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वैज्ञानिकों को शोध में मिली बड़ी सफलता, खास तकनीक से इंसान के शरीर के लिए नई हड्डियां तैयार

Tue, 18 Dec 2018 11:31 AM IST
शिखा पांडेय हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, कानपुर
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Tue, 18 Dec 2018 11:31 AM IST
सार

- आईआईटी कानपुर और दिल्ली के वैज्ञानिकों का शोध

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Stem cells made of bone will gave you speed in life
डेमो पिक

विस्तार

बोन कैंसर, एक्सीडेंट या बीमारी के चलते शरीर के किसी भी हिस्से की हड्डियां गंवा चुके लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण जगी है। आईआईटी कानपुर और आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल के जरिये थ्री-डी बायोप्रिंटिंग तकनीक से इंसान के शरीर के लिए नई हड्डियां तैयार करने में काफी हद तक सफलता पा ली है।
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वैज्ञानिकों ने शोध पूरा कर लिया है। अब इसका क्लीनिकल ट्रायल होगा। ट्रायल सफल होते ही इंसान के शरीर में इसका प्रत्यारोपण किया जा सकेगा। ऐसा होने पर यह मेडिकल क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
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इंसान की नई हड्डियां तैयार करने की तकनीक पर दुनियाभर के कई बड़े वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि दुनिया में पहली बार इस तकनीक से नई हड्डियां विकसित करने में सफलता मिली है।
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ऐसे तैयार की जाएगी कृत्रिम हड्डी
आईआईटी कानपुर के बायोलॉजिकल साइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग के सीनियर प्रोफेसर अमिताभ बंदोपाध्याय और आईआईटी दिल्ली के प्रो. सौरभ घोष ने यह रिसर्च किया है। प्रो. बंदोपाध्याय ने बताया कि इंसान के शरीर में दो तरह की हड्डियां होती हैं।

दोनों गर्भ में भ्रूण विकास के दौरान ही तैयार होती हैं। एक मस्तिष्क को कवर करने वाली ‘स्कल’ होती है, जो सेल से तैयार होती है। दूसरी हड्डी इंसान के पूरे वजन को उठाती है। यह हाथ, पैर, रीढ़ में विकसित होती है।

इसके लिए पहले स्टेम सेल से कार्टिलेज तैयार होता है। इससे थ्री-डी बायोप्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल कर हड्डी तैयार होती है। यह तकनीक शरीर के जिस हिस्से में हड्डी का प्रत्यारोपण करना होता है, उसका आकार तय करती है।

Stem cells made of bone will gave you speed in life
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थ्री-डी प्रिंटिंग बनी मददगार
प्रो. बंदोपाध्याय ने बताया कि हड्डी तैयार करने से पहले यह मालूम होना चाहिए कि शरीर के जिस हिस्से की हड्डी गायब है, उसका आकार-प्रकार कैसा है। इसे थ्रीडी बायोप्रिंटिंग से ही पता किया जा सकता है। यह तकनीक आईआईटी दिल्ली के प्रो. सौरभ घोष ने तैयार की है।

अभी यह काम बाकी है
प्रो. बंदोपाध्याय बताते हैं कि स्टेम सेल्स की मदद से विकसित हड्डी बिल्कुल प्राकृतिक है। हालांकि इस पर अभी और काम होना बाकी है। इसके प्रत्यारोपण के बाद दवा के प्रभाव व दुष्प्रभाव पर भी काम होना है। सफलता मिली तो यह तकनीक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव कर सकती है।

वह बताते हैं कि थ्रीडी बॉयोप्रिंटिंग में लाइव ह्ययूमन सेल्स पर काम करना मुश्किल होता है, क्योंकि प्रिंटिंग के दौरान हाईप्रेशर और तापमान की वजह से सेल्स के डेड होने का खतरा रहता है। लिहाजा स्टेम सेल्स और सिल्क प्रोटीन को मिक्स करने की ऐसी खास तकनीक विकसित की गई, ताकि प्रिंटिंग के दौरान या इसके बाद भी सेल्स जीवित रहें। यही नहीं, स्टेम सेल्स की बॉयोलॉजिकल प्रणाली में भी कोई बदलाव न आए, इस पर भी काम हुआ।
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