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Kanpur Violence: हाजी वसी के बेटे पर नया खुलासा, अपराधियों के संरक्षण से औने-पौने दामों पर खरीदता था संपत्ति
Wed, 27 Jul 2022 10:15 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 27 Jul 2022 10:15 AM IST
सार
एडीजीसी दिनेश अग्रवाल व विशेष लोक अभियोजक पंकज त्रिपाठी ने एसएचओ चमनगंज जैनेंद्र सिंह तोमर और मामले के पूर्व विवेचक त्रिपुरारी पांडे के बयानों का हवाला देते हुए कोर्ट में तर्क रखा कि अब्दुल पहले भी हिंदुओं और धार्मिक स्थलों की संपत्तियों पर कब्जा कर चुका है।
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बिल्डर हाजी वसी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हाजी वसी के बेटे अब्दुल रहमान के डी-2 गैंग, पीएफआई और जौहर फैंस एसोसिएशन तीनों से संबंध थे। तीनों को यह फंडिंग करता था। नई सड़क पर हुए बवाल में भी अब्दुल ने फंडिंग की थी। बवाल के लगभग एक माह बाद पुलिस अब्दुल को गिरफ्तार कर सकी। जमानत मिली तो अब्दुल विवेचना और सबूतों को प्रभावित करेगा।
अभियोजन के इन्हीं तर्कों को सुनने के बाद अपर जिला जज 16 जितेंद्र कुमार द्विवेदी ने अब्दुल की तीनों जमानत अर्जियां खारिज कर दी। एडीजीसी दिनेश अग्रवाल व विशेष लोक अभियोजक पंकज त्रिपाठी ने एसएचओ चमनगंज जैनेंद्र सिंह तोमर और मामले के पूर्व विवेचक त्रिपुरारी पांडे के बयानों का हवाला देते हुए कोर्ट में तर्क रखा कि अब्दुल पहले भी हिंदुओं और धार्मिक स्थलों की संपत्तियों पर कब्जा कर चुका है।
यह लोग डी-2 गैंग के संरक्षण से विवादित संपत्तियां औने-पौने दामों पर खरीद लेते थे या जबरन कब्जा जमा लेते थे। अपराधियों को फंडिंग करते थे। हयात ने जो बंदी बुलाई उसके लिए भी अब्दुल ने फंडिंग की। एकराय होकर पुलिस वालों पर हमला किया गया। उपद्रव के लिए किराये के लोगों का इस्तेमाल किया गया।
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वहीं अब्दुल की ओर से तर्क रखा गया कि विवेचना में अब्दुल के उपद्रव में शामिल होने या साजिश रचने के कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर भी उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। उसे झूठा फंसाया गया है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने अब्दुल की जमानत अर्जियां खारिज कर दीं।
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अभियोजन के इन्हीं तर्कों को सुनने के बाद अपर जिला जज 16 जितेंद्र कुमार द्विवेदी ने अब्दुल की तीनों जमानत अर्जियां खारिज कर दी। एडीजीसी दिनेश अग्रवाल व विशेष लोक अभियोजक पंकज त्रिपाठी ने एसएचओ चमनगंज जैनेंद्र सिंह तोमर और मामले के पूर्व विवेचक त्रिपुरारी पांडे के बयानों का हवाला देते हुए कोर्ट में तर्क रखा कि अब्दुल पहले भी हिंदुओं और धार्मिक स्थलों की संपत्तियों पर कब्जा कर चुका है।
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यह लोग डी-2 गैंग के संरक्षण से विवादित संपत्तियां औने-पौने दामों पर खरीद लेते थे या जबरन कब्जा जमा लेते थे। अपराधियों को फंडिंग करते थे। हयात ने जो बंदी बुलाई उसके लिए भी अब्दुल ने फंडिंग की। एकराय होकर पुलिस वालों पर हमला किया गया। उपद्रव के लिए किराये के लोगों का इस्तेमाल किया गया।
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वहीं अब्दुल की ओर से तर्क रखा गया कि विवेचना में अब्दुल के उपद्रव में शामिल होने या साजिश रचने के कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर भी उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। उसे झूठा फंसाया गया है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने अब्दुल की जमानत अर्जियां खारिज कर दीं।