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Kanpur News: एनीमिया और कुपोषण दूर करेगी क्वीन ऑफ नाइट
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कानपुर। कमलम फल जिसे ड्रैगन फ्रूट और क्वीन ऑफ नाइट भी कहा जाता है अब एनीमिया और कुपोषण दूर करेगा। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) इस फल को घरों की छतों, किचन गार्डन और खेतों में लगाने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से इसके प्रति जागरूकता फैलाई जा रही है। इसे खेतों की मेढ़ों, खाली पड़ी जगहों पर लगाया जाएगा।
सीएसए के निदेशक प्रसार एवं डीन उद्यान संकाय प्रो. वीके त्रिपाठी ने बताया कि इस फल में आयरन, विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं। इसे सेंट्रल यूपी और बुंदेलखंड क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाने की योजना है। यह कैक्टस परिवार का पौधा है और एक पेड़ 25–30 वर्ष तक उत्पादन दे सकता है। हर केवीके पर इले लगाने के लिए कहा गया है। फल की तीन प्रजातियां होती हैं सफेद, गुलाबी और पीला गूदा वाली। बाजार में यह फल 60–70 रुपये तक बिकता है। इसे जैम, जूस और आइसक्रीम के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है। इसका उद्देश्य खाली भूमि का उपयोग कर किसानों को अतिरिक्त आय कराना है।
खासियत
जून से सितंबर के बीच इसमें फूल आते हैं और 25–30 दिन में फल तैयार हो जाता है। यह कम कैलोरी वाला सुपर फूड है जिसमें लगभग 85 प्रतिशत पानी पाया जाता है। पौधा लगाने के दूसरे साल से फल आने लगते हैं। तीसरे वर्ष के बाद औसत उपज 12 से 15 टन प्रति हेक्टेयर होती है
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सीएसए के निदेशक प्रसार एवं डीन उद्यान संकाय प्रो. वीके त्रिपाठी ने बताया कि इस फल में आयरन, विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं। इसे सेंट्रल यूपी और बुंदेलखंड क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाने की योजना है। यह कैक्टस परिवार का पौधा है और एक पेड़ 25–30 वर्ष तक उत्पादन दे सकता है। हर केवीके पर इले लगाने के लिए कहा गया है। फल की तीन प्रजातियां होती हैं सफेद, गुलाबी और पीला गूदा वाली। बाजार में यह फल 60–70 रुपये तक बिकता है। इसे जैम, जूस और आइसक्रीम के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है। इसका उद्देश्य खाली भूमि का उपयोग कर किसानों को अतिरिक्त आय कराना है।
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खासियत
जून से सितंबर के बीच इसमें फूल आते हैं और 25–30 दिन में फल तैयार हो जाता है। यह कम कैलोरी वाला सुपर फूड है जिसमें लगभग 85 प्रतिशत पानी पाया जाता है। पौधा लगाने के दूसरे साल से फल आने लगते हैं। तीसरे वर्ष के बाद औसत उपज 12 से 15 टन प्रति हेक्टेयर होती है
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