{"_id":"59a159644f1c1b18718b4687","slug":"story-about-pradhanmantri-awas-yojna-gramin","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"यहां जुम्मन के घर में फूटी आज भी रकाबी है...ऐसा है यहां ‘प्रधानमंत्री आवास योजना का हाल’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यहां जुम्मन के घर में फूटी आज भी रकाबी है...ऐसा है यहां ‘प्रधानमंत्री आवास योजना का हाल’
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sat, 26 Aug 2017 05:00 PM IST
विज्ञापन
छिबरामऊ में अपने परिवार के साथ झोपड़ी के बाहर बैठा महेश।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इस खबर की शुरूआत प्रख्यात शायर अदम गोंडवी की चार पक्तियों के साथ...।
विज्ञापन
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है। तुम्हारी मेज चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के, यहां जुम्मन के घर में फूटी आज भी रकाबी है...। प्रख्यात कवि अदम गोंदवी की यह कविता हरदोई जिले में प्रधानमंत्री आवास योजना के हालात पर सटीक बैठती है। बिलग्रमा कन्नौज मार्ग पर कटरी छिबरामऊ में महेश का परिवार भले ही सड़क किनारे घास फूस के मकान में जिंदगी बसर कर रहा हो, लेकिन जिले में तैनात खंड विकास अधिकारियों को बेघर ढूंढे ही नहीं मिल रहे हैं। खंड विकास अधिकारियों की रिपोर्ट पर जिला प्रशासन ने प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत जनपद को आवंटित हुए 14000 से अधिक आवासों में से लगभग 5000 आवास सरेंडर कर दिए हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना की गिनती केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना में की जाती है। बेघर परिवारों के लिए शुरू की गई इस योजना के मुताबिक वर्ष 2011 में हुई आर्थिक, सामाजिक एवं जातिगत जनगणना के आधार पर घास फूस (झोपड़ी) के आवास में रहने वाले लोगों को लाभ दिया जाना था। इसके लिए सर्वे भी हुआ। लेकिन, जिले में खंड विकास अधिकारियों की रिपोर्ट बताती है कि अनुसूचित जाति का कोई भी परिवार बेघर नहीं रह गया है। खंड विकास अधिकारियों से मिली रिपोर्ट को आधार बनाते हुए जिला प्रशासन ने प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत मिले 14843 आवासों मेें से 4988 आवास सरेंडर कर दिए हैं।
विज्ञापन
ग्रामीण क्षेत्र में 47 फीसदी आबादी बेघर
डेमो पिक
खंड विकास अधिकारियों को भले ही आवास योजना का लाभ देने के लिए एक भी बेघर न मिले हों, लेकिन इसकी सच्चाई बेहद तल्ख है। वर्ष 2011 में आर्थिक, जातिगत व सामाजिक जनगणना में जनपद के ग्रामीण इलाकों की कुल आबादी के सापेक्ष 47.3 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो घास फूस के घरों मेें रहते हैं। अब सवाल यह है कि क्या पांच साल में ही इतने आवास बन गए कि अब खंड विकास अधिकारियों को बेघर ही नहीं मिल रहे।
एक नजर इन आंकड़ों पर
डेमो पिक
जनपद में चालू वित्तीय वर्ष के तहत प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के लिए 14843 आवासों का आवंटन किया गया था। इनमें से 9848 आवास अनुसूचित जाति के लिए, 3969 आवास सामान्य वर्ग के लिए और 1026 आवास अल्पसंख्यकों के लिए थे। परियोजना निदेशक राजेश श्रीवास बताते हैं कि 9848 आवासों में से 4988 आवास सरेंडर कर दिए गए। यहां यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत चयनित पात्रों को एक लाख बीस हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है।
जनगणना पर ही उठा दी उंगली
डेमो पिक
ग्राम्य विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक राजेश श्रीवास से जब आवास सरेंडर किए जाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि पात्र न मिलने के कारण ऐसा करना पड़ा। उन्होंने तो वर्ष 2011 में हुई आर्थिक, सामाजिक, जातिगत जनगणना पर ही अंगुली उठाना शुरू कर दिया। कहा 2011 के आंकड़ों में गड़बड़ी है। कहीं किसी की जाति गलत लिखी है तो किसी की उम्र गलत है। इसके कारण भी पात्र नहीं मिल पा रहे।
बदले बीडीओ तो मिलने लगेंगे पात्र
डेमो पिक
खंड विकास अधिकारियों के ब्लाक बदल दिए जाएं तो पात्र मिलने लगेंगे। पात्रों की खोज कैसे की जाती है यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले कुछ माह में रात दिन एक कर आवास योजना के लाभार्थियों की फीडिंग तब पूरी हो पाई जब गांवों में तैनात ग्राम सचिव से लेकर ब्लाक में तैनात जिम्मेदारों तक ने अपनी जेब भर ली। ग्राम्य विकास अभिकरण के कर्मचारी ब्लाक पर तैनात पटल सहायकों को फोन पर फोन कर डाटा लेकर आने को कहते रहे, लेकिन आना तभी हुआ जब उनकी खुद की जेबें भर गईं।
तो क्या सरेंडर आवास मिलेंगे
डेमो पिक
शासन के पास इसकी पुख्ता जानकारी है कि सेक 2011 के आंकड़ों से इतर भी बड़ी संख्या में आवासहीन लोग हैं। इसके चलते ही ग्राम्य विकास आयुक्त पार्थ सारथी सेन शर्मा ने सभी जनपदों के डीएम और सीडीओ को विशेष अभियान चलाकर ऐसे आवासहीनों की खोज करने के निर्देश दिए थे, जिनके नाम 2011 में नहीं हैं। 31 अगस्त तक यह सूची शासन को भेजी जानी है। ग्राम्य विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक राजेश श्रीवास कहते हैं कि कार्य चल रहा है लेकिन अभी किसी खंड विकास अधिकारी ने ऐसी सूची नहीं दी है। वैसे सवाल यह भी है कि अगर पात्र मिल भी गए तो क्या सरेंडर हुए आवास वापस लाने में कोई सक्षम है।