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लोकसभा चुनाव: दोआबा में हाशिए पर रही आधी आबादी
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मंझनपुर। दोआबा में लोकसभा चुनावों के दौरान आधी आबादी की तगड़ी उपेक्षा हुई। अव्वल तो सियासी दलों ने चुनाव में महिलाओं दांव नहीं लगाया। यदि कभी किसी दल ने टिकट भी दिया तो आधी आबादी इलाकाई जनता के बीच भरोसा जगाने में नाकाम रही। ऐसे में लोकसभा चुनाव आधी आबादी के लिए यह सीट बंजर ही साबित हुई है।
आजाद भारत में पहली मर्तबा 1952 में लोकसभा चुनाव हुआ था। उस दौरान प्रयागराज का हिस्सा रहे कौशम्बी जिले की पहचान इलाहाबाद ईस्ट कम जौनपुर संसदीय सीट के नाम से थी। चुनावी समर में उतरे सात उम्मीदवारों में एक भी महिलाएं नहीं थी। ये सिलसिला छठी लोकसभा चुनाव तक जारी रहा। वर्ष 1980 में हुए सातवीं लोकसभा चुनाव में पहली मर्तबा जेएनपी ने महिला उम्मीदवार पर दांव लगाया। इस वक्त तक दोआबा को चायल संसदीय क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा था। जेएनपी ने यहां से सरला चौधरी को उम्मीदवार बनाया। पर, वह क्षेत्र की जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रहीं। चुनाव में 31,040 मत के साथ 13.89 फीसदी वोट हासिल कर सरला को तीसरे पायदान से संतोष करना पड़ा। इसके बाद हुए 1984 और 89 के चुनाव में फिर किसी राजनीतिक दल की हिम्मत नहीं पड़ी।
बड़ी हिम्मत जुटाने के बाद वर्ष 1991 के 11 वीं लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने मंजू चंद्रा पर दांव लगाया। तमाम प्रयासों के बावजूद मंजू चंद्रा चुनाव हार गईं। चुनाव में उन्हें 96,885 वोट मिले थे। कुल पड़े वोटों का 27.28 फीसदी मत पाने के बावजूद उन्हें दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। इसके बाद से आधा दर्जन बार लोकसभा चुनाव हुए। पर, कोई सियासी दल महिलाओं के नाम पर जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। कुल मिलाकर अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में विभिन्न दलों के साथ ही निर्दलीय समेत कुल 135 प्रत्याशी चुनावी समर में किस्मत आजमा चुके हैं। पर, सियासी दलों ने 1980 और 91 में ही एक-एक महिलाओं पर दांव लगाया था।
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आजाद भारत में पहली मर्तबा 1952 में लोकसभा चुनाव हुआ था। उस दौरान प्रयागराज का हिस्सा रहे कौशम्बी जिले की पहचान इलाहाबाद ईस्ट कम जौनपुर संसदीय सीट के नाम से थी। चुनावी समर में उतरे सात उम्मीदवारों में एक भी महिलाएं नहीं थी। ये सिलसिला छठी लोकसभा चुनाव तक जारी रहा। वर्ष 1980 में हुए सातवीं लोकसभा चुनाव में पहली मर्तबा जेएनपी ने महिला उम्मीदवार पर दांव लगाया। इस वक्त तक दोआबा को चायल संसदीय क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा था। जेएनपी ने यहां से सरला चौधरी को उम्मीदवार बनाया। पर, वह क्षेत्र की जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रहीं। चुनाव में 31,040 मत के साथ 13.89 फीसदी वोट हासिल कर सरला को तीसरे पायदान से संतोष करना पड़ा। इसके बाद हुए 1984 और 89 के चुनाव में फिर किसी राजनीतिक दल की हिम्मत नहीं पड़ी।
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बड़ी हिम्मत जुटाने के बाद वर्ष 1991 के 11 वीं लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने मंजू चंद्रा पर दांव लगाया। तमाम प्रयासों के बावजूद मंजू चंद्रा चुनाव हार गईं। चुनाव में उन्हें 96,885 वोट मिले थे। कुल पड़े वोटों का 27.28 फीसदी मत पाने के बावजूद उन्हें दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। इसके बाद से आधा दर्जन बार लोकसभा चुनाव हुए। पर, कोई सियासी दल महिलाओं के नाम पर जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। कुल मिलाकर अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में विभिन्न दलों के साथ ही निर्दलीय समेत कुल 135 प्रत्याशी चुनावी समर में किस्मत आजमा चुके हैं। पर, सियासी दलों ने 1980 और 91 में ही एक-एक महिलाओं पर दांव लगाया था।
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