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Kaushambi News: वीबी-जी राम जी को लेकर श्रमिकों में असमंजस
Mon, 29 Dec 2025 01:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Mon, 29 Dec 2025 01:41 AM IST
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शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल
केंद्र सरकार की ओर से लागू किए गए वीबी-जी राम जी (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण) ने मनरेगा की जगह ले ली है। नए कानून में जहां कुछ सकारात्मक प्रावधान जोड़े गए हैं, वहीं मांग आधारित रोजगार व्यवस्था खत्म होने से श्रमिकों और मनरेगा से जुड़े श्रमिकों में असमंजस की स्थिति है।
वीबी-जी राम जी के तहत रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए गए हैं और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है। साथ ही फसल की बोआई और कटाई के सीजन में 60 दिनों तक कार्य रोकने की व्यवस्था भी जोड़ी गई है। सरकार का दावा है कि इससे मजदूर आसानी से उपलब्ध होंगे और ग्रामीण अवसंरचना व जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, मनरेगा से जुड़े श्रमिकों, रोजगार सेवकों, अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारियों और प्रधानों का कहना है कि नए कानून में रोजगार अब मांग आधारित नहीं रहेगा। कार्य पूर्व-अनुमोदित योजनाओं और निर्धारित बजट पर निर्भर होगा। बजट से अधिक काम की मांग पर राज्यों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, जिससे कई राज्यों में रोजगार सीमित होने की आशंका है।
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कर्मियों का यह भी कहना है कि फंड शेयरिंग में बदलाव से राज्यों पर 40 फीसदी बोझ आएगा। राज्य सरकार के नियम अभी जारी न होने से स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है, जिससे ग्रामीण रोजगार व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
मनरेगा योजना में काम की मांग पर असीमित धनराशि की व्यवस्था थी। जबकि वीबी-जी राम जी योजना में कार्ययोजना के आधार पर केंद्र से 60 और राज्यों से 40 प्रतिशत धनराशि की व्यवस्था की गई है। राज्य सरकारों पर पहले से ही अन्य विभागों का अतिरिक्त बोझ है। ऐसे में श्रम और सामग्री मद के भुगतान में राज्य सरकार के देने पर प्रधानों में संशय बना हुआ है। -मैदान सिंह, अध्यक्ष, प्रधान संघ चायल
किसानी के समय और प्रतिकूल समय में मनरेगा योजना से मांगने पर काम मिल जाता था। काम नहीं मिलने पर श्रमिक बेरोजगारी भत्ते का हकदार होता था। नई व्यवस्था में ग्राम पंचायत की कार्य योजना का बजट पूर्ण होने पर काम नहीं मिलने की दशा में बेरोजगारी भत्ता कौन देगा? ऐसी स्थिति में श्रमिकों को काम की तलाश में पलायन करना पड़ेगा। -राजेंद्र कुमार, मनरेगा श्रमिक
प्रशासनिक मद छह प्रतिशत से नौ प्रतिशत कर दिया गया है, लेकिन नए कानून में खेती की कटाई के समय 60 दिन योजना बंद रहेगी। दो माह प्रशासनिक मद भी नहीं बनेगा। ऐसी स्थिति में रोजगार सेवकों, एपीओ, तकनीकी सहायकों और कंप्यूटर ऑपरेटर का दो माह के मानदेय का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। -शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल।
सरकार ने नए कानून में मनरेगा जैसी मांग आधारित रोजगार गारंटी को समाप्त कर दी है। जब श्रमिक की मांग पर काम ही नहीं मिलेगा तो गारंटी शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। बजट को सीमित कर यह श्रमिक विरोधी कानून है। विपक्ष के रूप में हम इस कानून का पुरजोर विरोध करते हैं और मांग करते हैं कि मनरेगा योजना बहाल किया जाए। -पुष्पेंद्र सरोज, सांसद
