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मस्जिद में एक दिन भी नहीं हुई नमाज, बरेलवी-देवबंदी विवाद के चलते मुसलमानों ने ही डाल रखा है ताला
Sat, 23 Nov 2019 07:02 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
सुहेल खान, अमर उजाला, कानपुर
सुहेल खान, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 23 Nov 2019 07:02 PM IST
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तलाक महल मस्जिद में पड़ा ताला
- फोटो : अमर उजाला
अयोध्या में मंदिर-मस्जिद मुकदमे में मालिकाना हक पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर मुस्लिम समाज में काफी चर्चाएं हुईं। सभी ने फैसले को अपने-अपने नजरिये से देखा और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का जिक्र किया। इसके बाद अब शहरवासियों ने तलाक महल की बिलाल मस्जिद की चर्चाएं तेज कर दी हैं।
यह एक ऐसी मस्जिद है, जिसका मालिकाना हक भी मुस्लिमों के पास है लेकिन इस पर ताला भी मुसलमानों ने डाल दिया है। 10 साल पहले 2009 में रमजान के जुमा अलविदा को इसमें नमाज शुरू होनी थी, लेकिन मस्जिद पर नियंत्रण और इमाम बरेलवी या देवबंदी विचारधारा को लेकर बात फंस गई। मामला जिला प्रशासन तक पहुंच गया। तब से आज तक इस मस्जिद का ताला न खुलने के पीछे मूल जड़ बरेलवी-देवबंदी विवाद है।
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यह एक ऐसी मस्जिद है, जिसका मालिकाना हक भी मुस्लिमों के पास है लेकिन इस पर ताला भी मुसलमानों ने डाल दिया है। 10 साल पहले 2009 में रमजान के जुमा अलविदा को इसमें नमाज शुरू होनी थी, लेकिन मस्जिद पर नियंत्रण और इमाम बरेलवी या देवबंदी विचारधारा को लेकर बात फंस गई। मामला जिला प्रशासन तक पहुंच गया। तब से आज तक इस मस्जिद का ताला न खुलने के पीछे मूल जड़ बरेलवी-देवबंदी विवाद है।
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यह है विवाद
इस मस्जिद का निर्माण सऊदी अरब में रहने वाले इकराम उल्ला (मूल निवासी तलाक महल) ने अपनी वसीयत में कराने को कहा था। उनके तीन पुत्रों में एक फजल ने तलाक महल में पड़ी अपनी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनवाने को लेकर कोशिशें कीं। यहां पर विधायक इरफान सोलंकी के चाचा इकबाल सोलंकी ने मस्जिद निर्माण में मदद की।
बाद में यह तय हुआ कि फजल देवबंदी विचारधारा के हैं, उनकी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनी है तो कमेटी और इमाम उनकी विचारधारा का होगा। जबकि, इकबाल सोलंकी और अन्य लोग यहां पर बरेलवी मसलक का इमाम रखना चाहते थे। इस मामले से जुड़े रहे ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी मोहम्मद सलीस ने बताया कि बाद में मामला निपटाने की कोशिश हुई। यह तय हुआ कि कमेटी देवबंदी और इमाम बरेलवी विचारधारा का होगा।
न यहां पर देवबंदी विचारधारा से प्रभावित गैर जनपद या विदेशी जमात रुकेगी और न ही बरेलवी विचारधारा से संबंधित नमाज के बाद सलाम होगा। फार्मूला दिया गया था कि बरेलवी इमाम के पीछे देवबंदी नमाज पढ़ लेते हैं तो कोई परेशानी नहीं होगी। इस मामले से जुडे़ तलाक महल के मोहम्मद सलीम बताते हैं कि मस्जिद का ताला बंद है लेकिन एकाध दीवार में छेद होने से मवेशी भी चले जाते हैं।
इस मस्जिद का निर्माण सऊदी अरब में रहने वाले इकराम उल्ला (मूल निवासी तलाक महल) ने अपनी वसीयत में कराने को कहा था। उनके तीन पुत्रों में एक फजल ने तलाक महल में पड़ी अपनी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनवाने को लेकर कोशिशें कीं। यहां पर विधायक इरफान सोलंकी के चाचा इकबाल सोलंकी ने मस्जिद निर्माण में मदद की।
बाद में यह तय हुआ कि फजल देवबंदी विचारधारा के हैं, उनकी पुश्तैनी जमीन पर मस्जिद बनी है तो कमेटी और इमाम उनकी विचारधारा का होगा। जबकि, इकबाल सोलंकी और अन्य लोग यहां पर बरेलवी मसलक का इमाम रखना चाहते थे। इस मामले से जुड़े रहे ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी मोहम्मद सलीस ने बताया कि बाद में मामला निपटाने की कोशिश हुई। यह तय हुआ कि कमेटी देवबंदी और इमाम बरेलवी विचारधारा का होगा।
न यहां पर देवबंदी विचारधारा से प्रभावित गैर जनपद या विदेशी जमात रुकेगी और न ही बरेलवी विचारधारा से संबंधित नमाज के बाद सलाम होगा। फार्मूला दिया गया था कि बरेलवी इमाम के पीछे देवबंदी नमाज पढ़ लेते हैं तो कोई परेशानी नहीं होगी। इस मामले से जुडे़ तलाक महल के मोहम्मद सलीम बताते हैं कि मस्जिद का ताला बंद है लेकिन एकाध दीवार में छेद होने से मवेशी भी चले जाते हैं।