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हमें मुआवजा दे दो हम कहीं और चले जाएंगे
डिजिटल टीम/अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 13 Sep 2016 03:19 PM IST
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कानपुर में डाइंग इंडस्ट्री के उद्यमियों की हालत इतनी पतली हो चुकी है कि ज्यादातर उद्यमी शहर छोड़ने को मजबूर है। इन्हें इंतजार है तो बस इस बात का कि शहर छोड़ कर जाने के बदले उन्हें सरकार की ओर से मुआवजा मिल जाए। दरअसल, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का कहर डाइंग इंडस्ट्री पर कहर बनकर टूटा है।
फिलहाल, उद्यमी 14 सितंबर को लखनऊ में शासन के साथ बैठक में इस मुद्दे को उठाने की तैयारी में जुट गए हैं। इसमें उद्यमी यह बात रखेंगे कि उन्हें, मुआवजा दे दिया जाए जिससे वे लोग यहां से कहीं और जाकर अपना दूसरा काम फिर से शुरू कर सकें।
ज्ञात हो पिछले दिनों डाइंग की 21 इंडस्ट्री को बंद करने का नोटिस सीपीसीबी से जारी किया था। जानकारी मिली है कि आगे भी कुछ और इंडस्ट्री को ऐसे ही नोटिस भेजे जाने वाले हैं।
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वहीं कंपनी बंद होने की बात से परेशान उद्यमी सिस्टम के साथ आर-पार के मूड में हैं।
गौरतलब हो महानगर में डाइंग इंडस्ट्री की संख्या करीब 80 है। इन उद्यमियों का कहना है कि वे लोग लघु और मध्यम उद्योगों के अंतर्गत आते हैं। ऐसे में पहले उन्हें रेड जोन में डाला गया, अब लगातार ऑनलाइन मानीटरिंग और जेडएलडी (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज) के दायरे में लाने की बात कही जा रही है।
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फिलहाल, उद्यमी 14 सितंबर को लखनऊ में शासन के साथ बैठक में इस मुद्दे को उठाने की तैयारी में जुट गए हैं। इसमें उद्यमी यह बात रखेंगे कि उन्हें, मुआवजा दे दिया जाए जिससे वे लोग यहां से कहीं और जाकर अपना दूसरा काम फिर से शुरू कर सकें।
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ज्ञात हो पिछले दिनों डाइंग की 21 इंडस्ट्री को बंद करने का नोटिस सीपीसीबी से जारी किया था। जानकारी मिली है कि आगे भी कुछ और इंडस्ट्री को ऐसे ही नोटिस भेजे जाने वाले हैं।
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वहीं कंपनी बंद होने की बात से परेशान उद्यमी सिस्टम के साथ आर-पार के मूड में हैं।
गौरतलब हो महानगर में डाइंग इंडस्ट्री की संख्या करीब 80 है। इन उद्यमियों का कहना है कि वे लोग लघु और मध्यम उद्योगों के अंतर्गत आते हैं। ऐसे में पहले उन्हें रेड जोन में डाला गया, अब लगातार ऑनलाइन मानीटरिंग और जेडएलडी (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज) के दायरे में लाने की बात कही जा रही है।
एनजीटी की रिपोर्ट का हवाला देकर डाइंग इंडस्ट्री ने उठाया सीपीसीबी की कार्रवाई पर सवाल
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- फोटो : google
इंडस्ट्री संचालकों का कहना है कि एनजीटी की रिपोर्ट में साफ है कि इस तरह के प्रावधान बड़े उद्योगों में किए जाने चाहिए। इसके बावजूद सीपीसीबी उन लोगों पर दबाव बना रहा है। यूपी डायर्स एंड ब्लीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज बंका का कहना है कि छोटे उद्योगों को इस श्रेणी से अलग किया गया है, यह बात कई बार एनजीटी के सामने भी रखी गई है।
चमड़ा कारोबारियों ने किया डाइंग इंडस्ट्री का समर्थन
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- फोटो : google
इसके बावजूद उन लोगों पर यह दबाव बनाया गया है, इसी वजह से उन्होंने इस फैसले पर आना पड़ा। वहीं चमड़ा कारोबारी डाइंग इंडस्ट्री के समर्थन में आ गए हैं। उन्होंने डाइंग इडस्ट्री की डिमांड को जायज ठहराया है।