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Kanpur News: माल रोका है तो आदेश भी जरूरी, मजबूरी में किया गया भुगतान स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता

Thu, 31 Jul 2025 01:48 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 31 Jul 2025 01:48 AM IST
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If the goods are stopped then an order is also necessary, payment made under compulsion cannot be considered voluntary
कानपुर। सुप्रीम कोर्ट ने सीजीएसटी एक्ट के तहत करदाताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में अहम आदेश दिया है। शीर्ष कोर्ट ने एम/एस एएसपी ट्रेडर्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। इसमें केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम (सीजीएसटी एक्ट) 2017 की धारा 129(3) के तहत औपचारिक आदेश की मांग को खारिज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 129(3) के तहत शो-कॉज नोटिस के बाद आदेश अनिवार्य है। मजबूरी में किया गया भुगतान स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता। औपचारिक आदेश निष्पक्षता, पारदर्शिता और अपील के अधिकार को सुनिश्चित करता है।
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कानपुर सीए सीपीई स्टडी सर्किल के संयोजक सीए प्रशांत रस्तोगी और उप संयोजक सीए नितिन सिंह ने बताया कि 24 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और सहायक आयुक्त को एक महीने में धारा 129(4) के तहत सुनवाई कर फॉर्म जीएसटी मूव-09 में तर्कसंगत आदेश जारी करने का निर्देश दिया। ट्रेडर्स को अपील सहित कानूनी उपायों का अधिकार दिया गया है। इस आदेश का व्यापक असर सीजीएसटी कानून में दिख सकेगा। दोनों सीए ने बताया कि सिविल अपीलेट ज्यूरीडिक्शन की बेंच के जस्टिस जेबी पादरीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने मेसर्स एएसपी ट्रेडर्स बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में यह आदेश दिया है।
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ये था मामला: कर्नाटक के चन्नागिरी, दावणगेरे में पंजीकृत डीलर मेसर्स एएसपी ट्रेडर्स ने 14 जनवरी 2022 को 17,850 किलो सूखी सुपारी (मूल्य 51,72,930 रुपये) 255 बैग में पैक कर दिल्ली के मेसर्स डायमंड ट्रेडिंग कंपनी को भेजी। माल वाहन नंबर यूपी-78 जीएन-7563 से रवाना हुआ जिसके साथ ई-वे बिल था। रास्ते में माल को दूसरे वाहन एचआर-38 यू-0152 में स्थानांतरित किया गया लेकिन केवल 248 बैग (17,670 किलो) लोड हुए और सात बैग की कमी रह गई। 17 जनवरी 2022 को झांसी के ललितपुर बाईपास रोड पर मोबाइल यूनिट ने वाहन को रोक लिया। 21 जनवरी को जीएसटी मूव-06 के तहत रोकथाम आदेश और धारा 129(3) के तहत जीएसटी मूव 07 में शो-कॉज नोटिस जारी किया गया। इसमें कंसाइनी के गैर मौजूद होने और कंसाइनर का पता गलत होने का आरोप था। ट्रेडर्स ने 24 जनवरी को लिखित जवाब दाखिल कर आरोपों का खंडन किया। व्यापारिक मजबूरी के कारण 27 जनवरी को 7,20,440 रुपये का आईजीएसटी भुगतान फॉर्म जीएसटी डीआरसी-03 के जरिए किया। इसके बाद जीएसटी मूव 05 के तहत माल रिलीज हुआ। सहायक आयुक्त, मोबाइल यूनिट, झांसी ने धारा 129(3) के तहत अंतिम आदेश जारी नहीं किया। उनका दावा था कि भुगतान के बाद धारा 129(5) के तहत कार्यवाही समाप्त हो गई थी और ट्रेडर्स के प्रतिनिधि ने मौखिक रूप से आपत्तियां वापस ले ली थीं। इसे ट्रेडर्स ने नकारा और औपचारिक आदेश के लिए रिट याचिका दायर की जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 129(3) में नोटिस के बाद सुनवाई और तर्कसंगत आदेश अनिवार्य किया है। धारा 129(5) केवल आगे की कार्रवाई को रोकती है, न कि आदेश की आवश्यकता को समाप्त करती है। कोर्ट ने माना कि भुगतान व्यापारिक मजबूरी में किया गया, न कि स्वेच्छा से। जीएसटी पोर्टल में विरोध दर्ज करने का विकल्प न होने से करदाता को नुकसान नहीं होना चाहिए। मौखिक आपत्ति वापसी का कोई सबूत नहीं था।
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