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दुर्गम लमखागा पास पहाड़ फतह किया
हिमांशु मिश्र//कानपुर
Updated Sat, 13 Aug 2016 01:56 AM IST
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लमखागा पास की चोटियों पर चढ़ाई के दौरान खुशी मनाते कानपुर आईआईटी के स्टूडेंट।
- फोटो : amarujala
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देश की सर्वाधिक दुर्गम पहाड़ियों में एक लमखागा पास की ऊंचाइयों को छूने वालों में आईआईटी कानपुर के नौ जांबाजों के नाम भी शुमार हो गए हैं। हिमाचल प्रदेश में 17000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम पहाड़ी को फतह करने में आईआईटीयंस को सात दिन लगे। नौ स्टूडेंटों के इस समूह की अगुवाई एमटेक एयरोस्पेस के फाइनल ईयर के स्टूडेंट प्रवीण कुमार कर रहे थे। उनके साथ पीएचडी स्कॉलर अभिषेक सिद्धार्थ, प्रभु सी, केवल सिंह, बीटेक स्टूडेंट अजय मीना, मनोज, मनीष और एमटेक स्टूडेंट उत्सव सिंह, लवीश अरोरा थे।
स्टूडेंटों का कारवां 14 जुलाई को हिमाचल के हरसिल से निकला था जो गंगावनी, क्यार कोटी, सूखा ताल और लमखागा बेस कैंप से होते हुए 19 जुलाई को लमखागा पास पहुंचा। लमखागा पास की दुर्गम चोटियों तक पहुंचने के लिए आईआईटीयंस ने तीस दिनों तक लगातार पसीना बहाया।
आईआईटी परिसर में ही सभी ने एडवेंचर क्लब के कोआर्डिनेटर शुभम गुप्ता और प्रवीण कुमार से ट्रेनिंग ली। प्रवीण इस टूर के ट्रैक लीडर भी थे। उन्होंने बताया कि कैंप के दौरान स्टूडेंटों में स्टेमिना विकसित की गई। एक बार में स्टूडेंट दस से 12 किलोमीटर की दौड़ लगाते थे।
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17320 फीट ऊंचाई पर है लमखागा पास
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जनपद और उत्तराखंड के हरसिल को जोड़ने वाला लमखागा पास 17320 फीट की ऊंचाइयों पर स्थित है। यह देश की सबसे दुर्गम पहाड़ियों में एक मानी जाती है। लैंड स्लाइडिंग और बर्फबारी लमखागा की राहों को बेहद कठिन बना देती हैं। बीच में कई खतरनाक नदियां भी हैं।
खासतौर पर वसपा वैली के निकट मौजूद पागल नाला को दिन में पार करना बेहद कठिन होता है। दिन में बर्फ पिघलने के कारण नाले में पानी का बहाव बेहद तेज होता है। इस कारण इसे पार करना मुश्किल हो जाता है। इसे रस्सी की सीढ़ियों के जरिए ही पार किया जाता है। लमखागा पास पर 1933 में पहली बार ब्रिटिश लेखक और पर्वतारोही मार्को एलेक्सजेंडर पोलिस ने सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी।
ऐसे पार कीं बाधाएं
ट्रैक लीडर प्रवीण बताते हैं कि शुरुआत के तीन दिनों में बारिश से रुकावटें आईं। फिर भ्ाी सभी चलते रहे। चौथे दिन बारिश रुकी तो बर्फबारी और लैंड स्लाइडिंग शुरू हो गई। इसके बावजूद सभी दिनभर चढ़ाई करते और रात में कैंप बनाकर वहीं ठहर जाते।
जवानों ने की मदद
प्रवीण बताते हैं कि उन्होंने सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल किया और आईटीबीपी के जवानों से मदद मांगी। करीब 25 किमी तक पैदल चलने के बाद जवानों ने मदद के लिए जीप भेजी जिसकी मदद से सभी वापस रानी कंठा होते हुए चितकुल पहुंच गए। यहां से बस के जरिए चंडीगढ़ लौट आए।
कॅरियर की संभावनाएं
माउंटेनियरिंग स्पोर्ट्स एडवेंचर का हिस्सा होता है। इसके प्रशिक्षण के लिए देशभर में कई इंस्टीट्यूट भी चलते हैं। मौजूदा दौर में कॅरियर के हिसाब से भी इसका काफी क्रेज है। स्पोर्ट्स एडवेंचर का शौक रखने वाले फिजिकल ट्रेनर, टूरिज्म स्पेशलिस्ट, सेना आदि में अपना कॅरियर बना सकते हैं।
नाले के बहाव ने थामी रफ्तार
लमखागा पास से वापसी के दौरान आईआईटीयंस की रफ्तार के बीच पगला नाला आ गया। प्रवीण बताते हैं कि बहाव इतना तेज था कि उसे सीढ़ियों के जरिए पार करना काफी कठिन था। किसी तरह उन्होंने कोशिश करके पार कर लिया, लेकिन बाकी दोस्तों के लिए खतरे से खाली नहीं था। इसलिए वह नाले को पार करते हुए वापस दोस्तों के पास आ गए। फिर अगले दिन सुबह पांच बजे जब पानी बर्फ से ढक गया तो सीढ़ियों की बदौलत सभी ने नाले को पार किया।
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स्टूडेंटों का कारवां 14 जुलाई को हिमाचल के हरसिल से निकला था जो गंगावनी, क्यार कोटी, सूखा ताल और लमखागा बेस कैंप से होते हुए 19 जुलाई को लमखागा पास पहुंचा। लमखागा पास की दुर्गम चोटियों तक पहुंचने के लिए आईआईटीयंस ने तीस दिनों तक लगातार पसीना बहाया।
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आईआईटी परिसर में ही सभी ने एडवेंचर क्लब के कोआर्डिनेटर शुभम गुप्ता और प्रवीण कुमार से ट्रेनिंग ली। प्रवीण इस टूर के ट्रैक लीडर भी थे। उन्होंने बताया कि कैंप के दौरान स्टूडेंटों में स्टेमिना विकसित की गई। एक बार में स्टूडेंट दस से 12 किलोमीटर की दौड़ लगाते थे।
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17320 फीट ऊंचाई पर है लमखागा पास
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जनपद और उत्तराखंड के हरसिल को जोड़ने वाला लमखागा पास 17320 फीट की ऊंचाइयों पर स्थित है। यह देश की सबसे दुर्गम पहाड़ियों में एक मानी जाती है। लैंड स्लाइडिंग और बर्फबारी लमखागा की राहों को बेहद कठिन बना देती हैं। बीच में कई खतरनाक नदियां भी हैं।
खासतौर पर वसपा वैली के निकट मौजूद पागल नाला को दिन में पार करना बेहद कठिन होता है। दिन में बर्फ पिघलने के कारण नाले में पानी का बहाव बेहद तेज होता है। इस कारण इसे पार करना मुश्किल हो जाता है। इसे रस्सी की सीढ़ियों के जरिए ही पार किया जाता है। लमखागा पास पर 1933 में पहली बार ब्रिटिश लेखक और पर्वतारोही मार्को एलेक्सजेंडर पोलिस ने सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी।
ऐसे पार कीं बाधाएं
ट्रैक लीडर प्रवीण बताते हैं कि शुरुआत के तीन दिनों में बारिश से रुकावटें आईं। फिर भ्ाी सभी चलते रहे। चौथे दिन बारिश रुकी तो बर्फबारी और लैंड स्लाइडिंग शुरू हो गई। इसके बावजूद सभी दिनभर चढ़ाई करते और रात में कैंप बनाकर वहीं ठहर जाते।
जवानों ने की मदद
प्रवीण बताते हैं कि उन्होंने सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल किया और आईटीबीपी के जवानों से मदद मांगी। करीब 25 किमी तक पैदल चलने के बाद जवानों ने मदद के लिए जीप भेजी जिसकी मदद से सभी वापस रानी कंठा होते हुए चितकुल पहुंच गए। यहां से बस के जरिए चंडीगढ़ लौट आए।
कॅरियर की संभावनाएं
माउंटेनियरिंग स्पोर्ट्स एडवेंचर का हिस्सा होता है। इसके प्रशिक्षण के लिए देशभर में कई इंस्टीट्यूट भी चलते हैं। मौजूदा दौर में कॅरियर के हिसाब से भी इसका काफी क्रेज है। स्पोर्ट्स एडवेंचर का शौक रखने वाले फिजिकल ट्रेनर, टूरिज्म स्पेशलिस्ट, सेना आदि में अपना कॅरियर बना सकते हैं।
नाले के बहाव ने थामी रफ्तार
लमखागा पास से वापसी के दौरान आईआईटीयंस की रफ्तार के बीच पगला नाला आ गया। प्रवीण बताते हैं कि बहाव इतना तेज था कि उसे सीढ़ियों के जरिए पार करना काफी कठिन था। किसी तरह उन्होंने कोशिश करके पार कर लिया, लेकिन बाकी दोस्तों के लिए खतरे से खाली नहीं था। इसलिए वह नाले को पार करते हुए वापस दोस्तों के पास आ गए। फिर अगले दिन सुबह पांच बजे जब पानी बर्फ से ढक गया तो सीढ़ियों की बदौलत सभी ने नाले को पार किया।