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मरीजों की भरमार, दिक्कतें हजार
ब्यूरो अमर उजाला कानपुर
Updated Tue, 09 Aug 2016 01:28 AM IST
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हैलट में मरीजों को बेडशीट तक मयस्सर नहीं हैं, इससे ज्यादा क्या बदहाली होगी।
- फोटो : amarujala
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हैलट ः दवाएं-जांच बाहर से
हैलट का मेडिसिन वार्ड फुल नहीं है। इमरजेंसी वार्ड तक तो मरीज यहां रुकते हैं लेकिन जैसे ही उन्हें वार्डों में शिफ्ट किया जाता है तो जूनियर डॉक्टरों का रुख और ज्यादातर दवाएं बाहर से मंगाने से परेशान होकर प्राइवेट अस्पतालों में जाना ही बेहतर समझते हैं। हैलट की पैथोलॉजी की जांच को जूनियर डॉक्टर रिजेक्ट कर प्राइवेट से जांच कराने को कहते हैं। यदि प्राइवेट से जांच न कराई तो इलाज भी मनमाना होता है। जूनियर डॉक्टर ही जांच के लिए प्राइवेट लड़के बुलाते हैं।
थर्मामीटर तक नहीं
बारिश के मौसम में बुखार का प्रकोप बढ़ रहा है। आलम यह है कि सैकड़ों की संख्या में मरीजों के आने के बावजूद उर्सला और हैलट में थर्मामीटर नहीं है। तीमारदार खुद थर्मामीटर खरीद रहे हैं और जांच कर डॉक्टर रिपोर्ट कर रहे हैं। वहीं, अस्पतालों में भर्ती ज्यादातर नर्स ग्लूकोज की बोतल वार्ड ब्वाय से बदलवा रही हैं। इंजेक्शन भी यही वार्ड ब्वाय लगा दे रहे हैं।
बुखार का इंजेक्शन बाहर से
हैलट और उर्सला में बुखार का सामान्य इंजेक्शन भी मरीजों को बाहर से मंगाना पड़ रहा है। अस्पतालों की एंटीबायोटिक्स को यहीं के डॉक्टर साधारण बताकर मरीजों और तीमारदारों को डरा रहे हैं। पसंद के मेडिकल स्टोर्स से दवाएं मंगाई जा रही हैं। मरीजों को बेड शीट तक नहीं मिल रही है। खुद ग्लूकोज की बोतल पर नजर रखनी है और खत्म होने पर ड्रिप को बंद करना भी तीमारदार की जिम्मेदारी है।
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उर्सला ः नहीं जम रहा भरोसा
जिला अस्पताल उर्सला में सफाई तो ठीक है लेकिन इलाज करने वाले डॉक्टरों पर मरीजों को भरोसा नहीं है। यही वजह है कि यहां वार्ड इस मौसम में भी खाली पड़े हैं। बुखार पीड़ित एक युवती ने बताया कि जब तक दवा खा रहे हैं, तब तक तबीयत ठीक रहती है। प्राइवेट में जाते तो ठीक हो जाते, लेकिन रुपये नहीं है। इस कारण मजबूरी में यहां इलाज करा रहे हैं।
फार्मासिस्ट भी सोए
हैलट और उर्सला के वार्डों में जाने वाली दवाओं की निगरानी चीफ फार्मासिस्ट के जिम्मे होती है लेकिन फार्मासिस्ट वार्डों में जाते ही नहीं हैं। रविवार को हैलट के वार्ड नंबर 14 में वार्ड ब्वाय लोगों को बुला-बुलाकर ग्लूकोज की बोतलें दे रहा था। उस समय स्टाफ नर्स मोबाइल पर व्यस्त थीं।
डायरिया के मरीजों की हालत बिगड़ी
हैलट के मेडिसिन वार्ड में भर्ती उल्टी-दस्त पीड़ितों की हालत गंदगी और बदबू से बिगड़ रही है। वार्ड नंबर 16 के बाहर गंदगी के कारण बुरा हाल है। शासन ने अस्पताल के सभी बाथरूम को दुरुस्त कराने के निर्देश दिए थे। पांच महीने पहले दौरे पर आए प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा अनूप चंद्र पांडेय ने बजट जारी करने की भी बात कही थी लेकिन कुछ नहीं हुआ।
मेडिकल कॉलेज में होती है डेंगू की जांच
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में डेंगू की जांच होती है। सरकारी अस्पतालों से भेजे जाने वाले सैंपल की जांच फ्री और प्राइवेट अस्पतालों से भेजे जाने वाले सैंपल की जांच के लिए दो सौ रुपये जमा कराए जाते हैं लेकिन कमीशन के चक्कर में ज्यादातर डॉक्टर प्राइवेट पैथोलॉजी में डेंगू की जांच करा रहे हैं। इसका रेट 15 सौ से दो हजार रुपये तक है। पुष्टि होने के बाद वह जांच के लिए ब्लड फिर मेडिकल कॉलेज ही भेज रहे हैं। इससे मरीजों को दो बार रुपये देने पड़ रहे हैं।
