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Kanpur News: चकरनगर के राजा निरंजन सिंह ने उड़ाए थे अंग्रेजों के होश
Thu, 15 Aug 2024 03:02 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
Updated Thu, 15 Aug 2024 03:02 AM IST
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स्वतंत्रता दिवस विशेष
फोटो 29
सन 1860 में अंग्रेजों ने भेज दिया था काला पानी
संवाद न्यूज एजेंसी
चकरनगर। आजादी के आंदोलन के बीच चंबल इलाके के राजाओं ने भी अपनी साहस वीरता का पराक्रम दिखाने में कोई कमी नहीं रखी थी। हालांकि आजादी से जुड़े चंबल के गौरवशाली इतिहास की चर्चा बहुतेरे कारणों से नहीं हो पाती है।
पृथ्वीराज चौहान के एक सेनापति सामंतराव ने अपनी बची सैन्य शक्ति को संगठित कर इटावा व आसपास के इलाकों में अपना राज्य स्थापित किया था। वर्ष 1857 में इसी चकरनगर रियासत के राजा कुशल पाल सिंह चौहान थे। आजादी की जंग का शंखनाद होते ही राजा कुशल पाल और उनके पुत्र निरंजन सिंह जूदेव दोआब क्षेत्र को आजादी की लड़ाई की अग्रिम चौकी में बदल दिया। राजा कुशलपाल जनता में बेहद लोकप्रिय थे।
उनके पुत्र निरंजन सिंह युद्धकला में दक्ष थे उनको अपना कन्हैया घोड़ा, सह योद्धा मंगली और जंगली प्राणों से अधिक प्रिय थे। आजादी की जंग में दोआब क्षेत्र के बागी सिपाहियों, किसानों तथा जनता के सभी समुदायों ने उनके नेतृत्व को स्वीकार किया। निरंजन सिंह की वीरता और सैन्य शक्ति की कीर्त चारों तरफ फैल गयी थी।
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यही कारण रहा कि ब्रिटिश शासकों ने एक बड़ी फौज लेकर जुहीखा घाट पर हमला कर दिया और दोआब इलाके में दाखिल होने की कोशिश की। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व इटावा के कलेक्टर एओ ह्यूम कर रहे थे। इस युद्ध में दोआब के रणबांकुरों के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या कुशवाह धार के योद्धाओं ने वीर योद्धा चिमना के नेतृत्व में हिस्सा लिया। दोनों पक्षों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए लेकिन अंग्रेज दोआब इलाके में दाखिल नहीं हो सके।
ठुकरा दिया था अंग्रेजों का पेंशन का प्रस्ताव
सन 1857 में अंग्रेज अलग अलग रियासतों के राजाओं को पेंशन का प्रस्ताव देकर गुलाम बना रहे थे। अग्रेजों ने चकरनगर के राजा निरंजन सिंह जूदेव को भी दो सौ रुपये मासिक पेंशन देने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने यह खैंरात टुकराते हुए गुलामी स्वीकारने से इन्कार कर दिया था। अंग्रेजों को यह बात बुरी लग गयी नतीजन जंग शुरू हो गई। सन 1857 से लेकर 1860 तक राजा निरंजन सिंह अंग्रेजों के दांत खट्टे करते रहे। इसके बाद एक समय वह आया जा इस महायोद्धा को अग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर काला पानी भेज दिया। यही नहीं उनके किले को भी तोपों से उड़ा दिया गया। आज भी यहां मौजूद खण्डर किला अपनी कहानी बयां कर रहा है।
सरकार वंसजों को दे सुविधाएं
राजा निरंजन सिंह जू देव के वंसज विजय प्रताप सिंह जू देव ने सरकार ओर प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगते हुए कहा हामरे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई फिर सरकार से हम लोगों को कोई सुबिधा नही मिली। किला खंडर हो रहा हैं सरकार इस ओर ध्यान नही दे रही हैं। सरकार को किले का जीर्णोद्धार कराना चाहिए।
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फोटो 29
सन 1860 में अंग्रेजों ने भेज दिया था काला पानी
संवाद न्यूज एजेंसी
चकरनगर। आजादी के आंदोलन के बीच चंबल इलाके के राजाओं ने भी अपनी साहस वीरता का पराक्रम दिखाने में कोई कमी नहीं रखी थी। हालांकि आजादी से जुड़े चंबल के गौरवशाली इतिहास की चर्चा बहुतेरे कारणों से नहीं हो पाती है।
पृथ्वीराज चौहान के एक सेनापति सामंतराव ने अपनी बची सैन्य शक्ति को संगठित कर इटावा व आसपास के इलाकों में अपना राज्य स्थापित किया था। वर्ष 1857 में इसी चकरनगर रियासत के राजा कुशल पाल सिंह चौहान थे। आजादी की जंग का शंखनाद होते ही राजा कुशल पाल और उनके पुत्र निरंजन सिंह जूदेव दोआब क्षेत्र को आजादी की लड़ाई की अग्रिम चौकी में बदल दिया। राजा कुशलपाल जनता में बेहद लोकप्रिय थे।
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उनके पुत्र निरंजन सिंह युद्धकला में दक्ष थे उनको अपना कन्हैया घोड़ा, सह योद्धा मंगली और जंगली प्राणों से अधिक प्रिय थे। आजादी की जंग में दोआब क्षेत्र के बागी सिपाहियों, किसानों तथा जनता के सभी समुदायों ने उनके नेतृत्व को स्वीकार किया। निरंजन सिंह की वीरता और सैन्य शक्ति की कीर्त चारों तरफ फैल गयी थी।
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यही कारण रहा कि ब्रिटिश शासकों ने एक बड़ी फौज लेकर जुहीखा घाट पर हमला कर दिया और दोआब इलाके में दाखिल होने की कोशिश की। ब्रिटिश सेना का नेतृत्व इटावा के कलेक्टर एओ ह्यूम कर रहे थे। इस युद्ध में दोआब के रणबांकुरों के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या कुशवाह धार के योद्धाओं ने वीर योद्धा चिमना के नेतृत्व में हिस्सा लिया। दोनों पक्षों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हुए लेकिन अंग्रेज दोआब इलाके में दाखिल नहीं हो सके।
ठुकरा दिया था अंग्रेजों का पेंशन का प्रस्ताव
सन 1857 में अंग्रेज अलग अलग रियासतों के राजाओं को पेंशन का प्रस्ताव देकर गुलाम बना रहे थे। अग्रेजों ने चकरनगर के राजा निरंजन सिंह जूदेव को भी दो सौ रुपये मासिक पेंशन देने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने यह खैंरात टुकराते हुए गुलामी स्वीकारने से इन्कार कर दिया था। अंग्रेजों को यह बात बुरी लग गयी नतीजन जंग शुरू हो गई। सन 1857 से लेकर 1860 तक राजा निरंजन सिंह अंग्रेजों के दांत खट्टे करते रहे। इसके बाद एक समय वह आया जा इस महायोद्धा को अग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर काला पानी भेज दिया। यही नहीं उनके किले को भी तोपों से उड़ा दिया गया। आज भी यहां मौजूद खण्डर किला अपनी कहानी बयां कर रहा है।
सरकार वंसजों को दे सुविधाएं
राजा निरंजन सिंह जू देव के वंसज विजय प्रताप सिंह जू देव ने सरकार ओर प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगते हुए कहा हामरे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई फिर सरकार से हम लोगों को कोई सुबिधा नही मिली। किला खंडर हो रहा हैं सरकार इस ओर ध्यान नही दे रही हैं। सरकार को किले का जीर्णोद्धार कराना चाहिए।