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कोहरे को चीरेगी रेलवे की डिवाइस

Mon, 04 Jan 2016 01:24 AM IST
मनीष निगम/कानपुर
मनीष निगम/कानपुर Updated Mon, 04 Jan 2016 01:24 AM IST
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Chirag railway fog Device

कोहरे से निपटने और हादसों से बचने के लिए रेलवे ने एक डिवाइस तैयार की है। ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) पर आधारित इस डिवाइस को इंजन में फिट कर दिया जाएगा।

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यह डिवाइस आने वाले सिग्नल के एक किमी पहले ही चालक को अलर्ट कर देगी। खास बात यह है कि  डिवाइस सिग्नल का रंग (लाल, हरा, पीला) भी बताएगी। इससे अब तक कोहरे के कारण सिग्नल न देख पाने वाले ड्राइवर पहले से ही आगाह हो जाएंगे।
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इस डिवाइस को रेलवे के रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड आर्गनाइजेशन (आरडीएसओ) ने फाग विजन प्रोजेक्ट के तहत तैयार किया है। रेलवे अधिकारियों की मानें तो इस सीजन में यह डिवाइस नारदर्न ईस्टर्न रेलवे (एनईआर) से जुड़े लोको के सभी इंजनों में फिट भी की गई है। इसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आ रहे हैं।
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जैसे-जैसे डिवाइस बनकर आती जाएंगी, इंजनों में फिट कर दी जाएंगी। घने कोहरे में ट्रेनों का संचालन मुश्किल होता है। सिग्नल तक नहीं दिखता है, जिससे हादसा होने की आशंका रहती है। इसको देखते हुए ही रेलवे बोर्ड ने 40 ट्रेन के इंजनों में विशेष डिवाइस लगाई है। डिवाइस और सिग्नल को आपस में कनेक्ट किया गया है।

इससे ड्राइवर को पता चलता रहेगा कि अगला सिग्नल कब आएगा। डिवाइस बीप से अलर्ट करेगी कि सिग्नल आने वाला है। इससे ट्रेन की स्पीड को कंट्रोल करके सिग्नल देखा जा सकेगा। पूर्वोत्तर रेलवे के अफसरों का दावा है कि चालकों के लिए फॉग सेव डिवाइस काफी कारगर साबित हो रही है। एक डिवाइस का खर्च करीब 37 हजार रुपये आ रहा है।

पूर्वोत्तर रेलवे, इज्जत नगर मंडल सीपीआरओ संजय यादव कहते हैं- डिवाइस में रूट की मैपिंग की गई है। इसमें रूट के सभी सिग्नल की जानकारी फीड है। सिग्नल के एक किमी पहले ही बजर बजने लगेगा। साथ ही चालकों और गार्डों की भी काउंसलिंग चल रही है। इसमें ट्रैफिक इंस्पेक्टर सेफ्टी उन्हें अन्य सावधानियां के बारे में भी जानकारी दे रहे हैं। कुछ इंजन में यह डिवाइस लगा दी गई है। बोर्ड और आरडीएसओ इसकी निगरानी कर रहे हैं।

पहले भी हो चुका है डिवाइस का प्रयोग

कोहरे से निपटने के लिए वर्ष 2011 में फॉग सेफ डिवाइस का ट्रायल लखनऊ से गोरखपुर के बीच एक्सप्रेस और मालगाड़ी में हुआ था। यह डिवाइस सिग्नल आने के दो किलोमीटर पहले ही चालक को अलर्ट कर देती थी और सिग्नल से 500 मीटर पहले यह सिग्नल नंबर भी बताती थी।


खामी यह थी कि डिवाइस सिग्नल का रंग बताने में असमर्थ थी। इस वजह से इस डिवाइस को प्रयोग में नहीं लाया गया और तभी से रंग भी बता पाने वाली डिवाइस पर काम चल रहा था।



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