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दिल्ली की ही तरह यूपी के तमाम शहरों की आबोहवा में 'घुल रहा जहर'

Fri, 29 Dec 2017 05:35 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Fri, 29 Dec 2017 05:35 PM IST
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poison in the climate of the cities of uttar pradesh
डेमो पिक

दिल्ली की ही तरह यूपी के बड़े शहरों में शुमार कानपुर और इसके आसपास के जिलों की आबोहवा में अब सांस लेना आसान नहीं रह गया। प्रदूषण की वजह से आम इंसान ही नहीं पशु-पक्षियों का भी दम घुटने लगा है। 

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सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरॉन्मेंट (सीएसई) द्वारा इंडिया हैबिटेट सेंटर दिल्ली में "स्टॉप दैट स्मॉग" समिट का आयोजन किया गया। जिसमें स्थानीय प्रदूषण के स्तर और उससे होने वाली समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर रखने के लिये कानपुर के पत्रकार अमन तिवारी को आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता देश और दुनिया की जानीमानी पर्यावरणविद् और सीएसई की जनरल डायरेक्टर और सुनीता नारायण ने की। अमन ने कहा कि कानपुर प्रदेश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शुमार है। यहां भी खुली हवा में सांस लेने आसान नहीं रह गया है। कार्यक्रम का संचालन सीएसई की पर्यावरण विशेषज्ञ अनुमिता रॉयचौधरी कर रही थीं इस दौरान देशभर से चुनिंदा शहरों के पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था। विशेषज्ञों के समूह चर्चा के दौरान पत्रकार अमन तिवारी ने कानपुर और आसपास के जनपदों में पर्यावरण की समस्याओं को प्रमुखता से रखा।

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फैक्ट्रियां मानकों की खुले आम धज्जियां उड़ा रहीं

poison in the climate of the cities of uttar pradesh
कार्यक्रम में पर्यावरणविद् सुनीता नारायन के साथ अमन तिवारी

खासतौर पर अस्थमा और हृदय रोगियों के लिए आबोहवा में घुला प्रदूषण का जहर खतरे की घंटी बजा रहा है। उन्होंने कहा कि फतेहपुर जनपद के मलवा औद्योगिक क्षेत्र में फैक्ट्रियां मानकों की खुले आम धज्जियां उड़ा रही हैं। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला वेस्ट मैटेरियल आसपास के खेतों में फेंका जा रहा है। जिससे उतपन्न होने वाला क्रोमियम खेतों को बंजर करता जा रहा है। यही नहीं उन खेतों में काम करने वाले मजदूरों के हाथों में चर्म रोग हो रहा है। इसी क्रम में फतेहपुर के चौहट्टा गांव में प्रदूषित पानी की वजह से पूरे गांव को शारीरिक और मानसिक विकलांगता ने जकड़ लिया है।

 

1100 की आबादी वाले गांवों में आधे से ज्यादा लोग विकलांगता से पीड़ित हैं। सरकारी महकमा यह तो स्वीकार कर रहा है कि हालात सामान्य नही हैं मगर इस तरफ कोई कारगर उपाय अभी तक नहीं किये गए हैं। प्रदूषण के रोकथाम के लिए अभी तक प्रदूषणकारियों के विरुद्ध एक भी प्रभावशाली कार्रवाई नही हुई है, जिसे उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सके। प्रदूषण बोर्ड और इससे जुड़ी इकाइयों के पास ठोस कदम के नाम पर होता है तो चालान। उन्होंने कहा कि कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की एक रिसर्च के मुताबिक ध्वनि और वायु प्रदूषण इंसान के मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। इससे मस्तिष्क से निकलने वाले स्वास्थ्य रसायन डोपामीन और सिरोटोनिन असंतुलित हो जाते हैं। इसी के कारण लोगों के स्वभाव में तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। जो उसकी दिनचर्या प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण से बढ़ रही समस्याओं से निपटने के लिए देश में पर्यावरण और स्वाथ्य इमरजेंसी लागू किये जाने की आवश्यकता है।
 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं सीएसई की डायरेक्टर जनरल और पर्यावरणविद सुनीता नारायन ने कहा कि वायु प्रदूषण के कारण यूनाइटेड एयरलाइंस ने दिल्ली की उड़ानें रोक दी हैं। इससे पहले वह दिल्ली आने वाले यात्रियों को मास्क वितरित कर रही थी। उन्होंने कहा कि ये सब तब हो रहा है जब अमेरिका अपने पेट्रोलियम उद्योग का जहरीला कचरा वैश्विक बाजार में खपाने में व्यस्त है और भारत मे हम उसे खरीद रहे हैं। यह बेहद शर्मनाक है। कभी खुल के सांस लेने की वजह रही हवा आज प्रदूषण के चलते घुटन का विषय बन गयी है। इसी दौरान कार्यक्रम का संचालन कर रहीं पर्यावरण विशेषज्ञ अनुमिता रॉयचौधरी ने कहा कि दुनियाभर में माना जा रहा है कि डीजल एक विशेष समस्या है। इससे चलने वाले वाहन पेट्रोल से ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं और इसका उत्सर्जन कैंसरकारी है। लेकिन कम्पनियां डीजल और पेट्रोल के अंतर को भुनाकर लाभ कमा रही हैं। समिट में पत्रकार धनन्जय बिजाली, दिल्ली से तनुश्री गांगुली, चेन्नई से रक्षा, जिम कार्बेट से गीतेश त्रिपाठी और सुसंस्कृति ने अपने विचार रखे।

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