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कानपुर में तैयार हुई बैंगन की नई प्रजाति
आदर्श त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sun, 04 Dec 2016 12:52 PM IST
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एक गुच्छे में लगेंगे पांच से छह बैंगन, किचन गार्डेन के लिए भी उपयोगी
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चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के रिटायर्ड प्रोफेसर (प्लांट ब्रीडिंग) डा. एसपी सचान ने करीब 11 साल की रिसर्च के बाद बैंगन की नई प्रजाति उगाने में सफलता पाई है। उन्होंने इसे सुफला नाम दिया है। सफेद रंग वाली नई प्रजाति के बैंगन की खासियत इसका गुच्छों में उगना और बैंगन के पारंपरिक अवगुण बादीपन से लगभग मुक्त होना है। अगले सीजन से इस प्रजाति के बीज उपलब्ध हो जाएंगे।
बैंगन में पोषक तत्वों के साथ ही अवांछित बादीपन पैदा करने वाले तत्व की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। यह बादीपन पैदा करने वाला तत्व ही बैंगन को बैगनी रंगत देता है। बादी होने के कारण हड्डी रोगों से पीड़ित लोगों को बैंगन नहीं खाने की सलाह दी जाती है। डा. सचान ने बताया कि बैंगन की शुरुआती प्रजातियों में सिर्फ अंडाकार सफेद रंग के फल मिलते थे। इसलिए इनका नाम एगप्लांट रखा गया था। वर्तमान में बैंगनी, हरे, सफेद रंग के बैंगन मिलते हैं। 2004 में हमीरपुर जिले के मिश्रीपुर गांव से सफेद अंडाकार बैंगन का बीज मिला। इसके छोटे आकार को देखकर इसे बड़ा और गुच्छे के रूप में पैदावार करने का विचार आया। इसके लिए इसे गुच्छों में उगने वाले बैंगनी रंग के बैंगनों से क्रास कराने की रिसर्च 2005 में शुरू की। सात जेनरेशन के चक्रों के बाद वर्तमान प्रजाति मिल पाई। बैंगन की लंबाई चार से पांच इंच तक है। डा. सचान ने बताया कि ज्वार की दो प्रजातियों में शोध के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड मिल चुका है। उनके कई शोध प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित होते हैं। नई प्रजाति का बीज तैयार होते ही वह इसका पेटेंट कराएंगे। इसके बाद इसे किसानों को उपलब्ध करा दिया जाएगा।
डा. सचान ने दावा किया है कि सुफला प्रजाति क्वालिटी के साथ क्वांटिटी भी देती है। किसान इसे लगाकर बेहद कम लागत पर भरपूर फसल ले सकते हैं। इसके पौधों में कीट-पतंगे भी नहीं लगेंगे। साथ ही इसमें किसी रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होगी। प्रत्येक पौधे के लिए सिर्फ पांच किलो गोबर की खाद ही पर्याप्त होगी। अगस्त में पौधा लगाने के तीन माह बाद फल लग जाते हैं। अप्रैल माह तक पौधों से फसल ली जा सकेगी। यह किचन गार्डेन के लिए भी सर्वथा उपयुक्त है। छोटे गार्डेन या घरों में बड़े गमलों में मात्र चार-पांच पौधे लगाकर परिवार में सब्जी की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
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डा. सचान ने बताया कि वर्तमान बैंगन की प्रजातियों में खनिज पदार्थ मिलते हैं। इसमें विटामिन नहीं के बराबर और बादीपन का अवगुण होता है। उन्होंने दावा किया कि नई प्रजाति में बैंगन में पाए जाने वाले सभी खनिज पदार्थों के साथ ही विटामिन्स की भी सीमित मात्रा पाई जाती है, वह भी बादीपन की सबसे निम्न मात्रा के साथ। इसमें बैंगन की अन्य प्रजातियों की 25 फीसदी की तुलना में मामूली तौर पर सिर्फ दो फीसदी ही बादीपन के तत्व होंगे।
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बैंगन में पोषक तत्वों के साथ ही अवांछित बादीपन पैदा करने वाले तत्व की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। यह बादीपन पैदा करने वाला तत्व ही बैंगन को बैगनी रंगत देता है। बादी होने के कारण हड्डी रोगों से पीड़ित लोगों को बैंगन नहीं खाने की सलाह दी जाती है। डा. सचान ने बताया कि बैंगन की शुरुआती प्रजातियों में सिर्फ अंडाकार सफेद रंग के फल मिलते थे। इसलिए इनका नाम एगप्लांट रखा गया था। वर्तमान में बैंगनी, हरे, सफेद रंग के बैंगन मिलते हैं। 2004 में हमीरपुर जिले के मिश्रीपुर गांव से सफेद अंडाकार बैंगन का बीज मिला। इसके छोटे आकार को देखकर इसे बड़ा और गुच्छे के रूप में पैदावार करने का विचार आया। इसके लिए इसे गुच्छों में उगने वाले बैंगनी रंग के बैंगनों से क्रास कराने की रिसर्च 2005 में शुरू की। सात जेनरेशन के चक्रों के बाद वर्तमान प्रजाति मिल पाई। बैंगन की लंबाई चार से पांच इंच तक है। डा. सचान ने बताया कि ज्वार की दो प्रजातियों में शोध के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड मिल चुका है। उनके कई शोध प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित होते हैं। नई प्रजाति का बीज तैयार होते ही वह इसका पेटेंट कराएंगे। इसके बाद इसे किसानों को उपलब्ध करा दिया जाएगा।
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डा. सचान ने दावा किया है कि सुफला प्रजाति क्वालिटी के साथ क्वांटिटी भी देती है। किसान इसे लगाकर बेहद कम लागत पर भरपूर फसल ले सकते हैं। इसके पौधों में कीट-पतंगे भी नहीं लगेंगे। साथ ही इसमें किसी रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होगी। प्रत्येक पौधे के लिए सिर्फ पांच किलो गोबर की खाद ही पर्याप्त होगी। अगस्त में पौधा लगाने के तीन माह बाद फल लग जाते हैं। अप्रैल माह तक पौधों से फसल ली जा सकेगी। यह किचन गार्डेन के लिए भी सर्वथा उपयुक्त है। छोटे गार्डेन या घरों में बड़े गमलों में मात्र चार-पांच पौधे लगाकर परिवार में सब्जी की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
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डा. सचान ने बताया कि वर्तमान बैंगन की प्रजातियों में खनिज पदार्थ मिलते हैं। इसमें विटामिन नहीं के बराबर और बादीपन का अवगुण होता है। उन्होंने दावा किया कि नई प्रजाति में बैंगन में पाए जाने वाले सभी खनिज पदार्थों के साथ ही विटामिन्स की भी सीमित मात्रा पाई जाती है, वह भी बादीपन की सबसे निम्न मात्रा के साथ। इसमें बैंगन की अन्य प्रजातियों की 25 फीसदी की तुलना में मामूली तौर पर सिर्फ दो फीसदी ही बादीपन के तत्व होंगे।