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Kanpur News: जीडीपी रैंकिंग में पांचवें से छठे स्थान पर फिसला कानपुर
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कानपुर। कभी उत्तर प्रदेश की मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाला कानपुर अब आर्थिक रैंकिंग में पिछड़ता दिख रहा है। एक लाख करोड़ अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को लेकर राज्य सकल घरेलू उत्पाद (एसजीडीपी) की हुई समीक्षा में कानपुर 2024-25 में छठे स्थान पर पहुंच गया है। 2023-24 में शहर पांचवें स्थान पर था। 2023-24 में शहर की एसजीडीपी 79,967.97 करोड़ रुपये थी। 2024-25 में यह बढ़कर 86,177.93 करोड़ रुपये दर्ज की गई। आर्थिक रैंकिंग में गौतमबुद्ध नगर पहले, लखनऊ दूसरे, गाजियाबाद तीसरे, प्रयागराज चौथे और आगरा पांचवें स्थान पर रहा।
जिले की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1,47,443 रुपये बताई गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत आय 2,05,324 रुपये है। यानी कानपुर की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 57,881 रुपये कम है। वहीं जिले की अर्थव्यवस्था में श्रम और उत्पादन के बीच असंतुलन भी सामने आया है। निर्माण क्षेत्र से 35.30 प्रतिशत उत्पादन मिल रहा है, लेकिन कुल कार्यबल का केवल 3.33 प्रतिशत ही इस क्षेत्र में लगा है।
इसके उलट 43.10 प्रतिशत कार्यबल खेती पर निर्भर है। यानी अधिक उत्पादन देने वाले क्षेत्र में कार्यबल की हिस्सेदारी कम है, जबकि बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। आर्थिक समीक्षा में इस असंतुलन को दूर करने के लिए एमएसएमई और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार पर जोर दिया गया है। चुनौती कृषि आधारित कार्यबल को अधिक उत्पादक और बेहतर भुगतान वाले औद्योगिक रोजगार से जोड़ने की है।
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एमओयू के जमीन पर उतरने की रफ्तार धीमी
कानपुर में निवेश और उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर एमओयू हुए हैं, लेकिन इनमें से कई प्रस्ताव अभी तक जमीन पर नहीं उतर सके हैं। निवेश प्रस्तावों को उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों में बदलने की गति अपेक्षाकृत धीमी है। ऐसे में निवेश प्रस्तावों के प्रभावी क्रियान्वयन और औद्योगिक विस्तार को गति देना जिले के सामने बड़ी चुनौती है।
उद्योगों तक कर्ज की पहुंच भी चुनौती
बैंकिंग क्षेत्र के आंकड़ों में भी उद्योगों के लिए कर्ज की सीमित हिस्सेदारी सामने आई है। कुल बैंक ऋण में उद्योग ऋण की हिस्सेदारी 6.95 प्रतिशत बताई गई है। ऐसे में औद्योगिक इकाइयों के विस्तार, मशीनरी में निवेश और नई आर्थिक गतिविधियों के लिए वित्तीय पहुंच बढ़ाना जरूरी है।
खेती में खाद का संतुलन भी बिगड़ा
कृषि क्षेत्र में भी उर्वरकों के इस्तेमाल का संतुलन बिगड़ा हुआ है। फसल उत्पादन के लिए एनपीके का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि कानपुर में खपत का अनुपात करीब 27:8:1 है। यानी नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल अन्य पोषक तत्वों की तुलना में काफी अधिक है। लंबे समय में उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
वर्जन
अर्थव्यवस्था में सुधार और विकास को गति देने के लिए जिन विभागों की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी है, उन्हें आपस में बेहतर समन्वय बनाकर काम करने के लिए कहा गया है। कृषि विभाग को ऐसी फसलों के उत्पादन पर जोर देने के लिए कहा गया है, जिनसे किसानों को अधिक आमदनी हो सके। — ईशा शर्मा, जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी
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जिले की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1,47,443 रुपये बताई गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत आय 2,05,324 रुपये है। यानी कानपुर की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 57,881 रुपये कम है। वहीं जिले की अर्थव्यवस्था में श्रम और उत्पादन के बीच असंतुलन भी सामने आया है। निर्माण क्षेत्र से 35.30 प्रतिशत उत्पादन मिल रहा है, लेकिन कुल कार्यबल का केवल 3.33 प्रतिशत ही इस क्षेत्र में लगा है।
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इसके उलट 43.10 प्रतिशत कार्यबल खेती पर निर्भर है। यानी अधिक उत्पादन देने वाले क्षेत्र में कार्यबल की हिस्सेदारी कम है, जबकि बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। आर्थिक समीक्षा में इस असंतुलन को दूर करने के लिए एमएसएमई और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार पर जोर दिया गया है। चुनौती कृषि आधारित कार्यबल को अधिक उत्पादक और बेहतर भुगतान वाले औद्योगिक रोजगार से जोड़ने की है।
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एमओयू के जमीन पर उतरने की रफ्तार धीमी
कानपुर में निवेश और उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर एमओयू हुए हैं, लेकिन इनमें से कई प्रस्ताव अभी तक जमीन पर नहीं उतर सके हैं। निवेश प्रस्तावों को उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों में बदलने की गति अपेक्षाकृत धीमी है। ऐसे में निवेश प्रस्तावों के प्रभावी क्रियान्वयन और औद्योगिक विस्तार को गति देना जिले के सामने बड़ी चुनौती है।
उद्योगों तक कर्ज की पहुंच भी चुनौती
बैंकिंग क्षेत्र के आंकड़ों में भी उद्योगों के लिए कर्ज की सीमित हिस्सेदारी सामने आई है। कुल बैंक ऋण में उद्योग ऋण की हिस्सेदारी 6.95 प्रतिशत बताई गई है। ऐसे में औद्योगिक इकाइयों के विस्तार, मशीनरी में निवेश और नई आर्थिक गतिविधियों के लिए वित्तीय पहुंच बढ़ाना जरूरी है।
खेती में खाद का संतुलन भी बिगड़ा
कृषि क्षेत्र में भी उर्वरकों के इस्तेमाल का संतुलन बिगड़ा हुआ है। फसल उत्पादन के लिए एनपीके का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि कानपुर में खपत का अनुपात करीब 27:8:1 है। यानी नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल अन्य पोषक तत्वों की तुलना में काफी अधिक है। लंबे समय में उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
वर्जन
अर्थव्यवस्था में सुधार और विकास को गति देने के लिए जिन विभागों की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी है, उन्हें आपस में बेहतर समन्वय बनाकर काम करने के लिए कहा गया है। कृषि विभाग को ऐसी फसलों के उत्पादन पर जोर देने के लिए कहा गया है, जिनसे किसानों को अधिक आमदनी हो सके। — ईशा शर्मा, जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी