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Kanpur News: निर्दलीय प्रत्याशी पर टिका कानपुर कपड़ा कमेटी चुनाव का मतदान

Sat, 13 Dec 2025 01:32 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 13 Dec 2025 01:32 AM IST
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Voting for Kanpur Textile Committee election hinges on independent candidate
कानपुर। कानपुर कपड़ा कमेटी का चुनाव दिलचस्प हो गया है। शुक्रवार को काशी और युवा ग्रुप के दो-दो प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिए। एक दिन पहले भी तीन प्रत्याशियों ने नाम वापस ले लिए थे। अब मतदान होना निर्दलीय प्रत्याशी पर आकर टिक गया है। यदि वे नाम वापस लेते हैं तो कमेटी के 102 के इतिहास में आपसी सहमति से चुनाव हो जाएंगे। इस बीच बैलेट पेपर छपने की प्रक्रिया को एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया है। शनिवार को मतदान की तस्वीर साफ होगी।
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अब 23 सदस्यीय कार्यकारिणी के लिए 24 प्रत्याशी ही मैदान में रह गए हैं। काशी गुट में केवल नौ प्रत्याशी ही बचे हैं। युवा ग्रुप में 14 प्रत्याशी बचे हैं। लक्ष्मण सहगल के रूप में निर्दलीय प्रत्याशी अब चुनाव मैदान में हैं। दो दिन के भीतर सात प्रत्याशी चुनाव मैदान से हट गए हैं। पहले नंदलाल कसेरा और विवेक गुप्ता ने नाम वापस ले लिया। दोनों काशी गुट से प्रत्याशी थे। इसी तरह निर्दलीय प्रत्याशी अमित रुइया ने भी नाम वापस ले लिया था।
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मुख्य चुनाव अधिकारी सत्य नारायण सिंहानिया ने बताया कि अमित गुलाटी, हीरालाल खत्री, गौरव गुप्ता, राकेश पुरी ने भी नाम वापस ले लिया है। अब 24 प्रत्याशी मैदान में बचे हैं। मौजूदा स्थिति को देखते हुए बैलेट पेपर छपने की प्रक्रिया एक दिन के लिए रोक दी गई है। यदि अब कोई नाम वापस होता है तो मतदान नहीं होगा। कपड़ा कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष अमित दोसर का कहना है कि यदि निर्दलीय प्रत्याशी नाम वापस लेते हैं तो आपसी सहमति से चुनाव हो जाएगा। काशी गुट के श्रीकृष्ण गुप्ता का कहना है कि आपसी सहमति बन रही है तो मतदान नहीं होगा। ऐसा पहली बार होगा कि बिना मतदान के कार्यकारिणी सदस्य चुने जाएंगे।
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इसलिए होने लगी नाम वापसीबाजार के जानकारों का कहना है कि काशी गुट ने अपना पैनल उतारा था लेकिन दो महत्वपूर्ण सदस्य शहर से बाहर चले गए। एक सदस्य लंबे समय से अध्यक्ष बनने के लिए प्रयासरत रहे लेकिन उनकी ओर से बाहरी लोगों के दखल को देखते हुए काशी गुट में अंदर ही अंदर गुटबाजी हावी हो गई। बाजार के लोग नहीं चाहते कि बाहरी बाजारों के लोगों का यहां पर दखल हो। ऐसे में अचानक नाम वापसी शुरू हो गई। इसके अलावा दोनों गुटों के बुजुर्ग कारोबारी भी चाह रहे थे कि आपसी सहमति से सदस्य चुने जाएं। इसका असर भी चुनावों पर पड़ा है।
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