{"_id":"5bbfac71bdec22501a733b37","slug":"161539288177-kaushambi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"राम-रावण की सेना के बीच सजीव युद्ध देखना है तो दारानगर आइए","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
राम-रावण की सेना के बीच सजीव युद्ध देखना है तो दारानगर आइए
Updated Fri, 12 Oct 2018 01:32 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दारानगर में होता है राम-रावण की सेना के बीच सजीव युद्ध
239 साल पुरानी रामलीला में आमने-सामने भिड़ते हैं सैनिक
क्षेत्र के पांच गांवों में होता अलग-अलग लीलाओं का मंचन
फोटो नं-
अमर उजाला ब्यूरो
कड़ा। राम-रावण की सेना के बीच अनूठे सजीव युद्ध का आनंद लेना है तो दारानगर आना होगा। यहां राम और रावण की सेना नवमी व दशमी को कुप्पी के जरिए सजीव युद्ध करती हैं। यह परंपरा पिछले 239 सालों से बदस्तूर जारी है। पांच गांवों के लोग इस लीला का खुद ही मंचन करते हैं।
दारानगर की रामलीला अब से 239 साल पहले पंडित विजय राम मिश्रा ने शुरु कराई थी। यहां की रामलीला का मंचन दिन में होता है। रात को सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करते हैं। रामलीला के अध्यक्ष आद्याप्रसाद पांडेय का कहना है कि इस बार 19 अक्तूबर को लक्ष्मण शक्ति की लीला होगी और राम-रावण की सेना युद्ध करेगी। 20 अक्तूबर को भी कुप्पी युद्ध होगा। यहां की रामलीला की सबसे बड़ी खासियत हैं कि रावण विजय दशमी के दिन नहीं बल्कि एकादशी के दिन मारा जाता है। म्योहरा स्थित विशाल मैदान में कुप्पी युद्ध होता है। अध्यक्ष ने बताया यहां रामलीला का पांच इलाके पांच गांवों में होता है। दारानगर में मुकुट पूजा के बाद रामलीला शुरू हो गई है। शादीपुर में ताड़का वध, म्योहरा में फुलवारी लीला व धनुष यज्ञ की लीला होती है। फरीदगंज में भगवान राम वनवास करते हैं। दारानगर में सूर्पणखा की नाक काटना, सीता हरण, भरत मिलाप, राजगद्दी का आयोजन होता है। लंका दहन म्योहरा में होता है, इसके बाद भगवान सुघवरनपुर किठांव जाते हैं। हब्बू नगर में गंगा पूजा का कार्यक्रम किया जाता है।
ऊंट के खाल की बनती थी कुप्पी
कड़ा। दारानगर में होने वाले युद्ध के लिए पहले कानपुर से कुप्पी खरीदी जाती थी। यह कुप्पी ऊंट के खाल की बनती थी और वजन ढाई से तीन किलो के बीच होता था। कानपुर के कारीगर की मौत के बाद उसके वंशजों ने यह धंधा बंद कर दिया। इसके चलते अब यहां प्लास्टिक की कुप्पी मंगवाई जाती है।
विज्ञापन
म्योहरा के माटी से ही भर जाते हैं जख्मी
कड़ा। कुप्पी युद्ध के दौरान अक्सर सैनिक जख्मी हो जाते हैं। तमाम लोग लहूलुहान हो जाते हैं। लेकिन यहां जख्मी लोग दवा नहीं कराते। युद्ध के मैदान की मिट्टी मलने मात्र से ही जख्म भर जाते हैं।
रेफरी करते हैं हार-जीत का फैसला
कड़ा। राम और रावण की सेना रेफरी के सीटी बजाते ही एक-दूसरे पर टूट पड़ती है। जब रेफरी की दोबारा सीटी बजती है तभी युद्ध पर विराम लगता है। रेफरी का ही फैसला दोनों दलों की सेनाओं को मान्य होता है।
रामदल की सेना में नशे पर रहता है प्रतिबंध
