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ध्यान दें: बच्चा रोज स्कूल में किताबें भूले...तो हो जाएं सावधान, GSVM में 121 बाल रोगियों का लिया गया ब्योरा

Fri, 05 Sep 2025 10:46 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Fri, 05 Sep 2025 10:46 AM IST
सार

Kanpur News: डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे बुरा असर माता-पिता के झगड़े, पारिवारिक कलह और स्क्रीन टाइम का पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि दिमाग पर बुरा असर आने से न्यूरो ट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है।

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Kanpur If child forgets books in school everyday be careful details of 121 pediatric patients taken in GSVM
डॉ. धनंजय चौधरी - फोटो : amar ujala

विस्तार

अगर आपका बच्चा आए दिन स्कूल में कॉपी-किताब भूलकर चला आता है तो यह सामान्य बात नहीं है। अभिभावक उसे मनोचिकित्सक को दिखाएं क्योंकि इसी तरह के लक्षण लेकर बाल रोगी जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की बाल एवं किशोरावस्था क्लीनिक में आ रहे हैं। इसके अलावा व्हाइटनर या पेट्रोल सूंघने वाले बच्चे भी मानसिक बीमार हो सकते हैं। मनोरोग विभाग ने एक महीने में ऐसे 121 बाल रोगियों का ब्योरा इकट्ठा किया है।

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विशेषज्ञ इसका अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही परिजनों को बचाव संबंधी गाइडलाइन दी जा रही है। यहां आने वाले बाल रोगियों में किसी को चिड़चिड़ाहट और ज्यादा गुस्सा आता है], तो कोई बच्चा गुस्से में हाथ तक काट लेता है। घबराए मां-बाप उन्हें विशेषज्ञों के यहां लेकर आ रहे हैं।  मनोरोग विभाग की ओपीडी में बाल रोगियों की संख्या बढ़ने पर बच्चों के लिए अलग से क्लीनिक शुरू की गई है।

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बाल रोगियों में लड़के और लड़कियां दोनों हैं शामिल
क्लीनिक की शुरुआत से एक महीना पूरा होने पर बाल रोगियों का आंकड़ा इकट्ठा किया। इसे तीन समूहों में बांटा गया। पहला समूह चार से आठ साल, दूसरा नौ से 14 साल और तीसरा समूह 15 से 17 साल उम्र के बाल रोगियों का है। बाल रोगियों का यह आंकड़ा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को चिंता में डालने वाला आइना दिखा रहा है। विभागाध्यक्ष एंव प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि बाल रोगियों में लड़के और लड़कियां दोनों हैं।

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बिगड़ जाता है न्यूरो ट्रांसमीटर का संतुलन
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे बुरा असर माता-पिता के झगड़े, पारिवारिक कलह और स्क्रीन टाइम का पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि दिमाग पर बुरा असर आने से न्यूरो ट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है। लैपटॉप और मोबाइल की स्क्रीन आठ-नौ घंटे देखने से न्यूरो ट्रांसमीटर डोपामीन बहुत अधिक मात्रा में रिसने लगता है। बाल रोगियों में पाए गए लक्षणों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है।

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लक्षण

बालरोगियों का पहला समूह (4 से 8 साल)
बुद्धि से कमजोर, गुस्सा, जिद, चिड़चिड़ाना, पांच घंटे मोबाइल देखना, फोन दिखाने पर भोजन करना, बेहोशी, बेवजह हिचकी और खांसी, जोर-जोर से सांस लेना, स्कूल न जाना, बोर्ड देखकर भी गलत लिखना, स्कूल में सामान भूलकर आना, अस्थिरता, सामान पर चढ़ना-कूदना।

दूसरा समूह (9 से 14 साल)
बेहोशी आना, मिर्गी जैसे दौरे आना, तनावग्रस्त रहना, अनजानी चीज के भय में रहना, अस्थिरता, भागते-दौड़ते रहना, पेट्रोल-व्हाइटनर सूंघना, सॉल्यूशन का नशा, फोन स्क्रीन की लत, मां-बाप से अभद्रता, आठ घंटे फोन स्क्रीन देखना, पढ़ाई न करना।

तीसरा समूह (15 से 17 साल)
रिश्तों में समस्या आना, दूसरे के साथ सामंजस्य न बैठा पाना, सात-आठ घंटे मोबाइल देखना, ब्रेकअप, स्कूल में लड़ाई-झगड़ा करना, एंजाइटी होना, अनिद्रा की समस्या, आत्महत्या के विचार आना, हाथ काट लेना, प्राइवेट पार्ट्स के आसपास जख्म कर लेना, माता-पिता से खराब संबंध।

बचाव

पारिवारिक कलह खत्म करें, परिवार के सदस्य बच्चे से विरोधाभासी बात न करें। बच्चों से बातचीत करें, उनकी समस्या सुनें। जब गुस्से में हों तो न समझाएं। छोटी-छोटी बातों पर टोकाटाकी न करें। स्क्रीन देखने की अवधि निश्चित कर दें। संगीत, मार्शल आर्ट्स सीखने के लिए भेजें। बच्चों के क्रियाकलाप में माता-पिता सहभागिता करें, बच्चों को नैतिकता संबंधी कथाएं सुनाएं।

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