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नवरात्रि में बेटियां पूजते हैं, गर्भ में मारने से नहीं हिचकते -प्रणव पंडया

Mon, 08 Oct 2018 08:30 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Updated Mon, 08 Oct 2018 08:30 AM IST
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Pranav Pandya Head of Gayatri parivar statement about girls
गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया - फोटो : अमर उजाला
कानपुरः गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया ने कहा कि बेटी पैदा होगी तो घर में शक्ति आएगी। हम देवी की आराधना करते हैं। नवरात्रि में बेटियों को पूजते हैं लेकिन उन्हें गर्भ में मारने से नहीं हिचकतेे। बेटियों की अहमियत समझने की सीख देते हुए उन्होंने यह भी बताया कि गर्भ में बच्चे के लिंग का निर्धारण पिता से होता है, माता से नहीं, इसलिए बेटा हो या बेटी, इसके लिए मां जिम्मेदार नहीं है। फॉगसी के कार्यक्रम के महिला सशक्तीकरण फोरम में उन्होंने गर्भ संस्कार के संबंध में बताया और सुझाव दिया कि कानपुर प्रदूषित शहर है, यहां प्राणायाम की बहुत जरूरत है। इससे तन और मन की सफाई होगी।
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बच्चा गर्भ में मां के तनाव पर प्रतिक्रिया करता है

Pranav Pandya Head of Gayatri parivar statement about girls
गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया - फोटो : अमर उजाला
डॉ. पंडया ने गर्भ संस्कार के विभिन्न पहलुओं का जिक्र किया और बताया कि बच्चा गर्भ में मां के तनाव पर प्रतिक्रिया करता है। मां अगर अच्छी पुस्तकें पढ़ेंगी तो बच्चे में अच्छे विचार आएंगे। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को सकारात्मक विचार रखने चाहिए। जप करना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी आध्यात्मिक हेल्थ केयर को तवज्जो दी है।


 
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गर्भ संस्कार प्रेगनेंसी के तीसरे महीने से शुरू होता है

Pranav Pandya Head of Gayatri parivar statement about girls
गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया
कार्यक्रम में गायत्री परिवार से जुड़ीं डॉ. गायत्री शर्मा ने बताया कि गर्भ संस्कार प्रेगनेंसी के तीसरे महीने से शुरू होता है। कुपोषित मां के बच्चे को बीमारियों का खतरा अधिक होता है। शिशु में इमोशनल सेंटर सातवें महीने में विकसित होता। आठवें महीने में मेमोरी सेंटर और नवें महीने में आईक्यू और ईक्यू विकसित होता है। गर्भवती के खुश रहने पर सेरोटोनिन, डोपामिन, एनकेफिलीन, एसीटाइहोलीन न्यूरो केमिकल का रिसाव होते है। इनके प्रभाव से शिशु खुशमिजाज, तनावमुक्त, कुशल, पढ़ाई-लिखाई में तेज, निर्णय क्षमता में प्रवीण होता है। गर्भवती के तनाव में रहने से एडरीनलीन, एसीटीएच, कार्टिसोल आदि न्यूरो केमिकल रिसते हैं। इनके प्रभाव से बच्चे की प्रकृति तनावपूर्ण, परेशान, डिप्रेशन और नकारात्मक हो जाती है।  
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