फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   If your child forgets his book in school every day then be careful

Kanpur News: बच्चा आए दिन स्कूल में किताब भूले तो हो जाएं सावधान

Fri, 05 Sep 2025 02:25 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 05 Sep 2025 02:25 AM IST
विज्ञापन
If your child forgets his book in school every day then be careful
कानपुर। अगर आपका बच्चा आए दिन स्कूल में कॉपी-किताब भूलकर चला आता है तो यह सामान्य बात नहीं है। अभिभावक उसे मनोचिकित्सक को दिखाएं क्योंकि इसी तरह के लक्षण लेकर बाल रोगी जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की बाल एवं किशोरावस्था क्लीनिक में आ रहे हैं। इसके अलावा व्हाइटनर या पेट्रोल सूंघने वाले बच्चे भी मानसिक बीमार हो सकते हैं।
विज्ञापन


मनोरोग विभाग ने एक महीने में ऐसे 121 बाल रोगियों का ब्योरा इकट्ठा किया है। विशेषज्ञ इसका अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही परिजनों को बचाव संबंधी गाइडलाइन दी जा रही है। यहां आने वाले बाल रोगियों में किसी को चिड़चिड़ाहट और ज्यादा गुस्सा आता है तो कोई बच्चा गुस्से में हाथ तक काट लेता है। घबराए मां-बाप उन्हें विशेषज्ञों के यहां लेकर आ रहे हैं।मनोरोग विभाग की ओपीडी में बाल रोगियों की संख्या बढ़ने पर बच्चों के लिए अलग से क्लीनिक शुरू की गई है।
विज्ञापन


क्लीनिक की शुरुआत से एक महीना पूरा होने पर बाल रोगियों का आंकड़ा इकट्ठा किया। इसे तीन समूहों में बांटा गया। पहला समूह चार से आठ साल, दूसरा नौ से 14 साल और तीसरा समूह 15 से 17 साल उम्र के बाल रोगियों का है। बाल रोगियों का यह आंकड़ा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को चिंता में डालने वाला आइना दिखा रहा है। विभागाध्यक्ष एंव प्रोफेसर डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि बाल रोगियों में लड़के और लड़कियां दोनों हैं। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे बुरा असर माता-पिता के झगड़े, पारिवारिक कलह और स्क्रीन टाइम का पड़ रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


उन्होंने बताया कि दिमाग पर बुरा असर आने से न्यूरो ट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है। लैपटॉप और मोबाइल की स्क्रीन आठ-नौ घंटे देखने से न्यूरो ट्रांसमीटर डोपामीन बहुत अधिक मात्रा में रिसने लगता है। बाल रोगियों में पाए गए लक्षणों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है।
-----------
लक्षण
बालरोगियों का पहला समूह (4 से 8 साल)
बुद्धि से कमजोर, गुस्सा, जिद, चिड़चिड़ाना, पांच घंटे मोबाइल देखना, फोन दिखाने पर भोजन करना, बेहोशी, बेवजह हिचकी और खांसी, जोर-जोर से सांस लेना, स्कूल न जाना, बोर्ड देखकर भी गलत लिखना, स्कूल में सामान भूलकर आना, अस्थिरता, सामान पर चढ़ना-कूदना।
------
दूसरा समूह (9 से 14 साल)
बेहोशी आना, मिर्गी जैसे दौरे आना, तनावग्रस्त रहना, अनजानी चीज के भय में रहना, अस्थिरता, भागते-दौड़ते रहना, पेट्रोल-व्हाइटनर सूंघना, सॉल्यूशन का नशा, फोन स्क्रीन की लत, मां-बाप से अभद्रता, आठ घंटे फोन स्क्रीन देखना, पढ़ाई न करना।
-----
तीसरा समूह (15 से 17 साल)
रिश्तों में समस्या आना, दूसरे के साथ सामंजस्य न बैठा पाना, सात-आठ घंटे मोबाइल देखना, ब्रेकअप, स्कूल में लड़ाई-झगड़ा करना, एंजाइटी होना, अनिद्रा की समस्या, आत्महत्या के विचार आना, हाथ काट लेना, प्राइवेट पार्ट्स के आसपास जख्म कर लेना, माता-पिता से खराब संबंध।

-------
बचाव
-पारिवारिक कलह खत्म करें, परिवार के सदस्य बच्चे से विरोधाभासी बात न करें। बच्चों से बातचीत करें, उनकी समस्या सुनें। जब गुस्से में हों तो न समझाएं। छोटी-छोटी बातों पर टोकाटाकी न करें। स्क्रीन देखने की अवधि निश्चित कर दें। संगीत, मार्शल आर्ट्स सीखने के लिए भेजें। बच्चों के क्रियाकलाप में माता-पिता सहभागिता करें, बच्चों को नैतिकता संबंधी कथाएं सुनाएं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed