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फिर याद आई ‘गांव की माटी, माटी वाला घर’
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Wed, 26 Jul 2017 04:18 PM IST
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का गांव
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नवनिर्वाचित राष्ट्रपति पर ग्रामीण परिवेश की गहरी छाप है। गरीब तबके के ग्रामीण का दर्द, उसकी चुनौतियाें को वो बार-बार सामने ला रहे हैं। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद और मंगलवार को शपथ लेने के बाद उन्होंने अपने गांव परौंख, गांव के घर को याद किया। आधुनिक भारत के राष्ट्रपति का ग्रामीण भारत से यह लगाव कोई नई मिसाल पेश कर सकता है।
देश समेत कानपुर का क्षेत्र जब राष्ट्रपति के शपथ लेने पर खुशी में सराबोर था तब शपथ ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में कोविंद ने गांव के मिट्टी को याद किया। गांव में मिट्टी के उस घर का जिक्र कर लोगों को बता दिया कि उनकी बुनियाद गांव और बहुत सीमित संसाधन वाला परिवेश रहा है।
मतदान के दिन विजयी घोषित होने पर भी उन्होंने कहा था कि उनका परिवार फूस की घास वाले कच्चे घर में रहता था। बारिश में छप्पर से पानी टपकता था। भीगने से बचने के लिए पूरा परिवार कोने में दुबक जाता था। यह भी कहा था कि अब वो राष्ट्रपति भवन में ऐसे ही गरीब परिवारों के प्रतिनिधि हैं। यह गांवों और गरीबों के प्रति उनके सरोकार को दर्शाता है। आज भी देश के अन्य गांवों की तरह उनके गांव के कई मकान कच्चे और संसाधन विहीन हैं। बेशक उनके गांव का मकान आज पक्का हो गया है जिसे उन्होंने ग्रामीणों के सामूहिक कार्यक्रमों, शादी व अन्य आयोजनों के लिए दान कर दिया है।
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उनका संबोधन सुनने के बाद ग्रामीण उनके पुराने दिनों की चर्चा करने लगे। गांव के बुजुर्ग मोतीलाल गुप्ता, सीताराम दोहरे ने बताया कि गरीबी में पले बढ़े और अपनी मेहनत ईमानदारी के साथ कुशल व्यवहार से कोविंद ने यह मुकाम हासिल किया। कोविंद का परिवार बहुत ही साधारण रहा। बड़ी खुशी की बात यह है वह इतना आगे बढ़ने के बाद भी मिट्टी का घर व गांव के लोगों को नहीं भूले। शपथ ग्रहण में उन्होंने अपने मिट्टी के घर का जिक्र कर दिल को छू लिया है।
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देश समेत कानपुर का क्षेत्र जब राष्ट्रपति के शपथ लेने पर खुशी में सराबोर था तब शपथ ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में कोविंद ने गांव के मिट्टी को याद किया। गांव में मिट्टी के उस घर का जिक्र कर लोगों को बता दिया कि उनकी बुनियाद गांव और बहुत सीमित संसाधन वाला परिवेश रहा है।
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मतदान के दिन विजयी घोषित होने पर भी उन्होंने कहा था कि उनका परिवार फूस की घास वाले कच्चे घर में रहता था। बारिश में छप्पर से पानी टपकता था। भीगने से बचने के लिए पूरा परिवार कोने में दुबक जाता था। यह भी कहा था कि अब वो राष्ट्रपति भवन में ऐसे ही गरीब परिवारों के प्रतिनिधि हैं। यह गांवों और गरीबों के प्रति उनके सरोकार को दर्शाता है। आज भी देश के अन्य गांवों की तरह उनके गांव के कई मकान कच्चे और संसाधन विहीन हैं। बेशक उनके गांव का मकान आज पक्का हो गया है जिसे उन्होंने ग्रामीणों के सामूहिक कार्यक्रमों, शादी व अन्य आयोजनों के लिए दान कर दिया है।
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उनका संबोधन सुनने के बाद ग्रामीण उनके पुराने दिनों की चर्चा करने लगे। गांव के बुजुर्ग मोतीलाल गुप्ता, सीताराम दोहरे ने बताया कि गरीबी में पले बढ़े और अपनी मेहनत ईमानदारी के साथ कुशल व्यवहार से कोविंद ने यह मुकाम हासिल किया। कोविंद का परिवार बहुत ही साधारण रहा। बड़ी खुशी की बात यह है वह इतना आगे बढ़ने के बाद भी मिट्टी का घर व गांव के लोगों को नहीं भूले। शपथ ग्रहण में उन्होंने अपने मिट्टी के घर का जिक्र कर दिल को छू लिया है।