भारत सरकार से जारी वीबी-जी राम जी एक्ट में मनरेगा के सभी प्रावधान हैं। रही बात राज्य सरकार से धन आवंटन की तो वह शासन का मामला है। फिलहाल अभी एक्ट पास हुआ है, योजना लागू होने पर चीजें स्पष्ट हो जाएंगी। -मनोज कुमार वर्मा, डीसी, मनरेगा
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वीबी-जी राम जी के तहत रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए गए हैं और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है। साथ ही फसल की बोआई और कटाई के सीजन में 60 दिनों तक कार्य रोकने की व्यवस्था भी जोड़ी गई है। सरकार का दावा है कि इससे मजदूर आसानी से उपलब्ध होंगे और ग्रामीण अवसंरचना व जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
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हालांकि, मनरेगा से जुड़े श्रमिकों, रोजगार सेवकों, अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारियों और प्रधानों का कहना है कि नए कानून में रोजगार अब मांग आधारित नहीं रहेगा। कार्य पूर्व-अनुमोदित योजनाओं और निर्धारित बजट पर निर्भर होगा। बजट से अधिक काम की मांग पर राज्यों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, जिससे कई राज्यों में रोजगार सीमित होने की आशंका है।
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कर्मियों का यह भी कहना है कि फंड शेयरिंग में बदलाव से राज्यों पर 40 फीसदी बोझ आएगा। राज्य सरकार के नियम अभी जारी न होने से स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है, जिससे ग्रामीण रोजगार व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
मनरेगा योजना में काम की मांग पर असीमित धनराशि की व्यवस्था थी। जबकि वीबी-जी राम जी योजना में कार्ययोजना के आधार पर केंद्र से 60 और राज्यों से 40 प्रतिशत धनराशि की व्यवस्था की गई है। राज्य सरकारों पर पहले से ही अन्य विभागों का अतिरिक्त बोझ है। ऐसे में श्रम और सामग्री मद के भुगतान में राज्य सरकार के देने पर प्रधानों में संशय बना हुआ है। -मैदान सिंह, अध्यक्ष, प्रधान संघ चायल
किसानी के समय और प्रतिकूल समय में मनरेगा योजना से मांगने पर काम मिल जाता था। काम नहीं मिलने पर श्रमिक बेरोजगारी भत्ते का हकदार होता था। नई व्यवस्था में ग्राम पंचायत की कार्य योजना का बजट पूर्ण होने पर काम नहीं मिलने की दशा में बेरोजगारी भत्ता कौन देगा? ऐसी स्थिति में श्रमिकों को काम की तलाश में पलायन करना पड़ेगा। -राजेंद्र कुमार, मनरेगा श्रमिक
प्रशासनिक मद छह प्रतिशत से नौ प्रतिशत कर दिया गया है, लेकिन नए कानून में खेती की कटाई के समय 60 दिन योजना बंद रहेगी। दो माह प्रशासनिक मद भी नहीं बनेगा। ऐसी स्थिति में रोजगार सेवकों, एपीओ, तकनीकी सहायकों और कंप्यूटर ऑपरेटर का दो माह के मानदेय का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। -शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल।
सरकार ने नए कानून में मनरेगा जैसी मांग आधारित रोजगार गारंटी को समाप्त कर दी है। जब श्रमिक की मांग पर काम ही नहीं मिलेगा तो गारंटी शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। बजट को सीमित कर यह श्रमिक विरोधी कानून है। विपक्ष के रूप में हम इस कानून का पुरजोर विरोध करते हैं और मांग करते हैं कि मनरेगा योजना बहाल किया जाए। -पुष्पेंद्र सरोज, सांसद
भारत सरकार से जारी वीबी-जी राम जी एक्ट में मनरेगा के सभी प्रावधान हैं। रही बात राज्य सरकार से धन आवंटन की तो वह शासन का मामला है। फिलहाल अभी एक्ट पास हुआ है, योजना लागू होने पर चीजें स्पष्ट हो जाएंगी। -मनोज कुमार वर्मा, डीसी, मनरेगा

शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल

शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल

शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल

शिव शंकर यादव, अध्यक्ष रोजगार सेवक संघ चायल