ढोलक के थाप पर नही सुनाई देती फगुआ की गूंज

Fri, 04 Mar 2022 12:50 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Fri, 04 Mar 2022 12:50 AM IST
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Fagua's echo is no longer heard on the beat of the dholak
करारी। वक्त के साथ होली के त्योहार मनाने के तौर तरीकों में काफी बदलाव आया है। गांव में रघुवीर अब भी होली खेलते हैं, लेकिन फागुन में बाबा देवर नहीं लगते। अब यहां भी विश्वास का संकट है। अब मिलकर मनाया जाने वाला त्योहार अब मात्र औपचारिकता बन कर रह गया है।
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वसंतपंचमी से होली के बाद तक लगभग पौने दो महीने चलने वाला त्योहार धीरे-धीरे पुरानी पहचान खोता जा रहा है। एक जमाना था जब वसंत पंचमी के बाद ही जन-जन के कानों में होली का मधुर गीत गूंजने लगता था। गांव हो या नगर जगह-जगह लोगों की मंडली शाम होते ही लग जाती थी। देर रात तक होली के गीत कानों में गूंजते थे। लेकिन वह दिन अब यादों में सिमट कर रह गए। वक्त गुजरने के साथ ही अब होली का रंग भी बदल गया है। फागुन के महीना में रिश्तों का ताना-बाना हंसी-मजाक और छेड़छाड़ पूरे उभार पर होता था। हर कोई मर्यादाओं से बेपरवाह होता था। फागुन के इसी महीने में बाबा देवर लगने लगते थे। कोई किसी की बात का बुरा भी नहीं मानता था। बड़ी से बड़ी बात कहकहे में उड़ा दी जाती थी।
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हर घर में कम से कम एक आदमी होता था गवइया
करारी। गांव के कम से कम हर घर में एक होली का गवइया जरूर होता था। जो रात रात भर फगुआ, बेलवइया, धमार, चौताल गाकर इलाका गुंजा देते थे। इन गवइयों को आदर के साथ बुलाया जाता था।
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भांग-ठंडई का बढ़ जाता था महत्व
करारी। फागुन में मौसम में भांग व ठंडई का महत्व बढ़ जाता था। ज्यादातर मनिंदों के दरवाजे पर दरवाजे पर सुबह से ही सिलबट्टे में भांग घोटने वाले पहुंच जाते थे। गुवारा के डॉ. सुभाष विश्वकर्मा का कहना है कि पहले फागुन लगते ही रोज गांव के किसी मानिंद के यहां फगुवा की चौपाल बैठती थी। सभी उसमें शामिल होकर ठंडई भांग के दौर के साथ झूमते थे। अब गांव की भी होली बंटी नजर आती है।

गुरुकुल आश्रम में शिक्षा एवं योग का अभ्यास करने वाले शिष्यों को गुरुजन चैत्र मास के प्रथम दिन प्राकृतिक फूलों के रसों से स्नान कराकर उन्हें पूर्णतया प्राकृतिक बना देते थे। कालांतर में फूलों का स्थान रंगों ने ले लिया। परन्तु उद्देश्य वही रहा। इस पर्व पर लोग पुरानी दुश्मनी भुलाकर एक-दूसरे के गले मिलते थे।
पं. ज्ञानेंद्र शास्त्री-पूर्व प्राचार्य, हुबलाल संस्कृत महाविद्यालय भरवारी
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