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कानपुर: श्रमिकों के संकट से जूझा चमड़ा उद्योग, अनुमति मिलने के बाद भी नहीं चल पा रहीं टेनरियां
Sun, 17 May 2020 11:33 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sun, 17 May 2020 11:33 PM IST
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कानपुर टेनरी
- फोटो : गूगल
कानपुर के चमड़ा उद्यमियों व टेनरी संचालकों के सामने श्रमिकों का संकट गहरा गया है। अनुमति मिलने के बाद भी टेनरियां नहीं चल पा रही हैं। इससे कच्चे माल का उत्पादन पूरी तरह ठप है। माल न मिलने से चमड़ा उत्पाद बनाने वाली निर्यातक इकाइयां बचा खुचा आर्डर पूरा करने की भी स्थिति में नहीं हैं।
कारोबारियों का कहना है कि श्रमिकों का इंतजाम न हुआ तो चमड़ा उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होगा। हाल ही में जाजमऊ की 134 टेनरियों और निर्यातक इकाइयों को उत्पादन करने की अनुमति मिली है। चमड़ा उद्यमी उत्पादन करने की सोच भी नहीं पा रहे हैं, क्योंकि 70 फीसदी से ज्यादा श्रमिक पलायन कर चुके हैं।
कारोबारी बताते हैं कि टेनरियों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के होते हैं। कानपुर और उसके आसपास के जिलों यानी स्थानीय श्रमिकों की संख्या 30 फीसदी से ज्यादा नहीं है। इतनी संख्या में उत्पादन करना संभव नहीं है, क्योंकि उत्पादन के दौरान अलग-अलग तरह के काम के लिए अलग-अलग हुनर और कौशल वाले श्रमिकों की जरूरत होती है। जितने श्रमिक बचे हैं उनसे हर तरह का काम नहीं लिया जा सकता है।
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कारोबारियों का कहना है कि श्रमिकों का इंतजाम न हुआ तो चमड़ा उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होगा। हाल ही में जाजमऊ की 134 टेनरियों और निर्यातक इकाइयों को उत्पादन करने की अनुमति मिली है। चमड़ा उद्यमी उत्पादन करने की सोच भी नहीं पा रहे हैं, क्योंकि 70 फीसदी से ज्यादा श्रमिक पलायन कर चुके हैं।
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कारोबारी बताते हैं कि टेनरियों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के होते हैं। कानपुर और उसके आसपास के जिलों यानी स्थानीय श्रमिकों की संख्या 30 फीसदी से ज्यादा नहीं है। इतनी संख्या में उत्पादन करना संभव नहीं है, क्योंकि उत्पादन के दौरान अलग-अलग तरह के काम के लिए अलग-अलग हुनर और कौशल वाले श्रमिकों की जरूरत होती है। जितने श्रमिक बचे हैं उनसे हर तरह का काम नहीं लिया जा सकता है।
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20 लाख के निवेश पर 15 लोगों को रोजगार
चमड़ा कारोबार में 20 लाख के निवेश पर करीब 15 लोग प्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं। ठेकेदारी पर काम करने वालों की संख्या दोगुनी होती है। इस लिहाज से देखे तो जाजमऊ की टेनरियों में 30 से 40 हजार कर्मचारी व श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से रोजगार पा रहे थे। इतनी ही संख्या ठेके पर काम करने वालों की थी। अब एक चौथाई श्रमिक ही काम करने वाले बचे हैं।
केस-1
जाजमऊ के टेनरी संचालक मोहम्मद अरर्शी की टेनरी में मार्च की शुरुआत में 12 स्थायी कर्मचारी और श्रमिक काम करते थे। इनका काफी काम ठेके पर भी होता है। अरर्शी बताते हैं कि अब टेनरी में चौकीदार के अलावा कोई नहीं बचा है। सभी अपने घरों को पलायन कर गए हैं। कोराना संक्रमण की वजह से श्रमिक आने को नहीं तैयार हैं। जो आना चाहते हैं उन्हें लाने की व्यवस्था नहीं हो पा रही।
केस-2
जाजमऊ में ही एलाइट टेनरी के संचालक रफत कयूम के यहां मार्च में 30 स्थायी कर्मचारी काम करते थे। अब सिर्फ पांच बचे हैं। इन पांचों में भी सभी को एक ही तरह का काम करना आता है। जबकि टेनरी में एक पीस चमड़े के उत्पादन की प्रक्रिया में 10 से 12 कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है। हर तरह का काम करने वाले श्रमिक व कर्मचारी न होने की वजह से इनकी टेनरी में भी उत्पादन ठप है।
वैसे तो चमड़ा उद्योग बीते दो वर्षों से बुरे दौर से गुजर रहा है, लेकिन कोरोना महामारी ने तो कमर ही तोड़ दी। बीते चार महीने में करीब तीन हजार करोड़ के आर्डर निरस्त हुए हैं। निर्यातक कंपनियों के पास कुछ बचे खुचे आर्डर होंगे भी तो श्रमिकों की कमी से पूरे होते नहीं दिख रहे। - जफर फिरोज, निर्यात मामलों के विशेषज्ञ
चमड़ा कारोबार में 20 लाख के निवेश पर करीब 15 लोग प्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते हैं। ठेकेदारी पर काम करने वालों की संख्या दोगुनी होती है। इस लिहाज से देखे तो जाजमऊ की टेनरियों में 30 से 40 हजार कर्मचारी व श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से रोजगार पा रहे थे। इतनी ही संख्या ठेके पर काम करने वालों की थी। अब एक चौथाई श्रमिक ही काम करने वाले बचे हैं।
केस-1
जाजमऊ के टेनरी संचालक मोहम्मद अरर्शी की टेनरी में मार्च की शुरुआत में 12 स्थायी कर्मचारी और श्रमिक काम करते थे। इनका काफी काम ठेके पर भी होता है। अरर्शी बताते हैं कि अब टेनरी में चौकीदार के अलावा कोई नहीं बचा है। सभी अपने घरों को पलायन कर गए हैं। कोराना संक्रमण की वजह से श्रमिक आने को नहीं तैयार हैं। जो आना चाहते हैं उन्हें लाने की व्यवस्था नहीं हो पा रही।
केस-2
जाजमऊ में ही एलाइट टेनरी के संचालक रफत कयूम के यहां मार्च में 30 स्थायी कर्मचारी काम करते थे। अब सिर्फ पांच बचे हैं। इन पांचों में भी सभी को एक ही तरह का काम करना आता है। जबकि टेनरी में एक पीस चमड़े के उत्पादन की प्रक्रिया में 10 से 12 कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है। हर तरह का काम करने वाले श्रमिक व कर्मचारी न होने की वजह से इनकी टेनरी में भी उत्पादन ठप है।
वैसे तो चमड़ा उद्योग बीते दो वर्षों से बुरे दौर से गुजर रहा है, लेकिन कोरोना महामारी ने तो कमर ही तोड़ दी। बीते चार महीने में करीब तीन हजार करोड़ के आर्डर निरस्त हुए हैं। निर्यातक कंपनियों के पास कुछ बचे खुचे आर्डर होंगे भी तो श्रमिकों की कमी से पूरे होते नहीं दिख रहे। - जफर फिरोज, निर्यात मामलों के विशेषज्ञ