किडनी कांड में हर दिन नए खुलासे, एक और कारनामा आया सामने, कुछ इस तरह लोगों को बनाया जाता था शिकार
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कानपुर किडनी कांड में पीएसआरआई के कोऑर्डिनेटरों का बड़ा कारनामा सामने आया है। दोनों कोऑर्डिनेटर डोनरों के सीधे संपर्क में रहते थे। वह अपने कमरे में डोनरों को बुलाकर बाकायदा ट्रेनिंग देते थे। 20 से 25 दिनों के भीतर कोऑर्डिनेटर काउंसलिंग और ट्रेनिंग देकर डोनर को तैयार कर लेते थे।
फोर्टिस हॉस्पिटल की कोऑर्डिनेटर सोनिका डबास अपने साथी शैलेष सक्सेना के जरिए डोनर प्रोवाइडर गिरोह के संपर्क में थी, लेकिन पीएसआरआई की कोऑर्डिनेटर सुनीता प्रभाकरन और मिथुन डोनर से सीधे बातचीत करते थे।
एसआईटी सूत्रों के मुताबिक डोनर प्रोवाइडर टी राजकुमार और गौरव से मिलकर ये एडवांस में डोनर को तैयार कर लेते थे। इस दौरान डोनर की जांचें भी करवा ली जाती थीं। हॉस्पिटल में जब ट्रांसप्लांट का कोई केस आता था तो उसको डोनर के बारे में यही कोऑर्डिनेटर बताते थे। कोऑर्डिनेटर रिसीवर के साथ मिलकर पूरा सौदा तय करते थे। इसके बाद किडनी या लिवर ट्रांसप्लांट कराया जाता था।
ये जानकारियां दी जाती थीं
एक पीड़ित ने बताया कि ट्रेनिंग के दौरान सुनीता और मिथुन रिसीवर के बारे में जानकारी देते थे। डोनरों को उसके घर का पता, परिजनों, रिश्तेदारों के अलावा घर में कमरों की संख्या, गाड़ी समेत अन्य जानकारियां दी जाती थीं।
एक केस में सुनीता और मिथुन ढाई-ढाई लाख रुपये लेते थे
इतने में होता था सौदा
एसआईटी के मुताबिक एक केस में सुनीता और मिथुन ढाई-ढाई लाख रुपये लेते थे। तीन से पांच लाख रुपये टी राजकुमार या गौरव को दिए जाते थे, जिसमें से कुछ हिस्सा डोनरों को मिलता था।
रिश्तेदार लेने जाता था रकम
किडनी कांड के एक पीड़ित और गवाह ने अपने बयानों में बताया कि कोऑर्डिनेटर सीधे रकम नहीं लेते थे। उनके बहुत ही करीबी रिश्तेदार हॉस्पिटल के बाहर सौदेबाजी की रकम लेते थे। रकम रिसीवर उन तक पहुंचाते थे।
गवाह से पुलिस ने किया संपर्क
कोऑर्डिनेटरों से पूछताछ के दौरान एसआईटी ने शनिवार को गवाहों और पीड़ितों से संपर्क किया था। फोन पर ही उनसे जानकारी ली कि वह कोऑर्डिनेटर से कहां मिले। क्या बातचीत हुई और वह किस तरह से किडनी की सौदेबाजी की।