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राष्ट्रपति का दौरा: अफसरों की चिंताओं में शामिल नहीं आपकी चिंता, कानपुर की जनसमस्याओं को देख हरबार हुए आहत
Sat, 26 Jun 2021 10:38 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 26 Jun 2021 10:38 AM IST
सार
राष्ट्रपति जी, अफसर भले ही आपकी चिंताओं पर पर्दा डालने की कोशिश करें, लेकिन अमर उजाला इसे हर बार उजागर करता रहेगा।
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राष्ट्रपति की कानपुर यात्रा
- फोटो : amar ujala
विस्तार
राष्ट्रपति जी, आप जब भी अपने शहर कानपुर आए, हर बार यहां की जनसमस्याओं को देखकर आहत हुए। किसी न किसी बात को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। राष्ट्रपति रहते हुए यहां के दमघोंटू प्रदूषण, सड़कों पर पसरी गंदगी, टूटी सड़कें, जलभराव, बेतरतीब ट्रैफिक को लेकर सार्वजनिक मंच से टिप्पणियां तक कीं। यहां तक कहा कि कानपुर के दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार होने की खबर दिल्ली में पढ़ते हैं तो मन को पीड़ा पहुंचती है।
आपने अपने संबोधनों में हर बार अफसरों और जनप्रतिनिधियों को यही संदेश देने का प्रयास किया कि यह शहर हमेशा तरक्की पसंद रहा है। यहां विकास की रफ्तार बरकरार रहनी चाहिए। बावजूद इसके बीते लगभग चार साल में आपकी चिताएं यहां के अफसरों की चिंताओं में शामिल नहीं हो सकीं। राष्ट्रपति जी, अफसर भले ही आपकी चिंताओं पर पर्दा डालने की कोशिश करें, लेकिन अमर उजाला इसे हर बार उजागर करता रहेगा।
वो सड़क तो अभी भी वैसी ही
राष्ट्रपति जी, वर्ष-2019 में जब आप शहर आए थे तो गार्डेनिया पब्लिक स्कूल के प्रबंधक सौरभ द्विवेदी से कल्याणपुर स्थित गूबा गार्डन की सड़क का हाल पूछा था। आप आश्चर्य चकित होकर बोले थे, ‘अरे वो सड़क अभी भी वैसी ही है’। दुर्भाग्य ही है कि आपके चिंता जाहिर करने के दो साल बाद भी वो सड़क अभी भी वैसी है।
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स्कूल के प्रबंधक ने बहुत दौड़भाग की, लेकिन वे सड़क नहीं बनवा पाए। स्थानीय लोग अफसरों के इस रवैये से आपकी तरह ही बहुत आहत हैं। स्थानीय निवासी गिरिजा शंकर बताते हैं कि यह सड़क बीते सात साल से नहीं बनी। मुकेश दुबे का दर्द है कि जलभराव की वजह से बच्चे फिसलकर गिरते हैं। जीवन नर्क है। वे कहते हैं कि राष्ट्रपति के हाल पूछने के बाद भी दशा नहीं सुधरी तो अब किससे उम्मीद करें।
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आपने अपने संबोधनों में हर बार अफसरों और जनप्रतिनिधियों को यही संदेश देने का प्रयास किया कि यह शहर हमेशा तरक्की पसंद रहा है। यहां विकास की रफ्तार बरकरार रहनी चाहिए। बावजूद इसके बीते लगभग चार साल में आपकी चिताएं यहां के अफसरों की चिंताओं में शामिल नहीं हो सकीं। राष्ट्रपति जी, अफसर भले ही आपकी चिंताओं पर पर्दा डालने की कोशिश करें, लेकिन अमर उजाला इसे हर बार उजागर करता रहेगा।
