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डॉक्टर्स डे: कोरोना संक्रमण में भी मरीजों की सेवा में जुटे डॉक्टरों को सलाम
Wed, 01 Jul 2020 06:19 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 01 Jul 2020 06:19 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : गूगल
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डॉक्टर को धरती का भगवान यूं ही नहीं कहा जाता, उनका अथक सेवाभाव और त्याग ही उन्हें यह दर्जा दिलाता है। कोरोना संक्रमण काल में जब सभी को घर में रहने की सलाह दी जा रही है, ऐसे में इन डॉक्टरों को जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
कोरोना रोगियों का भी इलाज उसी सेवा और समर्पण भाव से कर रहे हैं। कई-कई दिन अपने घर-परिवार से दूर रहकर रोगियों की जान बचाने में जुटे हैं। कभी-कभी रोगियों को बचाने के चक्कर में वे खुद भी जानलेवा संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। अमर उजाला ऐसे ही कोरोना वॉरियर को डॉक्टर्स डे पर सलाम करता है...
बच्चे पूछते रहे, पापा कब हमसे मिलोगे
हैलट के कोविड अस्पताल और फ्लू ओपीडी के प्रभारी रहे इमरजेंसी मेडिकल अफसर डॉ. विनय कुमार कटियार डेढ़ महीने अपने घर नहीं गए। दिन उनका हैलट इमरजेंसी में कटता और रात मेडिकल कालेज के एक कमरे में। कोई सामान देना होता तो घर के बाहर जाकर किसी बुलाकर सामान दे देते। उनके लौटने के बाद बच्चों पता चलता कि पापा आए थे और दरवाजे से लौट गए। डेढ़ महीने तक बच्चे फोन करके पूछते रहे कि पापा आप हमसे आकर कब मिलोगे।
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कोरोना रोगियों का भी इलाज उसी सेवा और समर्पण भाव से कर रहे हैं। कई-कई दिन अपने घर-परिवार से दूर रहकर रोगियों की जान बचाने में जुटे हैं। कभी-कभी रोगियों को बचाने के चक्कर में वे खुद भी जानलेवा संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। अमर उजाला ऐसे ही कोरोना वॉरियर को डॉक्टर्स डे पर सलाम करता है...
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बच्चे पूछते रहे, पापा कब हमसे मिलोगे
हैलट के कोविड अस्पताल और फ्लू ओपीडी के प्रभारी रहे इमरजेंसी मेडिकल अफसर डॉ. विनय कुमार कटियार डेढ़ महीने अपने घर नहीं गए। दिन उनका हैलट इमरजेंसी में कटता और रात मेडिकल कालेज के एक कमरे में। कोई सामान देना होता तो घर के बाहर जाकर किसी बुलाकर सामान दे देते। उनके लौटने के बाद बच्चों पता चलता कि पापा आए थे और दरवाजे से लौट गए। डेढ़ महीने तक बच्चे फोन करके पूछते रहे कि पापा आप हमसे आकर कब मिलोगे।
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घर का रूटीन उलट गया, बगीचे में नहाते
कोरोना रोगियों का इलाज कर रहे डॉ. मुरारीलाल चेस्ट हॉस्पिटल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अवधेश कुमार का कहना है कि कोरोना काल में घर का रूटीन ही पूरा उलट गया है। इसका असर घर के माहौल पर भी पड़ा है। अस्पताल आने के पहले पानी भरकर बगीचे में रख आता हूं। जब जाते हैं तो पहले बगीचे में खड़े होकर नहाते हैं। पहने हुए कपड़े बाहर रखने पड़ते हैं। इसके साथ ही बच्चों से भी दूर से बात होती है। बच्चे समझदार हैं तो जानते हैं। अस्पताल के बाद घर में भी सोशल डिस्टेंसिंग रहती है।
