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हिंदी के सिंह: आईपीएस अनिरुद्ध सिंह ने हिंदी माध्यम से यूपीएससी परीक्षा में हासिल की थी 146वीं रैंक
Sat, 08 Aug 2020 10:28 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 08 Aug 2020 10:28 AM IST
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आईपीएस अनिरुद्ध सिंह
- फोटो : amar ujala
हिंदी माध्यम के हैं तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि ज्ञान की कमी है। ज्ञान के मामले में तो किसी को भी टक्कर दे सकते हैं। ज्ञान अर्जित करने में भाषा कभी बाधक नहीं बन सकती। यह कहना है वर्ष-2018 बैच के आईपीएस अनिरुद्ध सिंह का। उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में हिंदी माध्यम अपनाकर 146वीं रैंक हासिल की थी।
कहते हैं कि अपने भावों को प्रस्तुत करना हिंदी में काफी सहज लगा। बचपन से लेकर आज तक हर कदम पर मेरा मान बढ़ाया। बचपन से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक हिंदी भाषा का साथ लेकर आगे बढ़ा। अपनी भाषा को लेकर कभी हीन भावना ने नहीं घेरा। बचपन से गुरुओं ने सिखाया था कि भाषा ज्ञान की मोहताज नहीं होती।
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कहते हैं कि अपने भावों को प्रस्तुत करना हिंदी में काफी सहज लगा। बचपन से लेकर आज तक हर कदम पर मेरा मान बढ़ाया। बचपन से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक हिंदी भाषा का साथ लेकर आगे बढ़ा। अपनी भाषा को लेकर कभी हीन भावना ने नहीं घेरा। बचपन से गुरुओं ने सिखाया था कि भाषा ज्ञान की मोहताज नहीं होती।
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जिस भाषा में खुद को अच्छे से व्यक्त कर सको उसी के साथ आगे बढ़ना। यही कारण रहा कि हिंदी का साथ नहीं छोड़ा। रेल बाजार निवासी अनिरुद्ध मूल रूप से बिहार के जहानाबाद के रहने वाले हैं। उन्होंने 10वीं और 12वीं की पढ़ाई बीएनएसडी शिक्षा निकेतन से की। एचबीटीयू से बीटेक करने के बाद वाणिज्य कर विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में 5 वर्षों तक तैनात रहे।
2015 में आईपीएस आरती सिंह से विवाह के बाद उन्होंने फिर से यूपीएससी की परीक्षा दी और चौथे प्रयास में 146 रैंक मिली। अब मुरादाबाद में प्रशिक्षण ले रहे हैं। अनिरुद्ध कहते हैं कि शुरू से ही हिंदी से लगाव रहा है। हिंदी मातृभाषा है तो विचारों को व्यक्त करने में काफी आसानी होती है। इस वजह से ठाना कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिंदी माध्यम ही अपना कर परीक्षा दूंगा।
यह कहना गलत नहीं है कि हिंदी भाषा के छात्रों को किन्हीं कारणों से प्रतियोगी परीक्षा में वह स्थान नहीं मिल पाता जिसके वह हकदार हैं। यूपीएससी में भी बदलाव की आवश्यकता है। हिंदी भाषी छात्रों को लेकर एक मानसिकता है जो बदली जानी चाहिए। मैंने कभी भी हिंदी का साथ नहीं छोड़ा, मुझे पूर्ण विश्वास था कि एक ना एक दिन इसी भाषा की वजह से मैं अपने मनचाहे मुकाम तक जरूर पहुंचूंगा। अगर थोड़ा बदलाव हो तो यूपीएससी की परीक्षा में हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों को भी अधिक मौका मिलेगा।
2015 में आईपीएस आरती सिंह से विवाह के बाद उन्होंने फिर से यूपीएससी की परीक्षा दी और चौथे प्रयास में 146 रैंक मिली। अब मुरादाबाद में प्रशिक्षण ले रहे हैं। अनिरुद्ध कहते हैं कि शुरू से ही हिंदी से लगाव रहा है। हिंदी मातृभाषा है तो विचारों को व्यक्त करने में काफी आसानी होती है। इस वजह से ठाना कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिंदी माध्यम ही अपना कर परीक्षा दूंगा।
यह कहना गलत नहीं है कि हिंदी भाषा के छात्रों को किन्हीं कारणों से प्रतियोगी परीक्षा में वह स्थान नहीं मिल पाता जिसके वह हकदार हैं। यूपीएससी में भी बदलाव की आवश्यकता है। हिंदी भाषी छात्रों को लेकर एक मानसिकता है जो बदली जानी चाहिए। मैंने कभी भी हिंदी का साथ नहीं छोड़ा, मुझे पूर्ण विश्वास था कि एक ना एक दिन इसी भाषा की वजह से मैं अपने मनचाहे मुकाम तक जरूर पहुंचूंगा। अगर थोड़ा बदलाव हो तो यूपीएससी की परीक्षा में हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों को भी अधिक मौका मिलेगा।