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वो सड़क तो अभी भी वैसी ही
राष्ट्रपति जी, वर्ष-2019 में जब आप शहर आए थे तो गार्डेनिया पब्लिक स्कूल के प्रबंधक सौरभ द्विवेदी से कल्याणपुर स्थित गूबा गार्डन की सड़क का हाल पूछा था। आप आश्चर्य चकित होकर बोले थे, ‘अरे वो सड़क अभी भी वैसी ही है’। दुर्भाग्य ही है कि आपके चिंता जाहिर करने के दो साल बाद भी वो सड़क अभी भी वैसी है।
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स्कूल के प्रबंधक ने बहुत दौड़भाग की, लेकिन वे सड़क नहीं बनवा पाए। स्थानीय लोग अफसरों के इस रवैये से आपकी तरह ही बहुत आहत हैं। स्थानीय निवासी गिरिजा शंकर बताते हैं कि यह सड़क बीते सात साल से नहीं बनी। मुकेश दुबे का दर्द है कि जलभराव की वजह से बच्चे फिसलकर गिरते हैं। जीवन नर्क है। वे कहते हैं कि राष्ट्रपति के हाल पूछने के बाद भी दशा नहीं सुधरी तो अब किससे उम्मीद करें।
आपके लोग धूल भरी हवा फांक रहे
राष्ट्रपति जी, आपने कानपुर के प्रदूषण को लेकर चिंता जाहिर की थी। वो दमघोंटू प्रदूषण जस का तस है। अभी कुछ दिन पहले ही नालों की सफाई हुई थी। सिल्ट सड़कों पर छोड़ दी गई। बारिश हुई तो सिल्ट सड़कों पर बह निकली। वही सिल्ट धूप में सूखकर धूल बन हवा में मिल गई है। धूल के कण जब चेहरे से टकराते हैं तो पता चलता है कि ये फेफड़ों के लिए कितने नुकसानदायक होंगे।
कानपुर के लोग इसी दशा में जीने को मजबूर हैं। अफसरों ने आपकी इस चिंता को भी हवा में उड़ा दिया। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के मंडल अध्यक्ष आलोक अग्रवाल कहते हैं कि सबसे बुरी हालत तो औद्योगिक क्षेत्रों की है। ट्रक चलते हैं तो धूल फैक्ट्रियों के अंदर तक आती है।
सफाई छोड़िए, खुद फैला रहे गंदगी
राष्ट्रपति जी, आपने कानपुर से ही ‘स्वच्छता ही सेवा’ का संदेश पूरे देश को दिया था। कभी आप अचानक से यहां की सड़कों पर घूमिए तो पता चलेगा कि यहां के अफसरों ने आपके इस संदेश का कितनी गहराई से अमल किया। सफाई छोड़िए, यहां के अफसर ही शहर को गंदा करने पर तुले हैं। शहर की दर्जनों मुख्य सड़कें ऐसी मिलेंगी, जहां पर नगर निगम खुद ही कूड़ा डाल रहा है।
नमक फैक्ट्री चौराहे से छपेड़ा पुलिया के बीच, विजयनगर से फजलगंज के बीच, नौबस्ता से बंबा के बीच फुटपाथों पर कूड़े के ढेर हर समय दिख जाएंगे। यहां के लोगों का जीवन नर्क से कम नहीं है। छपेड़ा पुलिया के राघवेंद्र बताते हैं कि कूड़े की सड़ांध की वजह से सांस लेना मुश्किल होता है। शहर स्मार्ट सिटी भले ही न बने, लेकिन किसी के घर के सामने कूड़ा तो न पड़े।
हर चौराहे पर सिग्नल, पर कंट्रोल नहीं
राष्ट्रपति जी, आपने यहां के बिगड़ैल यातायात पर भी चिंता जाहिर की थी। इस पर अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ। ट्रैफिक पुलिस ने केडीए के साथ मिलकर शहर में 32 करोड़ की लागत से ट्रैफिक सिग्नल और सीसीटीवी कैमरे चार साल पहले लगवाए थे। ये साल दर साल खराब होते जा रहे हैं, लेकिन चालू नहीं हो सके।
