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भगवान श्रीरामचंद्र और सीता के पुत्र ने यहां की थी कुशहरी देवी की स्थापना

Thu, 30 Mar 2017 12:42 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, उन्नाव
टीम डिजिटल, अमर उजाला, उन्नाव Updated Thu, 30 Mar 2017 12:42 AM IST
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history of kushari devi temple unnao
कुशहरी देवी
कुषाण काल मेें स्थापित कुशहरी देवी की महिमा दूर-दूर तक फैली है। यहां पर नवरात्र मेें लाखों की संख्या में भक्त पहुंचकर मां की उपासना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीरामचंद्र के पुत्र कुश ने अपनी मां सीता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्नाव के कुसुंभी गांव में देवी की स्थापना की थी।  जो बाद में माता कुशहरी देवी के नाम से विख्यात हुईं।
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शक्तिपीठों मेें से एक
यूपी के उन्नाव जिले के नवाबगंज कस्बे से लगभग चार किमी दूर कुसुंभी गांव में माता कुशहरी देवी का प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि यह मंदिर भारत देश में वर्णित शक्तिपीठों मेें से एक है। मान्यताओं के आधार पर जब श्रीराम ने सीता का परित्याग किया और अपने भाई लक्ष्मण को आदेश दिया कि जाओ सीता को गंगातट के जंगलों में छोड़ आओ। तो भाई का आदेश मिलते ही लक्ष्मण सीता को रथ पर बिठाकर निकल पड़े। मार्ग में माता सीता को प्यास लगी तो उन्होंने लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा। पात्र लेकर जैसे ही एक कुएं से जल लेने का प्रयास किया तो कुएं से एक आवाज आई कि पहले मुझे बाहर निकालो फिर यहां से जल भरो। लक्ष्मण ने वैसा ही किया तो कुंए से एक देवी मूर्ति निकली। उस मूर्ति को उन्होंने कुएं के पास एक बरगद के पेड़ के नीचे रख दिया और जल लेकर सीता के पास पहुंचे। उन्होेंने इस बारे में सीता को बता दिया।

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सीता यह सुनकर बहुत दुखी हुईं

गंगातट पर रथ रोक नाव से बिठूर के पास जंगल मेें पहुंचे। यहां आने के बाद सीता को बताया कि श्रीराम ने उन्हें त्याग दिया है। कहा यहां बाल्मीकि ऋषि का आश्रम है। वह हमारे पिता दशरथ के गुरू हैं। सीता जी यह सुनकर बहुत दुखी हुईं और कहा अपने भाई से जाकर कहना कि मैं गर्भवती हूूं। यह सुनकर लक्ष्मण व्यथित हो गए। इसके बाद लक्ष्मण वापस अयोध्या चले गए। तपोवन में सीता का विलाप सुनकर बाल्मीकि आए और सीता को अपने साथ आश्रम ले गए। वहां उन्हें ऋषि मुनियों की पत्नियों के साथ रहने का स्थान दिया। समय आने पर सीता को लव और कुश नामक दो पुत्र हुए। दोनों बालक महान पराक्रमी हुए।

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अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान

काफी दिनों बाद नैमिषारण्य धाम में श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया। यज्ञ में भाग लेने के लिए बाल्मीकि  ऋषि सीता व लव कुश को साथ लेकर चले। रास्ते मेें उसी स्थान को देखकर सीताजी को याद आया कि लक्ष्मण ने यहां एक देवी मूर्ति रखी थी। तब सीता ने कहा कुश इस देवी मूर्ति की स्थापना करो। कुश ने मां की आज्ञा का पालन कर देवी की स्थापना की जो बाद में माता कुशहरी देवी के नाम से विख्यात हुईं।



अष्टभुजा मां दुर्गा का भी महत्व
वहीं कस्बे के पछियावां में अष्टभुजा मां दुर्गा का अति प्राचीन मंदिर है। इसके विषय में कहा जाता है कि परशुराम ने सहस्त्राबाहु राक्षस पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से देवी की उपासना कर स्थापित किया था। भोर पहर से ही यहां भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मंदिर में नवरात्रि के दौरान हर्षोल्लास का वातावरण रहता है।

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