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धोखाधड़ी: श्री लक्ष्मी कॉटसिन ने लगाई थी टेक्निकल टेक्सटाइल यूनिट, बैंकों ने जरूरत से ज्यादा दी थी रकम, अब डूबी
Sun, 08 Aug 2021 12:30 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sun, 08 Aug 2021 12:30 AM IST
सार
कंपनी ने मलवां में डेनिम की यूनिट लगाने के लिए बैंकों से चार सौ करोड़ का लोन 2005-06 में लिया था। यहां पर बेड सीट, टॉवेल, पैंट का बेलबॉटम तैयार होता था।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
श्री लक्ष्मी कॉटसिन पर बैंकों ने आंख मूंदकर भरोसा किया और अरबों रुपये का कर्ज दे डाला। कंपनी ने रेवाड़ी (फतेहपुर) में एक हजार करोड़ रुपये खर्च करके टेक्निकल टेक्सटाइल यूनिट लगाई थी। इसमें बैंकों ने सात सौ करोड़ का लोन दिया था।
इसके अलावा तीन सौ करोड़ का इक्विटी के जरिये निवेश लाया गया था, लेकिन उम्मीद के मुताबिक आर्डर न मिलने पर प्रोजेक्ट फेल हो गया और बैंकों के अरबों रुपये डूब गए। इसके बाद भी बैंकों ने पांच सौ करोड़ के लोन का प्रस्ताव दिया था। सूत्रों के अनुसार इस यूनिट में केमिकल वार की स्थिति में एबीसी फैब्रिक्स सूट तैयार किए जाने थे।
प्रतिरक्षा उत्पाद के क्षेत्र में यह उस समय का बड़ा और जोखिम भरा निवेश था। इसमें बैंकों ने खासी रुचि दिखाई थी। इसके अलावा प्लांट में ब्लैक ऑफ फैब्रिक्स के बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की योजना बनी थी। इस तरह के फैब्रिक्स चीन से ही आते थे। उस समय का यह पहला प्लांट था, जहां पर इस तरह का फैब्रिक्स तैयार होता था, लेकिन इसके लिए आर्डर ही नहीं मिले।
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इसके अलावा तीन सौ करोड़ का इक्विटी के जरिये निवेश लाया गया था, लेकिन उम्मीद के मुताबिक आर्डर न मिलने पर प्रोजेक्ट फेल हो गया और बैंकों के अरबों रुपये डूब गए। इसके बाद भी बैंकों ने पांच सौ करोड़ के लोन का प्रस्ताव दिया था। सूत्रों के अनुसार इस यूनिट में केमिकल वार की स्थिति में एबीसी फैब्रिक्स सूट तैयार किए जाने थे।
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प्रतिरक्षा उत्पाद के क्षेत्र में यह उस समय का बड़ा और जोखिम भरा निवेश था। इसमें बैंकों ने खासी रुचि दिखाई थी। इसके अलावा प्लांट में ब्लैक ऑफ फैब्रिक्स के बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की योजना बनी थी। इस तरह के फैब्रिक्स चीन से ही आते थे। उस समय का यह पहला प्लांट था, जहां पर इस तरह का फैब्रिक्स तैयार होता था, लेकिन इसके लिए आर्डर ही नहीं मिले।
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2005-06 से शुरू हुआ बैंक से लोन लेने का सिलसिला
कंपनी ने मलवां में डेनिम की यूनिट लगाने के लिए बैंकों से चार सौ करोड़ का लोन 2005-06 में लिया था। यहां पर बेड सीट, टॉवेल, पैंट का बेलबॉटम तैयार होता था। इसके बाद कंपनी ने 378 करोड़ का लोन लेकर मलवां के पास ही 15000 टॉवेल उत्पादन करने के लिए यूनिट लगाई। रुड़की में 50 करोड़ का लोन लेकर गारमेंट यूनिट लगाई। मलवां में ही 135 करोड़ के लोन से स्पनिंग (धागा) की यूनिट लगाई गई।
हर दिन लगने लगा एक करोड़ का ब्याज
कंपनी ने बैंकों से अरबों रुपये के लोन लिए थे। अक्तूबर-नवंबर 2012 में कंपनी पर प्रतिदिन एक करोड़ का ब्याज लगने लगा। इसे देने में कंपनी ने असमर्थता जता दी। इसके बाद से इनके खाते एनपीए होने शुरू हो गए। 2013 से बैंकों ने लोन देना भी बंद कर दिया।
कंपनी ने मलवां में डेनिम की यूनिट लगाने के लिए बैंकों से चार सौ करोड़ का लोन 2005-06 में लिया था। यहां पर बेड सीट, टॉवेल, पैंट का बेलबॉटम तैयार होता था। इसके बाद कंपनी ने 378 करोड़ का लोन लेकर मलवां के पास ही 15000 टॉवेल उत्पादन करने के लिए यूनिट लगाई। रुड़की में 50 करोड़ का लोन लेकर गारमेंट यूनिट लगाई। मलवां में ही 135 करोड़ के लोन से स्पनिंग (धागा) की यूनिट लगाई गई।
हर दिन लगने लगा एक करोड़ का ब्याज
कंपनी ने बैंकों से अरबों रुपये के लोन लिए थे। अक्तूबर-नवंबर 2012 में कंपनी पर प्रतिदिन एक करोड़ का ब्याज लगने लगा। इसे देने में कंपनी ने असमर्थता जता दी। इसके बाद से इनके खाते एनपीए होने शुरू हो गए। 2013 से बैंकों ने लोन देना भी बंद कर दिया।