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आईआईटी में होगी मेडिकल की पढ़ाई

Sun, 04 Sep 2016 11:29 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर Updated Sun, 04 Sep 2016 11:29 PM IST
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medical studies will be start in IIt kanpur
डेमाे प‌िक्स
अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में सुधार और ग्लोबल ब्रांडिंग के उद्देश्य से आईआईटी ने पढ़ाई का तरीका बदला है। अब इकोनॉमिक्स और लॉ की पढ़ाई पर भी फोकस किया जा रहा है। सब कुछ ठीक रहा तो आईआईटी कैंपस में बैचलर ऑफ मेडिसिन (मेडिकल) की पढ़ाई भी होगी। आईआईटी खड़गपुर ने तो मेडिकल की पढ़ाई का खाका तैयार कर लिया है। आईआईटी कानपुर भी तैयारी में है।
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आईआईटी कानपुर, आईआईएम अहमदाबाद और गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की दो दिवसीय (तीन-चार सितंबर) इंटरनेशनल कांफ्रेंस लॉ एंड इकोनॉक्सि कार्यशाला का समापन हुआ। आईआईटी कानपुर से पीएचडी करके इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट भोपाल के असिस्टेेंट प्रोफेसर डॉ. शरदिंदु पांडेय ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग यूनिवर्सिटी के हिसाब से होती है। विदेशी विश्वविद्यालयों में हर फैकल्टी की पढ़ाई होती है। इसी वजह से भारतीय तकनीकी और प्रौद्योगिकी संस्थान पिछड़ जाते हैं। अब आईआईटी कानपुर ने इंजीनियरिंग और साइंस के साथ ही इकोनॉमिक्स, ह्यूमिनिटिज, मैनेजमेंट (एमबीए) और लॉ की पढ़ाई पर जोर दिया है। इसका सकारात्मक नतीजा देखने को मिलेगा। आईआईटी की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भी सुधार होगा। आईआईटी कानपुर के पास काफी जमीन है। मेडिकल की पढ़ाई के लिए फैकल्टी खोली जा सकती है। इस पर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) और मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी सहमत है। आईआईटी कानपुर के प्रो. उदय सिंह रचेला ने गेस्ट को धन्यवाद दिया। 
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‘मंत्रालय से हो जजों की नियुक्ति’
अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस लॉ एंड इकोनॉमिक्स में शिक्षाविदों ने जजों की नियुक्ति पर चर्चा की। आईआईएम अहमदाबाद के डीन ऑफ फैकल्टी प्रो. एरोल डिसूजा ने अपनी राय रखी और कहा कि जजों की नियुक्ति कानून मंत्रालय से होनी चाहिए। अमेरिका और चायना सहित दुनिया के तमाम देशों में ऐसा होता है। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जहां जजों की नियुक्ति सुप्रीमकोर्ट से होती है। शिक्षाविद ने कहा कि भारत की न्यायिक प्रक्रिया आम जनता के लिए है लेकिन इसमें काफी समय लगता है। मामलों का सामान्य निस्तारण भी सात साल में होता है। दुनिया के अन्य देशों में यह समयसीमा एक साल से डेढ़ साल की है। न्यायिक प्रक्रिया में देरी से आर्थिक नुकसान होता है।  
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विदेशों में भी बेटे की चाहत
अमेरिका, आस्ट्रेलिया, चायना और इंग्लैंड सहित तमाम देशों में बेटे-बेटी का भेदभाव है। यह कहना है कारनल यूनिवर्सिटी अमेरिका की क्लीनिकल प्रोफेसर ऑफ लॉ प्रो. शीतल कालंट्री का। वह स्कॉइप की मदद से आईआईटी की अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस को संबोधित कर रही थीं। प्रो. शीतल ने कहा कि अब विदेशी भी बेटे की चाहत रखते हैं। बेटी पैदा होने पर निराश होते हैं। यह स्थिति खतरनाक है। सोच में बदलाव नहीं हुआ तो जेंडर गैप बढ़ेगा। इसका खामियाजा समाज के हर तबके को भुगतना पड़ेगा।  

दाल की महंगाई अस्थायी
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के एक्सपर्ट पैनल के सदस्य और आईआईएम अहमदाबाद के डीन ऑफ फैकल्टी प्रो. एरोल डिसूजा ने कहा कि अरहर के दाल की महंगाई अस्थायी है। अब लोग अच्छा खाना खा रहे हैं। दाल से प्रोटीन मिलती है, इसलिए डिमांड और सप्लाई में बड़ा अंतर आ गया। अब जरूरत सप्लाई चेन (प्रोडक्शन और आपूर्ति) को दुरुस्त करने की है। प्रो. डिसूजा ने कहा कि एक महीने के अंदर ही दाल की महंगाई सामान्य हो जाएगी। अभी प्रति किलो दाल का रेट 100-110 रुपये किलो है।
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