घर आने पर बच्चों को गले भी नहीं लगा पाती
डफरिन की सीनियर मेडिकल अफसर डॉ. शिवानी सिंह का कहना है कि कोरोना का लाइफ स्टाइल पर फर्क पड़ गया। रोगी भी देखने हैं और खुद को भी बचाना है। जब से कोरोना काल शुरू हुआ है अस्पताल से घर लौटने के बाद अपने बेटियों को सीने से लगा नहीं पाती। घर पीछे वाले दरवाजे से जाते हैं। वहां बाथरूम नजदीक पड़ता है। पहले जाकर नहाते हैं। एक जोड़ा कपड़ा, पीपीई किट, मास्क, सेनिटाइजर अभिन्न अंग हो गए हैं। बेटियों करीब एक-डेढ घंटे के बाद नजदीक आती हैं।
कोरोना रोगियों का इलाज कर रहे डॉ. मुरारीलाल चेस्ट हॉस्पिटल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अवधेश कुमार का कहना है कि कोरोना काल में घर का रूटीन ही पूरा उलट गया है। इसका असर घर के माहौल पर भी पड़ा है। अस्पताल आने के पहले पानी भरकर बगीचे में रख आता हूं। जब जाते हैं तो पहले बगीचे में खड़े होकर नहाते हैं। पहने हुए कपड़े बाहर रखने पड़ते हैं। इसके साथ ही बच्चों से भी दूर से बात होती है। बच्चे समझदार हैं तो जानते हैं। अस्पताल के बाद घर में भी सोशल डिस्टेंसिंग रहती है।
घर आने पर बच्चों को गले भी नहीं लगा पाती
डफरिन की सीनियर मेडिकल अफसर डॉ. शिवानी सिंह का कहना है कि कोरोना का लाइफ स्टाइल पर फर्क पड़ गया। रोगी भी देखने हैं और खुद को भी बचाना है। जब से कोरोना काल शुरू हुआ है अस्पताल से घर लौटने के बाद अपने बेटियों को सीने से लगा नहीं पाती। घर पीछे वाले दरवाजे से जाते हैं। वहां बाथरूम नजदीक पड़ता है। पहले जाकर नहाते हैं। एक जोड़ा कपड़ा, पीपीई किट, मास्क, सेनिटाइजर अभिन्न अंग हो गए हैं। बेटियों करीब एक-डेढ घंटे के बाद नजदीक आती हैं।
दो गज दूरी, मास्क जरूरी
कोरोना काल में डाक्टर और जनता दोनों यह फार्मूला अपनाए। आम आदमी के अलावा डाक्टरों के लिए भी यह वक्त चुनौती भरा है। सब मिलकर इसका मुकाबला करें। डॉक्टर इलाज के साथ लोगों को जागरूक भी करें। सब मिलकर इस स्थिति से निपट सकते हैं। - डॉ. आरबी कमल, प्राचार्य जीएसवीएम मेडिकल क\लेज
रोगियों में जागरुकता पैदा करें डाक्टर
डॉक्टर समाज में अपना अधिकतम योगदान दें। खासतौर पर जरूरतमंद और कमजोरों का अधिक ख्याल रखें, जिससे समाज के अंतिम व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती रहें। यह खास तरह का दौर है। इसमें कोरोना को लेकर लोगों को जागरूक करें, जिससे वे रोगों से बचाव को लेकर सतर्क रहें। - डॉ. एसके कटियार, जोन चेयरमैन, नेशनल क़ॉलेज चेस्ट फिजीशियन इंडिया
कोरोना काल में डाक्टर और जनता दोनों यह फार्मूला अपनाए। आम आदमी के अलावा डाक्टरों के लिए भी यह वक्त चुनौती भरा है। सब मिलकर इसका मुकाबला करें। डॉक्टर इलाज के साथ लोगों को जागरूक भी करें। सब मिलकर इस स्थिति से निपट सकते हैं। - डॉ. आरबी कमल, प्राचार्य जीएसवीएम मेडिकल क\लेज
रोगियों में जागरुकता पैदा करें डाक्टर
डॉक्टर समाज में अपना अधिकतम योगदान दें। खासतौर पर जरूरतमंद और कमजोरों का अधिक ख्याल रखें, जिससे समाज के अंतिम व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती रहें। यह खास तरह का दौर है। इसमें कोरोना को लेकर लोगों को जागरूक करें, जिससे वे रोगों से बचाव को लेकर सतर्क रहें। - डॉ. एसके कटियार, जोन चेयरमैन, नेशनल क़ॉलेज चेस्ट फिजीशियन इंडिया