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हिंदी हैं हम : मातृ भाषा को बोलने में गर्व महसूस करिए, टीवी, मोबाइल नहीं बच्चों को संस्कृति से जोड़े

Mon, 17 Aug 2020 03:16 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर देहात
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर देहात Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Mon, 17 Aug 2020 03:16 PM IST
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Hindi is us: take pride in speaking the mother tongue, TV, not mobile, connect children with culture
हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
भारतेंदु हरिशचंद्र की पंक्तियां निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय (हृदय) को शूल। इन पंक्तियों ने एक बार फिर हिंदी के महत्व को समझाने की कोशिश की। अमर उजाला की ओर से शुक्रवार को हिंदी है हम विषय पर आयोजित आनलाइन संगोष्ठी (वेबिनार) में हिंदी सेवियों व साहित्यकारों ने अपने विचार रखे।
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कहा कि संवैधानिक तौर पर हिंदी को राष्ट्र भाषा के रुप में स्थापित नहीं किया जा सका है। इसमें भारतीयों के मन में विदेशी सभ्यता व संस्कृति की ओर आर्कषित होना बड़ा कारण है। वेबिनार को संबोधित करते हुए अकबरपुर राजकीय महाविद्यालय के अस्टिेंट प्रोफेसर हिंदी डा. श्याम मनोहर पांडेय ने कहा कि अमर उजाला ने बहुत ही अच्छे विषय को उठाया है।
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इसे साकार करने के लिए हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प लेना होगा। कहा कि कवि हरिवंश राय बच्चन ने अंग्रेजी के अच्छे जानकार होने के बावजूद संपूर्ण लेखन हिंदी में किया। उन्होंने ऐसा करके मातृ भाषा को स्थापित करने की सार्थक पहल की। अकबपुर डिग्री कालेज के प्रवक्ता डा. राममनोहर मिश्रा ने कहा कि शिक्षा प्रक्रिया मानसिक स्थिति को प्रभावित करती है।
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शिक्षा का महत्व बदल देती है। विदेशी सभ्यता व भाषा का ज्ञान होना बुरी बात नहीं है बल्कि उसका अनुसरण करना देश की संस्कृति के साथ कुठारघात है। भदेसा पूर्व माध्यमिक विद्यालय की शिक्षिका शशिप्रभा सचान ने कहा कि मातृभाषा को कहीं भी बोलने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। लोग अंग्रेजी बोलकर गौरांवित होते हैं और समाज भी ऐसे ही लोगों को काबिल समझता है। यह बड़ी विडंबना है। अकबरपुर के राहुल त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी की अच्छा ज्ञान होने के बाद भी लोग टूटी फूटी अंग्रेजी बोलकर खुद का काबिल साबित करने की कोशिश करते हैं। वेबिनार में डा. राजेश शर्मा, शिक्षक अंजुमनी, रूपी आदि जुड़े रहे। 

राष्ट्रीय ध्वज व चिंह की तरह होता राष्ट्रभाषा का महत्व 
साहित्यकार राजकीय डिग्री कालेज की प्रोफेसर डा. अर्चना गौर ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज, चिंह की राष्ट्रभाषा का भी महत्व होता है। हिंदी को समझने के लिए जब तक बच्चों को अच्छे से वर्णमाला का ज्ञान नहीं कराएंगे। तब उनके मन में हिंदी के प्रति प्रेम जागृत नहीं होगा। हिंदी जैसी सरल, सहज व मधु भाषा कोई और नहीं है। इसके महत्व को बढ़ाने के लिए हिंदी भाषा बोलने में गर्व महसूस करना चाहिए।

हिंदी बोलने मेें न करें संकोच
साहित्यकार हिंदी प्रवक्ता आचार्य पियूष ने हिंदी के महत्व पर बोलते हुए कहा कि कहीं भी जाएं पर हिंदी बोलने में संकोच न करें। उन्होंने खुद के बारे में बताया कि वह कई बार हवाई यात्रा की, लेकिन हवाई अड्डे से लेकर एयर होस्टेस से भी हिंदी में ही बात करते हैं। कहा कि उन्हें सबको हिंदी आती है, लेकिन आप स्वयं संकोच करते हैं। इससे वह अंग्रेजी बोलती हैं। कहा बाहर जाने पर हिंदी भाषी खुद को बौना समझने लगता है। यह सबसे बड़ी कमजोरी है।

 

मां की तरह भाषा पर भी होना चाहिए गर्व 
बेसिक शिक्षा विभाग की शिक्षक सुमन यादव ने कहा कि मां की तरह मातृ भाषा पर भी गर्व होना चाहिए। बच्चों मे मॉम, डैड, अंकल, आंटी कहने की आदत नहीं डालनी चाहिए। घर में आम बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करके मातृ भाषा व संस्कृति से आने वाली पीढ़ी को दूर किया जा रहा है। बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने की ललक भी हिंदी को कमजोर कर रही है। कहा कि अमर उजाला की हिंदी हैं हम पहल बहुत ही सराहनीय है।

हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तान हमारा
प्राथमिक विद्यालय मोती निवादा रसूलाबाद के शिक्षक अंजुमणि कश्यप ने कहा कि टीवी, मोबाइल से नहीं लोक संस्कृति से युवाओं को जुडऩा चाहिए। हिंदी हैं हम, वतन है, हिंदुस्तान हमारा यह भावना हर बच्चे के अंदर शुरु से भरनी होगी। स्कूलों के बहुत बच्चे राष्ट्रीय कवियों, महत्वपूर्ण पुस्तकों के नाम नहीं जानते। इसमें घर परिवार से लेकर गुरुजनों की जिम्मेदारी बनती है। आने वाली पीढ़ी किस ओर जा रही है यह हम सभी को सोचने की जरूरत है। 

हिंदी को न समझें हीन
गलुवापुर इंटर कालेज के पूर्व प्रवक्ता डा. रामगोपाल पांडेय ने कहा कि ङ्क्षहदी को अभी तक हीन समझने की प्रवृत्ति समाज से गई नहीं है। यही वजह है कि युवा पीढ़ी का रूझान इस ओर नहीं हो पा रहा है। गैर ङ्क्षहदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा को ही बढ़ावा दिया जाता है। इससे अंग्रेजी को बल मिल रहा है। जबकि गैर हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी की जगह हिंदी को बढ़ावा मिलना चाहिए।
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