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Kanpur: कार्डियोलॉजी में पहली बार लगाया गया बिना तार का पेसमेकर, 15-20 साल चलती बैटरी
Tue, 30 Sep 2025 10:57 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 30 Sep 2025 10:57 PM IST
सार
बिना तार का पेसमेकर जांघ की नस से हृदय में लगाया जाता है, रोगी आराम से सीटी स्कैन-एमआरआई करा सकेगा। 9.5 लाख रुपये कीमत है।
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रोगी अशोक कुमार को बिना तार का पेसमेकर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में पहली बार बिना तार के दो ग्राम वजन वाले लीडलेस पेसमेकर का सफल प्रत्यारोपण किया गया। पहले की तरह लगने वाले पेस मेकर की तरह इसमें कोई तार नहीं रहेगा। कैप्सूलनुमा इस पेसमेकर के अंदर ही बैटरी रहेगी। यह बैटरी 18 से 20 साल तक चलेगी। रोगी के एमआरआई, सीटी स्कैन, एक्सरे कराने से इस पर कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। पेसमेकर जांघ की नस के माध्यम से हृदय में प्रत्यारोपित किया गया।
कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में पहला लीडलेस पेसमेकर खलासी लाइन के रहने वाले अशोक कुमार शर्मा (75) को लगाया गया। रोगी इंस्टीट्यूट के निदेशक एवं प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार वर्मा के अंडर में भर्ती रहे हैं। डॉ. वर्मा ने बताया कि रोगी की हार्ट सर्जरी 2013 में हुई थी। इसके बाद उसी साल 23 अक्तूबर को सीने के दाएं हिस्से में पहला पेसमेकर लगाया गया। इस पेसमेकर की बैटरी तीन सितंबर 2022 को बदली गई थी। वहां संक्रमण विकसित हो गया।
फिर 18 सितंबर 2024 को सीने के बाएं हिस्से में नया पेसमेकर प्रत्यारोपित किया गया। 30 सितंबर 2025 को उस स्थान पर भी संक्रमण हो गया लेकिन प्रत्येक बार कल्चर टेस्ट निगेटिव आया। बाईपास सर्जरी होने के कारण एपिकार्डियल पेसमेकर प्रत्यारोपण भी संभव नहीं था। रोगी के लिए लीडलेस पेसमेकर ही एकमात्र सुरक्षित व प्रभावी विकल्प था। ऐसे में लीडलेस पेसमेकर रोगी के हृदय के दाएं हार्ट चैंबर की अंदरूनी दीवार में लगाया गया। बैटरी डिस्चार्ज होने पर इसे आसानी से निकाल कर नया पेसमेकर पुनः प्रत्यारोपित किया जा सकता है।
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इसकी कीमत अभी साढ़े नौ लाख रुपये है। कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. उमेश्वर पांडेय ने बताया कि अन्य कंपनियों के बनाने के बाद इसकी कीमत कम हो जाएगी। विशेषज्ञों की टीम में डॉ. अवधेश कुमार शर्मा, डॉ. मुकेश झा, जयपुर के डॉ. कुश भगत आदि रहे।
पुराने पेसमेकर में अलग से लगती है बैटरी
पुराने पेसमेकर में बैटरी अलग लगाई जाती है। हार्ट में पेसमेकर प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे निकला एक तार छाती की मांसपेशियाें तक आता है। मांसपेशी में बैटरी लगती है। बैटरी खत्म होने पर इसे बदला जाता है। डॉक्टर को हर छह महीने से एक साल में बैटरी की जांच करनी पड़ती है। नए लीडलेस कैप्सूल के अंदर ही लीथियम की बैटरी रहेगी जो 18-20 साल तक चार्ज रहेगी।
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कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में पहला लीडलेस पेसमेकर खलासी लाइन के रहने वाले अशोक कुमार शर्मा (75) को लगाया गया। रोगी इंस्टीट्यूट के निदेशक एवं प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार वर्मा के अंडर में भर्ती रहे हैं। डॉ. वर्मा ने बताया कि रोगी की हार्ट सर्जरी 2013 में हुई थी। इसके बाद उसी साल 23 अक्तूबर को सीने के दाएं हिस्से में पहला पेसमेकर लगाया गया। इस पेसमेकर की बैटरी तीन सितंबर 2022 को बदली गई थी। वहां संक्रमण विकसित हो गया।
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फिर 18 सितंबर 2024 को सीने के बाएं हिस्से में नया पेसमेकर प्रत्यारोपित किया गया। 30 सितंबर 2025 को उस स्थान पर भी संक्रमण हो गया लेकिन प्रत्येक बार कल्चर टेस्ट निगेटिव आया। बाईपास सर्जरी होने के कारण एपिकार्डियल पेसमेकर प्रत्यारोपण भी संभव नहीं था। रोगी के लिए लीडलेस पेसमेकर ही एकमात्र सुरक्षित व प्रभावी विकल्प था। ऐसे में लीडलेस पेसमेकर रोगी के हृदय के दाएं हार्ट चैंबर की अंदरूनी दीवार में लगाया गया। बैटरी डिस्चार्ज होने पर इसे आसानी से निकाल कर नया पेसमेकर पुनः प्रत्यारोपित किया जा सकता है।
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इसकी कीमत अभी साढ़े नौ लाख रुपये है। कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. उमेश्वर पांडेय ने बताया कि अन्य कंपनियों के बनाने के बाद इसकी कीमत कम हो जाएगी। विशेषज्ञों की टीम में डॉ. अवधेश कुमार शर्मा, डॉ. मुकेश झा, जयपुर के डॉ. कुश भगत आदि रहे।
पुराने पेसमेकर में अलग से लगती है बैटरी
पुराने पेसमेकर में बैटरी अलग लगाई जाती है। हार्ट में पेसमेकर प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे निकला एक तार छाती की मांसपेशियाें तक आता है। मांसपेशी में बैटरी लगती है। बैटरी खत्म होने पर इसे बदला जाता है। डॉक्टर को हर छह महीने से एक साल में बैटरी की जांच करनी पड़ती है। नए लीडलेस कैप्सूल के अंदर ही लीथियम की बैटरी रहेगी जो 18-20 साल तक चार्ज रहेगी।