कड़ा। रामदल में शामिल सैनिक युद्ध के दौरान किसी तरह का नशा नहीं कर सकते। जबकि रावण दल के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं रहता। रावण को सेना को जिताना होता है तो रामदल के सैनिकों को बढ़ा दिया जाता लेकिन रामदल को जिस दिन जिताया जाता है तो रावण की सेना कम कर दी जाती है।
विज्ञापन
239 साल पुरानी रामलीला में आमने-सामने भिड़ते हैं सैनिक
क्षेत्र के पांच गांवों में होता अलग-अलग लीलाओं का मंचन
फोटो नं-
अमर उजाला ब्यूरो
कड़ा। राम-रावण की सेना के बीच अनूठे सजीव युद्ध का आनंद लेना है तो दारानगर आना होगा। यहां राम और रावण की सेना नवमी व दशमी को कुप्पी के जरिए सजीव युद्ध करती हैं। यह परंपरा पिछले 239 सालों से बदस्तूर जारी है। पांच गांवों के लोग इस लीला का खुद ही मंचन करते हैं।
दारानगर की रामलीला अब से 239 साल पहले पंडित विजय राम मिश्रा ने शुरु कराई थी। यहां की रामलीला का मंचन दिन में होता है। रात को सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करते हैं। रामलीला के अध्यक्ष आद्याप्रसाद पांडेय का कहना है कि इस बार 19 अक्तूबर को लक्ष्मण शक्ति की लीला होगी और राम-रावण की सेना युद्ध करेगी। 20 अक्तूबर को भी कुप्पी युद्ध होगा। यहां की रामलीला की सबसे बड़ी खासियत हैं कि रावण विजय दशमी के दिन नहीं बल्कि एकादशी के दिन मारा जाता है। म्योहरा स्थित विशाल मैदान में कुप्पी युद्ध होता है। अध्यक्ष ने बताया यहां रामलीला का पांच इलाके पांच गांवों में होता है। दारानगर में मुकुट पूजा के बाद रामलीला शुरू हो गई है। शादीपुर में ताड़का वध, म्योहरा में फुलवारी लीला व धनुष यज्ञ की लीला होती है। फरीदगंज में भगवान राम वनवास करते हैं। दारानगर में सूर्पणखा की नाक काटना, सीता हरण, भरत मिलाप, राजगद्दी का आयोजन होता है। लंका दहन म्योहरा में होता है, इसके बाद भगवान सुघवरनपुर किठांव जाते हैं। हब्बू नगर में गंगा पूजा का कार्यक्रम किया जाता है।
विज्ञापन
ऊंट के खाल की बनती थी कुप्पी
कड़ा। दारानगर में होने वाले युद्ध के लिए पहले कानपुर से कुप्पी खरीदी जाती थी। यह कुप्पी ऊंट के खाल की बनती थी और वजन ढाई से तीन किलो के बीच होता था। कानपुर के कारीगर की मौत के बाद उसके वंशजों ने यह धंधा बंद कर दिया। इसके चलते अब यहां प्लास्टिक की कुप्पी मंगवाई जाती है।
विज्ञापन
म्योहरा के माटी से ही भर जाते हैं जख्मी
कड़ा। कुप्पी युद्ध के दौरान अक्सर सैनिक जख्मी हो जाते हैं। तमाम लोग लहूलुहान हो जाते हैं। लेकिन यहां जख्मी लोग दवा नहीं कराते। युद्ध के मैदान की मिट्टी मलने मात्र से ही जख्म भर जाते हैं।
रेफरी करते हैं हार-जीत का फैसला
कड़ा। राम और रावण की सेना रेफरी के सीटी बजाते ही एक-दूसरे पर टूट पड़ती है। जब रेफरी की दोबारा सीटी बजती है तभी युद्ध पर विराम लगता है। रेफरी का ही फैसला दोनों दलों की सेनाओं को मान्य होता है।
रामदल की सेना में नशे पर रहता है प्रतिबंध
कड़ा। रामदल में शामिल सैनिक युद्ध के दौरान किसी तरह का नशा नहीं कर सकते। जबकि रावण दल के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं रहता। रावण को सेना को जिताना होता है तो रामदल के सैनिकों को बढ़ा दिया जाता लेकिन रामदल को जिस दिन जिताया जाता है तो रावण की सेना कम कर दी जाती है।