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बैंकों ने खोल दिया खजाना: श्री लक्ष्मी कॉटसिन ने रेवाड़ी में लगाई थी एक हजार करोड़ की यूनिट, अब डूबी रकम

Sun, 08 Aug 2021 03:09 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Sun, 08 Aug 2021 03:09 PM IST
सार

प्रतिरक्षा उत्पाद के क्षेत्र में यह उस समय का बड़ा और जोखिम भरा निवेश था। इसमें बैंकों ने खासी रुचि दिखाई थी। इसके अलावा प्लांट में ब्लैक ऑफ फैब्रिक्स के बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की योजना बनी थी।

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Banks opened treasury: Shri Lakshmi Cotsyn had installed one thousand crore units in Rewari
श्री लक्ष्मी कॉटसिन का मालिक एमपी अग्रवाल - फोटो : amar ujala

विस्तार

श्री लक्ष्मी कॉटसिन पर बैंकों ने आंख मूंदकर भरोसा किया और अरबों रुपये का कर्ज दे डाला। कंपनी ने रेवाड़ी (फतेहपुर) में एक हजार करोड़ रुपये खर्च करके टेक्निकल टेक्सटाइल यूनिट लगाई थी। इसमें बैंकों ने सात सौ करोड़ का लोन दिया था।
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इसके अलावा तीन सौ करोड़ का इक्विटी के जरिये निवेश लाया गया था, लेकिन उम्मीद के मुताबिक आर्डर न मिलने पर प्रोजेक्ट फेल हो गया और बैंकों के अरबों रुपये डूब गए। इसके बाद भी बैंकों ने पांच सौ करोड़ के लोन का प्रस्ताव दिया था। 
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सूत्रों के अनुसार इस यूनिट में केमिकल वार की स्थिति में एबीसी फैब्रिक्स सूट तैयार किए जाने थे। प्रतिरक्षा उत्पाद के क्षेत्र में यह उस समय का बड़ा और जोखिम भरा निवेश था। इसमें बैंकों ने खासी रुचि दिखाई थी। इसके अलावा प्लांट में ब्लैक ऑफ फैब्रिक्स के बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की योजना बनी थी। इस तरह के फैब्रिक्स चीन से ही आते थे। उस समय का यह पहला प्लांट था, जहां पर इस तरह का फैब्रिक्स तैयार होता था, लेकिन इसके लिए आर्डर ही नहीं मिले।
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2005-06 से शुरू हुआ बैंक से लोन लेने का सिलसिला
कंपनी ने मलवां में डेनिम की यूनिट लगाने के लिए बैंकों से चार सौ करोड़ का लोन 2005-06 में लिया था। यहां पर बेड सीट, टॉवेल, पैंट का बेलबॉटम तैयार होता था। इसके बाद कंपनी ने 378 करोड़ का लोन लेकर मलवां के पास ही 15000 टॉवेल उत्पादन करने के लिए यूनिट लगाई। रुड़की में 50 करोड़ का लोन लेकर गारमेंट यूनिट लगाई। मलवां में ही 135 करोड़ के लोन से स्पनिंग (धागा) की यूनिट लगाई गई। 

हर दिन लगने लगा एक करोड़ का ब्याज
कंपनी ने बैंकों से अरबों रुपये के लोन लिए थे। अक्तूबर-नवंबर 2012 में कंपनी पर प्रतिदिन एक करोड़ का ब्याज लगने लगा। इसे देने में कंपनी ने असमर्थता जता दी। इसके बाद से इनके खाते एनपीए होने शुरू हो गए। 2013 से बैंकों ने लोन देना भी बंद कर दिया।
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