{"_id":"57a23bd04f1c1b3a752b8968","slug":"class-room","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक कमरे में बैठते हैं तीन कक्षाओं के छात्र","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
एक कमरे में बैठते हैं तीन कक्षाओं के छात्र
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Thu, 04 Aug 2016 12:33 AM IST
विज्ञापन
other
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बीआरसी कौशाम्बी में बुनियादी शिक्षा के नाम पर छात्र-छात्राओं के भविष्य से जिम्मेदार खेल रहे हैं। अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों को एक ही कमरे में बैठाकर समय बिताया जाता है। इसके बाद उन्हें निर्धारित समय पर छोड़ दिया जाता है। इससे बुनियादी शिक्षा की जड़ कितनी मजबूत हो रही है सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
बीआरसी कौशाम्बी अंतर्गत संचालित प्राथमिक और जूनियर विद्यालयों में बुनियादी शिक्षा के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है। स्कूलों में तैनात जिम्मेदार महज कागजी कोरम पूरा करने के लिए स्कूल खोलते हैं। यही कारण है कि अभिभावकों का विश्वास परिषदीय स्कूलों से लगातार उठता जा रहा है। बानगी के तौर पर बाबा का पुरवा स्थित जूनियर हाईस्कूल को लिया जा सकता है। शिक्षा के खराब स्तर के चलते यहां पर महज 20 बच्चों का नामांकन हो सका है।
कक्षा छह में 11, सात में सात और आठ में दो बच्चे पंजीकृत हैं। बुधवार को विद्यालय पहुंचकर असलियत खंगाली गई तो कक्षा छह में पांच, सात में छ: और आठ में दो बच्चे मौजूद रहे। यहां पर तैनात सहायक अध्यापक सतीश चंद्र और विकास मिश्र ने आए सभी कक्षाओं के 13 बच्चों को एक ही कमरे में इकट्ठा बैठा दिया। इसके बाद दोनों दरबार में मशगूल हो गए। प्रधानाध्यापक राम प्रसाद के बावत जानकारी की गई तो पता चला कि वह बीआरसी मीटिंग में गए हैं। नौनिहालों के भविष्य के साथ बेसिक स्कूलों में किए जा रहे खिलवाड़ का आखिर जिम्मेदार कौन है। क्या इस मनमानी का जवाब किसी भी जिम्मेदार के पास है।
विज्ञापन
11 बजे तक नहीं बन सका था मध्याह्न भोजन
बीआरसी कौशाम्बी के बाबा का पुरवा जूनियर हाईस्कूल में शिक्षा व्यवस्था के चरमराने के साथ-साथ मध्याह्न भोजन की स्थिति भी खराब मिली। स्कूल बंद होने का समय हो रहा था पर चूल्हा ठंडा पड़ा था। मामले में जब मौजूद सहायक अध्यापक सतीश चंद्र और विकास मिश्र से पूछा गया तो उनका कहना था कि भोजन बच्चों को आते ही करा दिया जाता है। इससे साफ है कि विद्यालय में मध्याह्न भोजन के नाम पर दाल में कहीं कुछ काला जरूर है।
जूनियर हाईस्कूल में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है। इसके चलते मैं अपने बच्चों को गांव के बाहर चल रहे निजी स्कूलों में भेजता हूं। सबको पता है कि सरकारी स्कूल में भेजने पर हमारे बच्चों का भविष्य दांव पर लगना तय है।
राम खेलावन, निवासी बाबा का पुरवा
सरकारी स्कूल में कक्षा छह का छात्र हो या फिर आठ का उसे एक बटे दो का मतलब नहीं पता। यहां तक कि 20 तक पहाड़ा भी बच्चे नहीं सुना पाते। ऐसे में हम अपने बच्चे का भविष्य इन स्कूलों में भेजकर दांव पर नहीं लगाएंगे।
अविनाश पाल, निवासी बाबा का पुरवा
विज्ञापन
बीआरसी कौशाम्बी अंतर्गत संचालित प्राथमिक और जूनियर विद्यालयों में बुनियादी शिक्षा के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है। स्कूलों में तैनात जिम्मेदार महज कागजी कोरम पूरा करने के लिए स्कूल खोलते हैं। यही कारण है कि अभिभावकों का विश्वास परिषदीय स्कूलों से लगातार उठता जा रहा है। बानगी के तौर पर बाबा का पुरवा स्थित जूनियर हाईस्कूल को लिया जा सकता है। शिक्षा के खराब स्तर के चलते यहां पर महज 20 बच्चों का नामांकन हो सका है।
विज्ञापन
कक्षा छह में 11, सात में सात और आठ में दो बच्चे पंजीकृत हैं। बुधवार को विद्यालय पहुंचकर असलियत खंगाली गई तो कक्षा छह में पांच, सात में छ: और आठ में दो बच्चे मौजूद रहे। यहां पर तैनात सहायक अध्यापक सतीश चंद्र और विकास मिश्र ने आए सभी कक्षाओं के 13 बच्चों को एक ही कमरे में इकट्ठा बैठा दिया। इसके बाद दोनों दरबार में मशगूल हो गए। प्रधानाध्यापक राम प्रसाद के बावत जानकारी की गई तो पता चला कि वह बीआरसी मीटिंग में गए हैं। नौनिहालों के भविष्य के साथ बेसिक स्कूलों में किए जा रहे खिलवाड़ का आखिर जिम्मेदार कौन है। क्या इस मनमानी का जवाब किसी भी जिम्मेदार के पास है।
विज्ञापन
11 बजे तक नहीं बन सका था मध्याह्न भोजन
बीआरसी कौशाम्बी के बाबा का पुरवा जूनियर हाईस्कूल में शिक्षा व्यवस्था के चरमराने के साथ-साथ मध्याह्न भोजन की स्थिति भी खराब मिली। स्कूल बंद होने का समय हो रहा था पर चूल्हा ठंडा पड़ा था। मामले में जब मौजूद सहायक अध्यापक सतीश चंद्र और विकास मिश्र से पूछा गया तो उनका कहना था कि भोजन बच्चों को आते ही करा दिया जाता है। इससे साफ है कि विद्यालय में मध्याह्न भोजन के नाम पर दाल में कहीं कुछ काला जरूर है।
जूनियर हाईस्कूल में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है। इसके चलते मैं अपने बच्चों को गांव के बाहर चल रहे निजी स्कूलों में भेजता हूं। सबको पता है कि सरकारी स्कूल में भेजने पर हमारे बच्चों का भविष्य दांव पर लगना तय है।
राम खेलावन, निवासी बाबा का पुरवा
सरकारी स्कूल में कक्षा छह का छात्र हो या फिर आठ का उसे एक बटे दो का मतलब नहीं पता। यहां तक कि 20 तक पहाड़ा भी बच्चे नहीं सुना पाते। ऐसे में हम अपने बच्चे का भविष्य इन स्कूलों में भेजकर दांव पर नहीं लगाएंगे।
अविनाश पाल, निवासी बाबा का पुरवा