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रेमडेसिविर इंजेक्शन का मामला: सिस्टर इंचार्ज, फार्मासिस्ट समेत नौ के बयान, डॉक्टरों पर रहम
Tue, 22 Jun 2021 12:07 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Tue, 22 Jun 2021 12:07 AM IST
सार
रेमडेसिविर इंजेक्शन जारी करने से लेकर मरीज को लगाने तक की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ की। हालांकि डॉक्टरों को जांच में शामिल नहीं किया गया है, जबकि इंजेक्शन जारी होेने से लेकर मरीज को लगने तक डॉक्टर की भी अहम भूमिका है।
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हैलट अस्पताल
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
कानपुर हैलट में मरीजों की मौत के बाद भी रेमडेसिविर इंजेक्शन जारी कराने के मामले में सोमवार को सीएमओ की ओर से तैनात प्रतिनिधि एसीएमओ डॉ. सुबोध प्रकाश ने न्यूरो साइंसेज वार्ड में तैनात सिस्टर इंचार्ज, फार्मासिस्ट समेत आठ सिस्टरों से पूछताछ की। साथ ही लिखित बयान भी लिए।
एसीएमओ ने रेमडेसिविर इंजेक्शन जारी करने से लेकर मरीज को लगाने तक की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ की। हालांकि डॉक्टरों को जांच में शामिल नहीं किया गया है, जबकि इंजेक्शन जारी होेने से लेकर मरीज को लगने तक डॉक्टर की भी अहम भूमिका है। हैलट पहुंचे डॉ. सुबोध प्रकाश ने सबसे पहले हैलट की प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ज्योति सक्सेना से अस्पताल टीम की जांच रिपोर्ट के संबंध में जानकारी ली।
इसके बाद न्यूरो साइंसेज में तैनात फार्मासिस्ट नागेंद्र बाजपेई से आधा घंटे पूछताछ की। इसके बाद न्यूरो साइंसेज के अधीक्षक डॉ. प्रेम सिंह, सिस्टर इंचार्ज और न्यूरो साइंसेज में तैनात सभी आठ अन्य स्टाफ नर्स (सिस्टर) से अलग-अलग पूछताछ कर लिखित बयान लिए। डॉ. प्रेेम सिंह ने रेमडेसिविर के जारी होने से लेकर मरीज तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया के बार में बताया। हालांकि मरीज के मौत के बाद भी इंजेक्शन कैसे जारी हुए, इस संबंध में फार्मासिस्ट को छोड़कर सबका बयान एक था।
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एसीएमओ ने रेमडेसिविर इंजेक्शन जारी करने से लेकर मरीज को लगाने तक की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ की। हालांकि डॉक्टरों को जांच में शामिल नहीं किया गया है, जबकि इंजेक्शन जारी होेने से लेकर मरीज को लगने तक डॉक्टर की भी अहम भूमिका है। हैलट पहुंचे डॉ. सुबोध प्रकाश ने सबसे पहले हैलट की प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ज्योति सक्सेना से अस्पताल टीम की जांच रिपोर्ट के संबंध में जानकारी ली।
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इसके बाद न्यूरो साइंसेज में तैनात फार्मासिस्ट नागेंद्र बाजपेई से आधा घंटे पूछताछ की। इसके बाद न्यूरो साइंसेज के अधीक्षक डॉ. प्रेम सिंह, सिस्टर इंचार्ज और न्यूरो साइंसेज में तैनात सभी आठ अन्य स्टाफ नर्स (सिस्टर) से अलग-अलग पूछताछ कर लिखित बयान लिए। डॉ. प्रेेम सिंह ने रेमडेसिविर के जारी होने से लेकर मरीज तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया के बार में बताया। हालांकि मरीज के मौत के बाद भी इंजेक्शन कैसे जारी हुए, इस संबंध में फार्मासिस्ट को छोड़कर सबका बयान एक था।
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व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजने होती है मरीज की बीएचटी
