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UP: अब सल्फर नहीं बबूल, नीम की छाल से साफ होगी चीनी, एनएसआई में वैज्ञानिकों ने विकसित की तकनीक
Thu, 20 Nov 2025 10:36 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Thu, 20 Nov 2025 10:36 PM IST
सार
रसायन के प्रयोग से शरीर को नुकसान होता था। अब चीनी मिलों में शुद्ध पानी की बचत होगी। इस तकनीक का अभी तक किसी अन्य देश में प्रयोग नहीं होता है।
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तकनीक की जानकारी दी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सल्फर से साफ होने वाली चीनी को अब बबूल, नीम, आम के पेड़ की छाल से साफ किया जाएगा। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआई) की निदेशक प्रो. सीमा परोहा की देखरेख में वैज्ञानिकों की टीम ने यह तकनीक विकसित की है। इससे न केवल चीनी मिलों में शुद्ध पानी की बचत होगी बल्कि चीनी की मिठास बढ़ेगी। प्रो. परोहा ने दावा किया कि अभी तक किसी भी अन्य देश में चीनी को साफ करने के लिए पेड़ों की छाल का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
प्रो. सीमा परोहा ने बताया कि पूरी दुनिया में अभी चीनी को तैयार करने की चार प्रमुख विधियों में रसायनों का प्रयोग किया जाता है। भारत में 80 फीसदी चीनी मिलें डबल सल्फिटेशन प्रक्रिया का उपयोग करके गन्ने के रस से प्लांटेशन व्हाइट शुगर और कच्ची चीनी या रिफाइंड चीनी बनाती हैं। चीनी को स्वच्छ व सफेद क्रिस्टल जैसा बनाने के लिए सल्फर डाई ऑक्साइड, चूना, कार्बन डाई ऑक्साइड जैसे कई रसायनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक रसायन का प्रयोग शरीर को भी नुकसान पहुंचाता है। इसे दूर करने के लिए काफी रिसर्च की गई जिसमें शुगर टेक्नोलॉजी के सहायक आचार्य महेंद्र कुमार यादव व उनकी टीम अनुराग वर्मा व शालिनी वर्मा शामिल रहे।
महेंद्र कुमार यादव ने बताया कि अर्जेंटीना में पाए जाने वाले पेड़ क्चेब्राचो की छाल से चूर्ण तैयार किया जाता है। इसका उपयोग टैनिन उद्योग में होता है। रायटन कंपनी ने इसे संस्थान को उपलब्ध कराया जिसका प्रयोग गन्ने के रस को शुद्ध करने के लिए किया गया। इसके लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई गई जिसका विकास संस्थान में हुआ है। छह माह के दौरान 1500 से अधिक प्रयोगशाला परीक्षण किए गए।
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प्रो. परोहा ने कहा कि जब प्रयोगशाला में सफलता मिली तो उसके बाद अयोध्या की रौजागांव चीनी मिल में 6000 मीट्रिक टन गन्ने से चीनी बनाने में इसका परीक्षण किया गया। इससे डबल सल्फिटेशन में उपयोग होने वाले सल्फर का प्रयोग पूरी तरह से खत्म हो गया और सफेद चूने का प्रयोग भी 50 फीसदी घट गया। गन्ने के रस की शुद्धता भी चार गुना से ज्यादा बढ़ गई है। चीनी तैयार करने की प्रक्रिया आसान हुई और मिलों में जल उत्सर्जन भी घट गया। उत्पादित चीनी का रंग लगभग 70 से 80 फीसदी तक अधिक अच्छा रहा।
वहीं क्चेब्राचो की छाल में मिलने वाले प्राकृतिक कोएगुलेंट देश के बबूल, जामुन, अर्जुन, बहेड़ा, आम, नीम और यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों की छाल में भी पाए जाते हैं। इनसे किया गया प्रयोग भी सफल रहा है। महेंद्र कुमार ने बताया कि यह कोएगुलेंट किसी तरल पदार्थ को गाढ़ा करता है।
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प्रो. सीमा परोहा ने बताया कि पूरी दुनिया में अभी चीनी को तैयार करने की चार प्रमुख विधियों में रसायनों का प्रयोग किया जाता है। भारत में 80 फीसदी चीनी मिलें डबल सल्फिटेशन प्रक्रिया का उपयोग करके गन्ने के रस से प्लांटेशन व्हाइट शुगर और कच्ची चीनी या रिफाइंड चीनी बनाती हैं। चीनी को स्वच्छ व सफेद क्रिस्टल जैसा बनाने के लिए सल्फर डाई ऑक्साइड, चूना, कार्बन डाई ऑक्साइड जैसे कई रसायनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक रसायन का प्रयोग शरीर को भी नुकसान पहुंचाता है। इसे दूर करने के लिए काफी रिसर्च की गई जिसमें शुगर टेक्नोलॉजी के सहायक आचार्य महेंद्र कुमार यादव व उनकी टीम अनुराग वर्मा व शालिनी वर्मा शामिल रहे।
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महेंद्र कुमार यादव ने बताया कि अर्जेंटीना में पाए जाने वाले पेड़ क्चेब्राचो की छाल से चूर्ण तैयार किया जाता है। इसका उपयोग टैनिन उद्योग में होता है। रायटन कंपनी ने इसे संस्थान को उपलब्ध कराया जिसका प्रयोग गन्ने के रस को शुद्ध करने के लिए किया गया। इसके लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई गई जिसका विकास संस्थान में हुआ है। छह माह के दौरान 1500 से अधिक प्रयोगशाला परीक्षण किए गए।
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प्रो. परोहा ने कहा कि जब प्रयोगशाला में सफलता मिली तो उसके बाद अयोध्या की रौजागांव चीनी मिल में 6000 मीट्रिक टन गन्ने से चीनी बनाने में इसका परीक्षण किया गया। इससे डबल सल्फिटेशन में उपयोग होने वाले सल्फर का प्रयोग पूरी तरह से खत्म हो गया और सफेद चूने का प्रयोग भी 50 फीसदी घट गया। गन्ने के रस की शुद्धता भी चार गुना से ज्यादा बढ़ गई है। चीनी तैयार करने की प्रक्रिया आसान हुई और मिलों में जल उत्सर्जन भी घट गया। उत्पादित चीनी का रंग लगभग 70 से 80 फीसदी तक अधिक अच्छा रहा।
वहीं क्चेब्राचो की छाल में मिलने वाले प्राकृतिक कोएगुलेंट देश के बबूल, जामुन, अर्जुन, बहेड़ा, आम, नीम और यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों की छाल में भी पाए जाते हैं। इनसे किया गया प्रयोग भी सफल रहा है। महेंद्र कुमार ने बताया कि यह कोएगुलेंट किसी तरल पदार्थ को गाढ़ा करता है।