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यहां खतरे में लाखों रजिस्ट्री दस्तावेजों का वजूद, प्लाट और मकान मालिक अब ध्यान दें ये बातें
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, कानपुर
Updated Mon, 24 Sep 2018 12:57 PM IST
सार
-1990 से 2016 तक के दस्तावेजों की स्याही मिट रही
-89 लाख रुपये दिया पर स्कैन का काम शुरू तक नहीं
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विस्तार
1990 से 2016 तक अपने प्लाट या मकान अथवा अन्य किसी तरह की रजिस्ट्री कराने वाले लोग ध्यान दें। आप अपने मूल दस्तावेजों को अच्छी तरह से सहेजने के साथ-साथ उसकी फोटो कॉपी भी कराकर सुरक्षित कर लें। दरअसल, कानपुर के रजिस्ट्री दफ्तर में इस समय सीमा दस्तावेजों के रिकार्ड की स्याही मिटने की कगार पर है। ऐसे में दस्तावेज खोने पर रजिस्ट्री दफ्तर से कॉपी निकलवाना मुश्किल होगा।
पहले किसी प्लाट या मकान की रजिस्ट्री कराने पर रजिस्ट्री दफ्तर से मूल दस्तावेज मालिक को सौंपकर उसकी फोटो कापी रिकार्ड में रख ली जाती थी। हर साल औसतन करीब 35 हजार रजिस्ट्रियां होती हैं। इस तरह 26 साल में करीब नौ लाख दस हजार फोटोकॉपी रजिस्ट्री दफ्तर के रिकार्ड रूम में रखी हैं। इनमें से ज्यादातर फोटो कापियाें की स्याही उड़ने लगी है। अधिवक्ता वसीम अख्तर का कहना है कि यह बहुत बड़ी समस्या है। इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हालांकि जुलाई 2016 से दस्तावेजों को स्कैन कर कंप्यूटर में सुरक्षित किया जाने लगा था।
जगह की कमी, कैसे सुरक्षित रहे रिकार्ड
रजिस्ट्री दफ्तर के निचले तल पर मुख्य रिकार्ड रूम है। इसमें नवंबर 1865 तक का रिकार्ड रखा है। जोन एक का 1865 से 1994 तक, जोन दो का 1865 से 19 जुलाई 1992 और जोन तीन का 1865 से 1994 तक का रिकार्ड रखा है। तब तक तीन जोन ही हुआ करते थे। बाद में जोन चार बना। इसके बाद के रिकार्ड जोन वार दफ्तरों में रखे गए हैं। हालत यह हैं कि अलमारी ऐसे रखी गई हैं कि दो लोग गैलरी से नहीं निकल सकते हैं। ऐसे में कर्र्मचारियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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पहले किसी प्लाट या मकान की रजिस्ट्री कराने पर रजिस्ट्री दफ्तर से मूल दस्तावेज मालिक को सौंपकर उसकी फोटो कापी रिकार्ड में रख ली जाती थी। हर साल औसतन करीब 35 हजार रजिस्ट्रियां होती हैं। इस तरह 26 साल में करीब नौ लाख दस हजार फोटोकॉपी रजिस्ट्री दफ्तर के रिकार्ड रूम में रखी हैं। इनमें से ज्यादातर फोटो कापियाें की स्याही उड़ने लगी है। अधिवक्ता वसीम अख्तर का कहना है कि यह बहुत बड़ी समस्या है। इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हालांकि जुलाई 2016 से दस्तावेजों को स्कैन कर कंप्यूटर में सुरक्षित किया जाने लगा था।
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जगह की कमी, कैसे सुरक्षित रहे रिकार्ड
रजिस्ट्री दफ्तर के निचले तल पर मुख्य रिकार्ड रूम है। इसमें नवंबर 1865 तक का रिकार्ड रखा है। जोन एक का 1865 से 1994 तक, जोन दो का 1865 से 19 जुलाई 1992 और जोन तीन का 1865 से 1994 तक का रिकार्ड रखा है। तब तक तीन जोन ही हुआ करते थे। बाद में जोन चार बना। इसके बाद के रिकार्ड जोन वार दफ्तरों में रखे गए हैं। हालत यह हैं कि अलमारी ऐसे रखी गई हैं कि दो लोग गैलरी से नहीं निकल सकते हैं। ऐसे में कर्र्मचारियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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सैकड़ों साल पहले की स्याही अब भी चमकदार
रजिस्ट्री दफ्तर में 1865 तक की रजिस्ट्री का रिकार्ड भी रखा है। तब काफी कम रजिस्ट्री होती थीं। उस वक्त जिल्द में स्याही से रजिस्ट्री का ब्योरा लिखा जाता था। जरूरत पर इसे निकालकर संबंधित व्यक्ति को रजिस्ट्री का प्रमाणपत्र बनाकर दे दिया जाता था। एआईजी स्टांप का कहना है कि जिल्द में लिखी स्याही अभी भी काफी चमकदार है। समय के साथ जिल्द में स्याही से लिखना बंद हुआ। सुविधा के लिए रजिस्ट्री की फोटो कॉपी कराकर रिकार्ड में रखी जाने लगी। इसकी स्याही उड़ने लगती है।
1990 से लेकर 2016 तक के रजिस्ट्री दस्तावेजों को स्कैन कर कंप्यूटर में सुरक्षित करने का काम होना है। इसके लिए उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन (यूपीईएल) को 89 लाख रुपये दिया जा चुका हैं। यह राशि 31 मार्च 2017 को ही जारी हो चुकी है। इसके बावजूद यूपीईएल ने काम शुरू नहीं किया है। लखनऊ मुख्यालय रिमाइंडर भेजा गया है।- देवेंद्र सिंह, एआईजी स्टांप
रजिस्ट्री दफ्तर में 1865 तक की रजिस्ट्री का रिकार्ड भी रखा है। तब काफी कम रजिस्ट्री होती थीं। उस वक्त जिल्द में स्याही से रजिस्ट्री का ब्योरा लिखा जाता था। जरूरत पर इसे निकालकर संबंधित व्यक्ति को रजिस्ट्री का प्रमाणपत्र बनाकर दे दिया जाता था। एआईजी स्टांप का कहना है कि जिल्द में लिखी स्याही अभी भी काफी चमकदार है। समय के साथ जिल्द में स्याही से लिखना बंद हुआ। सुविधा के लिए रजिस्ट्री की फोटो कॉपी कराकर रिकार्ड में रखी जाने लगी। इसकी स्याही उड़ने लगती है।
1990 से लेकर 2016 तक के रजिस्ट्री दस्तावेजों को स्कैन कर कंप्यूटर में सुरक्षित करने का काम होना है। इसके लिए उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन (यूपीईएल) को 89 लाख रुपये दिया जा चुका हैं। यह राशि 31 मार्च 2017 को ही जारी हो चुकी है। इसके बावजूद यूपीईएल ने काम शुरू नहीं किया है। लखनऊ मुख्यालय रिमाइंडर भेजा गया है।- देवेंद्र सिंह, एआईजी स्टांप