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हिमालयन क्षेत्र में कई राज्यों को भूकंप का खतरा
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Mon, 27 Apr 2015 02:26 AM IST
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हिमालयन क्षेत्र में भूकंप का बड़ा खतरा है। इसका खुलासा आईआईटी कानपुर के शोध से हुआ है। कई सालों के शोध से पता चला है कि चंडीगढ़, पंजौरी और तकसाल के आसपास वीक (कमजोर) जोन हैं। यहां भूकंप के एक्टिव फाल्ट हैं, जिससे जमीन के निचले हिस्से पर जबरदस्त प्रेशर बना है। यह प्रेशर जब भी रिलीज होगा, भूकंप आएगा। इससे हिमालयन क्षेत्र में भारी तबाही की आशंका है। जमीन की सतह भी बदली है। यही वजह है कि आईआईटी के विज्ञानियों ने हिमालयन शृंखला पर विस्तृत शोध की बात कही है। आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर और भू-विज्ञानी प्रो. जावेद एन मलिक ने हिमालयन शृंखला में भूकंप की संभावना पर शोध किया।
वर्ष 2001-2010 तक काम किया, फिर चंडीगढ़ सहित तीन स्थानों पर भूकंप आने के संकेत दिए। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जनरल में रिसर्च पेपर भी प्रकाशित कराया। प्रो. जावेद ने बताया कि हिमालयन क्षेत्र में 10 हजार साल पहले की गतिविधि अभी बनी है।
जो स्थिति है, उसके मुताबिक हिमालय हर साल 1 मिलीमीटर बढ़ रहा है। साल भर में बंगलूरू और तिब्बतियन प्लेट की आंतरिक दूरी 50 मिलीमीटर कम हो रही है। हालांकि बंगलूरू की तरफ से पांच मिलीमीटर प्लेट जाती है। इसके बावजूद हिमालयन शृंखला में 20 मिलीमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जो कि खतरनाक संकेत हैं।
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प्रो. जावेद ने बताया कि सेटेलाइट डाटा और हाई रेजोल्यूशन कैमरे की मदद से चंडीगढ़ की जमीनी हकीकत देखी गई। इससे पता चला कि चंडीगढ़ में जमीन की सतह 35 मिलीमीटर बदली है। चंडीगढ़ से 20 किलोमीटर आगे पिंजौर में जमीन की सतह 6-12 मीटर बदल चुकी है। शिमला में कालका के पास तकसाल फाल्ट का अध्ययन किया गया है।
यहां जमीन का मूवमेंट अलग तरह से दिखाई पड़ रहा है। उत्तराखंड, यूपी के कुछ हिस्सों में भी जमीन की सतह में परिवर्तन हुआ है। इसका मतलब है कि यहां एक्टिव फाल्ट बने हैं, जो कि भूकंप के बड़े कारण हैं। जमीनी प्लेट ऊपर, नीचे या फिर एक दूसरे से भिड़ने की स्थिति में है। दबाव भी बना है।
ऐसे में अगर प्लेट टूटा तो भूकंप आएगा। यह भूकंप यूपी सहित कई प्रदेशों में तबाही मचा सकता है। क्योंकि इसका केंद्र हिमालय शृंखला है, जिसकी दूरी उत्तराखंड, यूपी, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित अन्य राज्यों से कम है। कम दूरी पर ज्यादा नुकसान होता है।
आईआईटी के विज्ञानी ने कहा कि हिमालयन शृंखला में शोध की जरूरत है। इसका प्रस्ताव मिनिस्ट्री आफ अर्थ साइंस को भेजा जा चुका है। शोध से भूकंप कब आएगा और कितना नुकसान होगा, इसका आकलन किया जा सकता है। ऐसा हुआ तो जनहानि से बचा जा सकेगा। प्राकृतिक आपदा से निपटने का खाका पहले तैयार किया जा सकेगा।
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वर्ष 2001-2010 तक काम किया, फिर चंडीगढ़ सहित तीन स्थानों पर भूकंप आने के संकेत दिए। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जनरल में रिसर्च पेपर भी प्रकाशित कराया। प्रो. जावेद ने बताया कि हिमालयन क्षेत्र में 10 हजार साल पहले की गतिविधि अभी बनी है।
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जो स्थिति है, उसके मुताबिक हिमालय हर साल 1 मिलीमीटर बढ़ रहा है। साल भर में बंगलूरू और तिब्बतियन प्लेट की आंतरिक दूरी 50 मिलीमीटर कम हो रही है। हालांकि बंगलूरू की तरफ से पांच मिलीमीटर प्लेट जाती है। इसके बावजूद हिमालयन शृंखला में 20 मिलीमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जो कि खतरनाक संकेत हैं।
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प्रो. जावेद ने बताया कि सेटेलाइट डाटा और हाई रेजोल्यूशन कैमरे की मदद से चंडीगढ़ की जमीनी हकीकत देखी गई। इससे पता चला कि चंडीगढ़ में जमीन की सतह 35 मिलीमीटर बदली है। चंडीगढ़ से 20 किलोमीटर आगे पिंजौर में जमीन की सतह 6-12 मीटर बदल चुकी है। शिमला में कालका के पास तकसाल फाल्ट का अध्ययन किया गया है।
यहां जमीन का मूवमेंट अलग तरह से दिखाई पड़ रहा है। उत्तराखंड, यूपी के कुछ हिस्सों में भी जमीन की सतह में परिवर्तन हुआ है। इसका मतलब है कि यहां एक्टिव फाल्ट बने हैं, जो कि भूकंप के बड़े कारण हैं। जमीनी प्लेट ऊपर, नीचे या फिर एक दूसरे से भिड़ने की स्थिति में है। दबाव भी बना है।
ऐसे में अगर प्लेट टूटा तो भूकंप आएगा। यह भूकंप यूपी सहित कई प्रदेशों में तबाही मचा सकता है। क्योंकि इसका केंद्र हिमालय शृंखला है, जिसकी दूरी उत्तराखंड, यूपी, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित अन्य राज्यों से कम है। कम दूरी पर ज्यादा नुकसान होता है।
आईआईटी के विज्ञानी ने कहा कि हिमालयन शृंखला में शोध की जरूरत है। इसका प्रस्ताव मिनिस्ट्री आफ अर्थ साइंस को भेजा जा चुका है। शोध से भूकंप कब आएगा और कितना नुकसान होगा, इसका आकलन किया जा सकता है। ऐसा हुआ तो जनहानि से बचा जा सकेगा। प्राकृतिक आपदा से निपटने का खाका पहले तैयार किया जा सकेगा।