कोविड मरीजों को लगने वाला इंजेक्शन व्हाट्सएप ग्रुप पर जारी होता था। इसके लिए उप प्रधानाचार्य डॉ. रिचा गिरि ने 26 जुलाई 2020 को एक लिखित आदेश जारी किया था। इसमें लिखा था कि संक्रमित मरीजों को इंजेक्शन लगाने से पहले उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप पर बीएचटी (बेड हेड टिकट) की मुख्य पेज की कॉपी, मांग पत्र, चिकित्सकीय परामर्श व डॉक्टर के नाम संबंधित अन्य विवरण व्हाट्सएप करेंगे। इसके बाद रेमडेसिविर जारी किया जाएगा। हालांकि उनके द्वारा बनाए गए ग्रुप में चीफ फार्मासिस्ट के अलावा कुछ डॉक्टर ही थे। एडमिन खुद डॉ. रिचा गिरि थीं।
फार्मासिस्ट को थी रेमडेसिविर इंजेक्शन लाने की जिम्मेदारी
कोविड वार्ड में भर्ती मरीज को देखने वाला डॉक्टर मरीज की बीएचटी की फोटो डॉ. रिचा द्वारा बनाए गए ग्रुप में भेजता है। बीएचटी और मरीज की हालत देखने के बाद डॉ. रिचा व्हाट्सएप पर ही अप्रूव कर देती हैं। इसके बाद हैलट में स्थित मेन स्टोर को कॉल कर सूचना दी जाती है।
वहीं मरीज की देखरेख में लगे डॉक्टर वार्ड के फार्मासिस्ट को मरीज का इंडेट बनाकर इंजेक्शन लाने को कहते हैं। इसके बाद फार्मासिस्ट इंजेक्शन लाता है। सील तोड़कर इंजेक्शन वार्ड ब्वॉय को सौंप देता है। इसके बाद वार्ड में ड्यूटी पर तैनात सिस्टर डॉक्टर की मौजूदगी में मरीज को इंजेक्शन लगाती है।
खाली वॉयल को फार्मासिस्ट को सौंप दिया जाता है। फार्मासिस्ट उसकी फोटो खींचकर दोबारा ग्रुप पर भेज देता है। ऐसे में रेमडेसिविर इंजेक्शन जारी करने और लाने की जिम्मेदारी में डॉक्टर और फार्मासिस्ट की अहम भूमिका रहती है। जांच से डॉक्टरों को बाहर रखा गया है। इस वजह से नर्सिंग स्टाफ में रोष व्याप्त है।
कोविड मरीजों को लगने वाला इंजेक्शन व्हाट्सएप ग्रुप पर जारी होता था। इसके लिए उप प्रधानाचार्य डॉ. रिचा गिरि ने 26 जुलाई 2020 को एक लिखित आदेश जारी किया था। इसमें लिखा था कि संक्रमित मरीजों को इंजेक्शन लगाने से पहले उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप पर बीएचटी (बेड हेड टिकट) की मुख्य पेज की कॉपी, मांग पत्र, चिकित्सकीय परामर्श व डॉक्टर के नाम संबंधित अन्य विवरण व्हाट्सएप करेंगे। इसके बाद रेमडेसिविर जारी किया जाएगा। हालांकि उनके द्वारा बनाए गए ग्रुप में चीफ फार्मासिस्ट के अलावा कुछ डॉक्टर ही थे। एडमिन खुद डॉ. रिचा गिरि थीं।
फार्मासिस्ट को थी रेमडेसिविर इंजेक्शन लाने की जिम्मेदारी
कोविड वार्ड में भर्ती मरीज को देखने वाला डॉक्टर मरीज की बीएचटी की फोटो डॉ. रिचा द्वारा बनाए गए ग्रुप में भेजता है। बीएचटी और मरीज की हालत देखने के बाद डॉ. रिचा व्हाट्सएप पर ही अप्रूव कर देती हैं। इसके बाद हैलट में स्थित मेन स्टोर को कॉल कर सूचना दी जाती है।
वहीं मरीज की देखरेख में लगे डॉक्टर वार्ड के फार्मासिस्ट को मरीज का इंडेट बनाकर इंजेक्शन लाने को कहते हैं। इसके बाद फार्मासिस्ट इंजेक्शन लाता है। सील तोड़कर इंजेक्शन वार्ड ब्वॉय को सौंप देता है। इसके बाद वार्ड में ड्यूटी पर तैनात सिस्टर डॉक्टर की मौजूदगी में मरीज को इंजेक्शन लगाती है।
खाली वॉयल को फार्मासिस्ट को सौंप दिया जाता है। फार्मासिस्ट उसकी फोटो खींचकर दोबारा ग्रुप पर भेज देता है। ऐसे में रेमडेसिविर इंजेक्शन जारी करने और लाने की जिम्मेदारी में डॉक्टर और फार्मासिस्ट की अहम भूमिका रहती है। जांच से डॉक्टरों को बाहर रखा गया है। इस वजह से नर्सिंग स्टाफ में रोष व्याप्त है।