68 चौराहों पर सिग्नल लग चुके हैं, कुछेक को छोड़कर इन पर कंट्रोल किसी का नहीं। कोरोना की वजह से अभी भले ही सड़कों पर भीड़ कम दिखे, लेकिन जब कर्फ्यू खुलता है तो छोटे से छोटे चौराहों पर लोग जाम से जूझ उठते हैं। जनता की कमाई 32 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी उन्हें जाम या बेतरतीब ट्रैैफिक से राहत नहीं मिली है।
राष्ट्रपति जी, आपने कानपुर के प्रदूषण को लेकर चिंता जाहिर की थी। वो दमघोंटू प्रदूषण जस का तस है। अभी कुछ दिन पहले ही नालों की सफाई हुई थी। सिल्ट सड़कों पर छोड़ दी गई। बारिश हुई तो सिल्ट सड़कों पर बह निकली। वही सिल्ट धूप में सूखकर धूल बन हवा में मिल गई है। धूल के कण जब चेहरे से टकराते हैं तो पता चलता है कि ये फेफड़ों के लिए कितने नुकसानदायक होंगे।
कानपुर के लोग इसी दशा में जीने को मजबूर हैं। अफसरों ने आपकी इस चिंता को भी हवा में उड़ा दिया। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के मंडल अध्यक्ष आलोक अग्रवाल कहते हैं कि सबसे बुरी हालत तो औद्योगिक क्षेत्रों की है। ट्रक चलते हैं तो धूल फैक्ट्रियों के अंदर तक आती है।
सफाई छोड़िए, खुद फैला रहे गंदगी
राष्ट्रपति जी, आपने कानपुर से ही ‘स्वच्छता ही सेवा’ का संदेश पूरे देश को दिया था। कभी आप अचानक से यहां की सड़कों पर घूमिए तो पता चलेगा कि यहां के अफसरों ने आपके इस संदेश का कितनी गहराई से अमल किया। सफाई छोड़िए, यहां के अफसर ही शहर को गंदा करने पर तुले हैं। शहर की दर्जनों मुख्य सड़कें ऐसी मिलेंगी, जहां पर नगर निगम खुद ही कूड़ा डाल रहा है।
नमक फैक्ट्री चौराहे से छपेड़ा पुलिया के बीच, विजयनगर से फजलगंज के बीच, नौबस्ता से बंबा के बीच फुटपाथों पर कूड़े के ढेर हर समय दिख जाएंगे। यहां के लोगों का जीवन नर्क से कम नहीं है। छपेड़ा पुलिया के राघवेंद्र बताते हैं कि कूड़े की सड़ांध की वजह से सांस लेना मुश्किल होता है। शहर स्मार्ट सिटी भले ही न बने, लेकिन किसी के घर के सामने कूड़ा तो न पड़े।
हर चौराहे पर सिग्नल, पर कंट्रोल नहीं
राष्ट्रपति जी, आपने यहां के बिगड़ैल यातायात पर भी चिंता जाहिर की थी। इस पर अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ। ट्रैफिक पुलिस ने केडीए के साथ मिलकर शहर में 32 करोड़ की लागत से ट्रैफिक सिग्नल और सीसीटीवी कैमरे चार साल पहले लगवाए थे। ये साल दर साल खराब होते जा रहे हैं, लेकिन चालू नहीं हो सके।
68 चौराहों पर सिग्नल लग चुके हैं, कुछेक को छोड़कर इन पर कंट्रोल किसी का नहीं। कोरोना की वजह से अभी भले ही सड़कों पर भीड़ कम दिखे, लेकिन जब कर्फ्यू खुलता है तो छोटे से छोटे चौराहों पर लोग जाम से जूझ उठते हैं। जनता की कमाई 32 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी उन्हें जाम या बेतरतीब ट्रैैफिक से राहत नहीं मिली है।