हैलट का मेडिसिन वार्ड फुल नहीं है। इमरजेंसी वार्ड तक तो मरीज यहां रुकते हैं लेकिन जैसे ही उन्हें वार्डों में शिफ्ट किया जाता है तो जूनियर डॉक्टरों का रुख और ज्यादातर दवाएं बाहर से मंगाने से परेशान होकर प्राइवेट अस्पतालों में जाना ही बेहतर समझते हैं। हैलट की पैथोलॉजी की जांच को जूनियर डॉक्टर रिजेक्ट कर प्राइवेट से जांच कराने को कहते हैं। यदि प्राइवेट से जांच न कराई तो इलाज भी मनमाना होता है। जूनियर डॉक्टर ही जांच के लिए प्राइवेट लड़के बुलाते हैं।
थर्मामीटर तक नहीं
बारिश के मौसम में बुखार का प्रकोप बढ़ रहा है। आलम यह है कि सैकड़ों की संख्या में मरीजों के आने के बावजूद उर्सला और हैलट में थर्मामीटर नहीं है। तीमारदार खुद थर्मामीटर खरीद रहे हैं और जांच कर डॉक्टर रिपोर्ट कर रहे हैं। वहीं, अस्पतालों में भर्ती ज्यादातर नर्स ग्लूकोज की बोतल वार्ड ब्वाय से बदलवा रही हैं। इंजेक्शन भी यही वार्ड ब्वाय लगा दे रहे हैं।
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बुखार का इंजेक्शन बाहर से
हैलट और उर्सला में बुखार का सामान्य इंजेक्शन भी मरीजों को बाहर से मंगाना पड़ रहा है। अस्पतालों की एंटीबायोटिक्स को यहीं के डॉक्टर साधारण बताकर मरीजों और तीमारदारों को डरा रहे हैं। पसंद के मेडिकल स्टोर्स से दवाएं मंगाई जा रही हैं। मरीजों को बेड शीट तक नहीं मिल रही है। खुद ग्लूकोज की बोतल पर नजर रखनी है और खत्म होने पर ड्रिप को बंद करना भी तीमारदार की जिम्मेदारी है।
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उर्सला ः नहीं जम रहा भरोसा
जिला अस्पताल उर्सला में सफाई तो ठीक है लेकिन इलाज करने वाले डॉक्टरों पर मरीजों को भरोसा नहीं है। यही वजह है कि यहां वार्ड इस मौसम में भी खाली पड़े हैं। बुखार पीड़ित एक युवती ने बताया कि जब तक दवा खा रहे हैं, तब तक तबीयत ठीक रहती है। प्राइवेट में जाते तो ठीक हो जाते, लेकिन रुपये नहीं है। इस कारण मजबूरी में यहां इलाज करा रहे हैं।
फार्मासिस्ट भी सोए
हैलट और उर्सला के वार्डों में जाने वाली दवाओं की निगरानी चीफ फार्मासिस्ट के जिम्मे होती है लेकिन फार्मासिस्ट वार्डों में जाते ही नहीं हैं। रविवार को हैलट के वार्ड नंबर 14 में वार्ड ब्वाय लोगों को बुला-बुलाकर ग्लूकोज की बोतलें दे रहा था। उस समय स्टाफ नर्स मोबाइल पर व्यस्त थीं।
डायरिया के मरीजों की हालत बिगड़ी
हैलट के मेडिसिन वार्ड में भर्ती उल्टी-दस्त पीड़ितों की हालत गंदगी और बदबू से बिगड़ रही है। वार्ड नंबर 16 के बाहर गंदगी के कारण बुरा हाल है। शासन ने अस्पताल के सभी बाथरूम को दुरुस्त कराने के निर्देश दिए थे। पांच महीने पहले दौरे पर आए प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा अनूप चंद्र पांडेय ने बजट जारी करने की भी बात कही थी लेकिन कुछ नहीं हुआ।
मेडिकल कॉलेज में होती है डेंगू की जांच
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में डेंगू की जांच होती है। सरकारी अस्पतालों से भेजे जाने वाले सैंपल की जांच फ्री और प्राइवेट अस्पतालों से भेजे जाने वाले सैंपल की जांच के लिए दो सौ रुपये जमा कराए जाते हैं लेकिन कमीशन के चक्कर में ज्यादातर डॉक्टर प्राइवेट पैथोलॉजी में डेंगू की जांच करा रहे हैं। इसका रेट 15 सौ से दो हजार रुपये तक है। पुष्टि होने के बाद वह जांच के लिए ब्लड फिर मेडिकल कॉलेज ही भेज रहे हैं। इससे मरीजों को दो बार रुपये देने पड़ रहे हैं।