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यूपी: आरटीआई का जवाब न देने वाले 17 हजार अफसरों पर जुर्माना, 800 अधिकारियों से ही हुई वसूली
Wed, 11 Aug 2021 11:54 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, कानपुर
अमर उजाला नेटवर्क, कानपुर
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 11 Aug 2021 11:54 PM IST
सार
राज्य सूचना आयुक्त सुभाष चंद्र सिंह ने इसे प्रशासनिक सिस्टम की खामी बताया। साथ ही उन्होंने आरटीआई के तहत निजी हित के बजाय लोकहित के सवाल पूछने पर जोर दिया।
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फाइल फोटो
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विस्तार
कानपुर नगर सहित सूबे के अन्य जिलों में आरटीआई (सूचना का अधिकार) का जवाब न देने वाले 17000 अफसरों पर आर्थिक दंड लगाया गया। हालांकि वसूली 800 अधिकारियों से ही हो पाई। 2006 से अब तक की लंबित आरटीआई पर यह कार्रवाई की गई।
राज्य सूचना आयुक्त सुभाष चंद्र सिंह ने इसे प्रशासनिक सिस्टम की खामी बताया। साथ ही उन्होंने आरटीआई के तहत निजी हित के बजाय लोकहित के सवाल पूछने पर जोर दिया। शिवसहाय मिश्र ने व्यापक हित में नानाराव पार्क, परशुराम वाटिका, बृजेंद्र स्वरूप पार्क के बार में जानकारी चाही।
नगर निगम में आरटीआई के तहत लंबित मामलों की सुनवाई के तीसरे दिन राज्य सूचना आयुक्त ने पत्रकारों को बताया कि सूचना साक्ष्य हैं, इन्हें न्यायालय सहित कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है। आरटीआई के जवाब में यह नहीं लिखना चाहिए कि सूचना का इस्तेमाल न्यायालय में साक्ष्य के रूप में नहीं कर सकते।
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बताया कि लखनऊ में सुनवाई में वादी आते थे, पर प्रतिवादी कम आते थे या उनके वकील स्पष्ट सूचना नहीं दे पाते थे। सुनवाई के दौरान वादी और प्रतिवादी उपस्थित रहें, इसी उद्देश्य से नगर निगम में विभाग से संबंधित आरटीआई मामलों की सुनवाई की गई। यहां भी वादियों की उपस्थिति निराशाजनक रही। उन्होंने बताया कि अगली सामूहिक सुनवाई केडीए में होगी।
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राज्य सूचना आयुक्त सुभाष चंद्र सिंह ने इसे प्रशासनिक सिस्टम की खामी बताया। साथ ही उन्होंने आरटीआई के तहत निजी हित के बजाय लोकहित के सवाल पूछने पर जोर दिया। शिवसहाय मिश्र ने व्यापक हित में नानाराव पार्क, परशुराम वाटिका, बृजेंद्र स्वरूप पार्क के बार में जानकारी चाही।
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नगर निगम में आरटीआई के तहत लंबित मामलों की सुनवाई के तीसरे दिन राज्य सूचना आयुक्त ने पत्रकारों को बताया कि सूचना साक्ष्य हैं, इन्हें न्यायालय सहित कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है। आरटीआई के जवाब में यह नहीं लिखना चाहिए कि सूचना का इस्तेमाल न्यायालय में साक्ष्य के रूप में नहीं कर सकते।
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बताया कि लखनऊ में सुनवाई में वादी आते थे, पर प्रतिवादी कम आते थे या उनके वकील स्पष्ट सूचना नहीं दे पाते थे। सुनवाई के दौरान वादी और प्रतिवादी उपस्थित रहें, इसी उद्देश्य से नगर निगम में विभाग से संबंधित आरटीआई मामलों की सुनवाई की गई। यहां भी वादियों की उपस्थिति निराशाजनक रही। उन्होंने बताया कि अगली सामूहिक सुनवाई केडीए में होगी।
अनिवार्य रूप से उपस्थित हों सूचनाधिकारी
आरटीआई के लंबित 108 मामलों में 40 प्रतिशत में सूचनाएं दी जा चुकी थीं। इसका साक्ष्य भी था, पर प्रतिवादी ने सूचनाएं देने की जानकारी आयोग में प्रस्तुत नहीं की। राज्य सूचना आयुक्त ने आदेश दिया कि वकील के साथ सूचनाधिकारी या सक्षम प्राधिकारी अनिवार्य रूप से उपस्थित हों।
एक-दो केसों में ही दी जाती है 30 दिन में सूचना
उन्होंने बताया कि आरटीआई के तहत 30 दिन में सूचना देनी चाहिए, पर ऐसा होता नहीं। समय से सूचना न मिलने पर वादी राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील करते हैं। ऐसे में संबंधित जन सूचना अधिकारी पर 25000 रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
कई बार अफसरों के पास काम ज्यादा होने, सूचना संकलित करने, कई विभागों से रिपोर्ट लेने में समय लग जाता है। ऐसी स्थितियों में दंड नहीं लगाते। वादी 30 दिन में सूचना न मिलने पर सूचनाधिकारी के खिलाफ दंड मांग सकते हैं। प्रेसवार्ता में नगर आयुक्त शिवशरणप्पा जीएन सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।
हर महीने आते हैं 300-400 केस
राज्य सूचना आयोग में हर महीने 300-400 केस आते हैं। ढाई साल पहले 5200 केस लंबित थे, अब 3500 लंबित हैं। आरटीआई के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है।
एक-दो केसों में ही दी जाती है 30 दिन में सूचना
उन्होंने बताया कि आरटीआई के तहत 30 दिन में सूचना देनी चाहिए, पर ऐसा होता नहीं। समय से सूचना न मिलने पर वादी राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील करते हैं। ऐसे में संबंधित जन सूचना अधिकारी पर 25000 रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
कई बार अफसरों के पास काम ज्यादा होने, सूचना संकलित करने, कई विभागों से रिपोर्ट लेने में समय लग जाता है। ऐसी स्थितियों में दंड नहीं लगाते। वादी 30 दिन में सूचना न मिलने पर सूचनाधिकारी के खिलाफ दंड मांग सकते हैं। प्रेसवार्ता में नगर आयुक्त शिवशरणप्पा जीएन सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।
हर महीने आते हैं 300-400 केस
राज्य सूचना आयोग में हर महीने 300-400 केस आते हैं। ढाई साल पहले 5200 केस लंबित थे, अब 3500 लंबित हैं। आरटीआई के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है।
मलाईदार विभागों में ज्यादा भ्रष्टाचार
राज्य सूचना आयुक्त के अनुसार जिन्हें मलाईदार विभाग कहा जाता है, उनमें सबसे ज्यादा अपारदर्शिता है। उनका मानना है कि इन्हीं विभागों में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता होगा।
इन मामलों की हुई सुनवाई
तारीख सुने गए मामले निस्तारित लंबित वादी आए
9 अगस्त 34 30 4 18
10 अगस्त 41 31 10 19
11 अगस्त 33 21 12 21
इन मामलों की हुई सुनवाई
तारीख सुने गए मामले निस्तारित लंबित वादी आए
9 अगस्त 34 30 4 18
10 अगस्त 41 31 10 19
11 अगस्त 33 21 12 21