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जनभावना को नहीं समझ पा रही थी तत्कालीन सरकार, बोले पूर्व डीएम 

Sun, 10 Nov 2019 03:56 AM IST
दुष्यंत शर्मा माई सिटी रिपोर्टर, कानपुर
माई सिटी रिपोर्टर, कानपुर Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 10 Nov 2019 03:56 AM IST
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Then government could not understand public sentiment said former DM 
डेमो पिक - फोटो : डेमो

सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के पक्ष में आने पर रिटायर्ड आईएएस रामशरण श्रीवास्तव की आंखों से खुशी की आंसू छलक पड़े। वाई, ब्लॉक किदवई नगर निवासी रामशरण श्रीवास्तव विश्व हिंदू परिषद की ओर से मंदिर निर्माण के लिए हुए शिलान्यास कार्यक्रम के समय फैजाबाद (अयोध्या) के जिलाधिकारी थे। रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद के समय वे साढ़े तीन साल तक बेहद कठिन परिस्थितियों में मुस्तैदी से डटे रहे। वे मानते हैं कि तत्कालीन सरकार उस वक्त जनभावना को नहीं समझ पा रही थी। 

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अपने चुनौती पूर्ण कार्यकाल को याद करते हुए रामशरण श्रीवास्तव बताते हैं कि 17 जुलाई 1987 को हरदोई के डीएम थे तब प्रदेश सरकार के एक पत्रवाहक ने सूचना दी कि उन्हें फैजाबाद का डीएम बनाया गया है। वे इस बात को सोचकर खुश थे कि अब अक्सर मंदिर और मठों के दर्शन आसानी से होते रहेंगे। 
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दो दिन बाद 19 जुलाई को फैजाबाद जाकर पदभार ग्रहण करने का आदेश था। पहुंचते ही वहां की स्थितियां समझ में आ गईं। यह बहुत कठिन कार्यकाल होने जा रहा था। उस समय राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद दिन पर दिन उग्र होता जा रहा था। कई दृश्यों और परिस्थितियों को याद कर वे ठहर जाते हैं। 
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फिर बताते हैं कि किस तरह से साढ़े तीन वर्ष तक वहां शांति बनाए रखने के लिए उन्हें क्या क्या सहन नहीं करना पड़ा। हिंदू पक्ष की प्रतिक्रिया पर सरकार का दबाव असहनीय था। कई बार मन इतना बेचैन हो जाता कि नौकरी छोड़ने का मन करता। लेकिन नौकरी छोड़ने के लिए तो आईएएस नहीं बने थे। हर दिन की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना किया। जो झेलता था, उसे डायरी में लिखता जाता था। 

...जब खाना पीना सब हराम था 

22 मई 1988 को बाबरी मस्जिद आंदोलन समिति ने मस्जिद निर्माण के लिए 12 अगस्त और 14 अक्तूबर को विशाल मार्च की घोषणा की। इस पर हिंदू संगठनों में उत्तेजना पैदा हुई। बजरंग दल ने 1000 बलिदानी जत्थे तैयार किए थे। विश्व हिंदू परिषद ने मुसलमानों के कार्यक्रम को पूरी तरह से विफल बनाने की तैयारी कर ली थी। तब सरकार कुछ करवाना चाह रही थी। हिंदू मुस्लिम अपनी जिद पर अड़े थे। तब मन की बात सुनता था कि हिंसा नहीं होने देना है। आपसी भाईचारा नहीं बिगड़ने देना है। 

जब संतों से भर गई थी अयोध्या 
विश्व हिंदू परिषद ने 6 नवंबर 1989 को देव उत्थान एकादशी के मौके पर श्रीराम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा की थी। गर्भ गृह से 192 फीट की दूरी पर शिलान्यास की जगह सुनिश्चित की गई। आठ फीट का चतुर्भुज बनाकर वहां ध्वज गाड़ दिया गया और यह नारा दिया गया कि मंदिर यहीं बनेगा। पूरे राष्ट्र से राम पूजित शिलाएं अयोध्या पहुंचने लगीं। हजारों साधु संत अयोध्या पहुंच रहे थे। इस कार्यक्रम को मुस्लिम समुदाय के लोग विफल करना चाह रहे थे। प्रदेश सरकार ने भी इस बात पर आपत्ति जताई कि घोषित स्थल पर शिलान्यास नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने भी स्टे दे दिया था लेकिन जनभावना थी कि वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसे में एक प्रशासक को जो करना चाहिए था, वही किया। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिलान्यास कार्यक्रम हुआ, कराया गया। 

सब स्वार्थ में थे, मंदिर बनाने की मंशा नहीं थी 
रामशरण श्रीवास्तव ने अयोध्या विवाद पर तीन किताबें लिखी हैं। चौथी किताब फैसले के बाद आएगी। इनकी एक किताब को बतौर सबूत हाईकोर्ट में भी पेश किया गया। वे बताते हैं कि पूर्व की सरकारों ने राजनीतिक नफा नुकसान की वजह से इस विवाद को लटकाए रखा। छह दिसंबर 1992 को ढहाया गया विवादित ढांचा, राम मंदिर तोड़कर ही निर्मित किया गया था। राजनीतिक संगठन यह बात भलीभांति जानते थे लेकिन वे मानने को तैयार नहीं थे। यह बात उन्होंने कई बार तत्कालीन सरकार के समक्ष रखी लेकिन उसे अनसुना ही किया गया। यह विवाद बाहरी लोगों के दखल की वजह से इतना लंबा चला। अयोध्या के लोगों के हाथ में दे दिया जाता तो कब का हल हो जाता।

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