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55 बरस साथ जिए, साथ मरे
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Mon, 12 Sep 2016 12:29 AM IST
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सात फेरों के सात वचनों में एक वचन वधु यह भी लेती है कि अब जीवन भर आप मेरी और मैं आपकी परछाईं बनकर रहेंगे। विवाह के यह वचन कौन निभाता है कौन नहीं यह अलग विषय है पर आलमचंद के शंकरलाल ने अपनी पत्नी को विवाह के समय दिया गया यह वचन अंतिम दम तक निभाया। पत्नी की मृत्यु के बाद उसे अंतिम सफर पर रवाना किया और कुछ घंटों के अंतराल में ही भी उन्होंने भी प्राण त्याग दिये।
आलमचंद निवासी शंकरलाल सोनी (75) आभूषण कारोबारी थे। उनकी 55 साल पहले निकुम्बला से शादी हुई थी। जीवनभर दोनों कदम से कदम मिलाकर चले। इस दौरान दो बेटे भी हुए। बेटे अजय व विजय कारोबार के सिलसिले में इलाहाबाद चले गए, लेकिन वह अपने ही घर में रहे, क्योंकि इस घर से उनकी यादें जो जुड़ीं थीं।
दोनों पति-पत्नी गांव में ही रहकर किसी तरह गुजर-बसर कर रहे थे। बड़ा बेटा अजय कभी कभार आता-जाता था, हालांकि मां-बाप के प्रति बेटों का रवैया गांव के लोगों को अखरता जरूर था पर शंकरलाल व उनकी पत्नी ने कभी इसको लोगों पर जाहिर नहीं होने दिया। शुक्रवार को बीमारी के कारण निकुम्बला की मौत हो गई।
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इससे शंकरलाल को बहुत तगड़ा आघात लगा। बेटे इलाहाबाद से आए। शाम को शंकरलाल ने अपनी पत्नी को मुखाग्नि दी। इसके बाद वह घर लौटे शंकरलाल ने भी प्राण त्याग दिए। परिजनों को पता चला तो घर में हाहाकार मच गया। मां के गम से बेटे उबर भी नहीं पाए थे कि पिता का साया भी उनसे छिन गया। बेटे, बहू, पोतों का रो-रो कर बुरा हाल है। रविवार को शंकरलाल का अंतिम संस्कार हुआ।
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आलमचंद निवासी शंकरलाल सोनी (75) आभूषण कारोबारी थे। उनकी 55 साल पहले निकुम्बला से शादी हुई थी। जीवनभर दोनों कदम से कदम मिलाकर चले। इस दौरान दो बेटे भी हुए। बेटे अजय व विजय कारोबार के सिलसिले में इलाहाबाद चले गए, लेकिन वह अपने ही घर में रहे, क्योंकि इस घर से उनकी यादें जो जुड़ीं थीं।
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दोनों पति-पत्नी गांव में ही रहकर किसी तरह गुजर-बसर कर रहे थे। बड़ा बेटा अजय कभी कभार आता-जाता था, हालांकि मां-बाप के प्रति बेटों का रवैया गांव के लोगों को अखरता जरूर था पर शंकरलाल व उनकी पत्नी ने कभी इसको लोगों पर जाहिर नहीं होने दिया। शुक्रवार को बीमारी के कारण निकुम्बला की मौत हो गई।
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इससे शंकरलाल को बहुत तगड़ा आघात लगा। बेटे इलाहाबाद से आए। शाम को शंकरलाल ने अपनी पत्नी को मुखाग्नि दी। इसके बाद वह घर लौटे शंकरलाल ने भी प्राण त्याग दिए। परिजनों को पता चला तो घर में हाहाकार मच गया। मां के गम से बेटे उबर भी नहीं पाए थे कि पिता का साया भी उनसे छिन गया। बेटे, बहू, पोतों का रो-रो कर बुरा हाल है। रविवार को शंकरलाल का अंतिम संस्कार हुआ।