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ट्राॅमा सेंटर: ऑपरेशन कक्ष में ताला, ओपीडी से चल रहा काम
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इटावा। संयुक्त जिला अस्पताल में करीब 10 साल पहले दो करोड़ की लागत से ट्राॅमा सेंटर की स्थापना की गई थी। इस भवन के निर्माण का उद्देश्य साफ था कि यहां गंभीर हादसे के शिकार मरीजों को तुरंत इलाज मिल सके। हकीकत इससे परे है। एक दशक गुजर जाने के बाद यह भवन सफेद हाथ साबित हो रहा है। वर्तमान में शल्य ऑपरेशन कक्ष व वार्ड में ताला पड़ा है जबकि हड्डी रोग विशेषज्ञ मरीजों को परामर्श व दवा लिखकर लौटा रहे हैं। वहीं, गंभीर मरीजों को ट्रामा सेंटर में भर्ती न कर जिला अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है।
बाबा भीमराव आंबेडकर संयुक्त जिला अस्पताल में साल 2014 में सड़क हादसों में घायल होने वाले मरीजों को तत्काल इलाज मुहैया करवाने को ट्राॅमा सेंटर की स्थापना की गई थी। इसके निर्माण समेत उपकरण खरीदने के लिए दो करोड़ का बजट स्वीकृत हुआ था। ट्रॉमा सेंटर चालू होने से उम्मीद जगी थी कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में कमी आएगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यहां डॉक्टरों व संसाधनों की कमी के चलते यहां सिर्फ मरीजों की ओपीडी की जाती है।
ट्रामा सेंटर को चालू करने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा स्टाफ की कमी है। इसके लिए अलग से प्रशिक्षित नर्सिग स्टाफ के साथ डाक्टर्स की भी आवश्यकता है। यहां आर्थोपेडिक, मेडिसन विशेषज्ञ, सर्जन, निश्चेतना विशेषज्ञ की जरुरत रहेगी। स्टाफ का मिल पाना कठिन है क्योंकि जिला अस्पताल में पहले से ही विशेषज्ञ डाक्टरों के पद खाली हैं। प्रतिदिन मरीजों को निराश होकर वापस लौटना पड़ता है। ट्रामा सेंटर के लिए अभी तक एक बड़ी एंबुलेंस मिल चुकी है।
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डॉक्टर व स्टाॅफ की कमी को लेकर कई बार उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा जा चुका है। अभी तक कमी पूरी नहीं हुई है। जिला अस्पताल के डॉक्टरों से ही काम चलाया जा रहा है। साथ ही संसाधनों की कमी के चलते यहां ऑपरेशन थियेटर शुरू नहीं हो सका है। जल्द ही इसको भी शुरू कराने की पहल की जाएगी।
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बाबा भीमराव आंबेडकर संयुक्त जिला अस्पताल में साल 2014 में सड़क हादसों में घायल होने वाले मरीजों को तत्काल इलाज मुहैया करवाने को ट्राॅमा सेंटर की स्थापना की गई थी। इसके निर्माण समेत उपकरण खरीदने के लिए दो करोड़ का बजट स्वीकृत हुआ था। ट्रॉमा सेंटर चालू होने से उम्मीद जगी थी कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में कमी आएगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यहां डॉक्टरों व संसाधनों की कमी के चलते यहां सिर्फ मरीजों की ओपीडी की जाती है।
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ट्रामा सेंटर को चालू करने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा स्टाफ की कमी है। इसके लिए अलग से प्रशिक्षित नर्सिग स्टाफ के साथ डाक्टर्स की भी आवश्यकता है। यहां आर्थोपेडिक, मेडिसन विशेषज्ञ, सर्जन, निश्चेतना विशेषज्ञ की जरुरत रहेगी। स्टाफ का मिल पाना कठिन है क्योंकि जिला अस्पताल में पहले से ही विशेषज्ञ डाक्टरों के पद खाली हैं। प्रतिदिन मरीजों को निराश होकर वापस लौटना पड़ता है। ट्रामा सेंटर के लिए अभी तक एक बड़ी एंबुलेंस मिल चुकी है।
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डॉक्टर व स्टाॅफ की कमी को लेकर कई बार उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा जा चुका है। अभी तक कमी पूरी नहीं हुई है। जिला अस्पताल के डॉक्टरों से ही काम चलाया जा रहा है। साथ ही संसाधनों की कमी के चलते यहां ऑपरेशन थियेटर शुरू नहीं हो सका है। जल्द ही इसको भी शुरू कराने की पहल की जाएगी।