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UP: ऐसे लोग पिशाच... मौत की सजा ही होनी चाहिए थी; अधिवक्ता बोले- नृशंस तरीके से हुई थी मासूम की हत्या

Sun, 17 Dec 2023 09:48 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, कानपुर देहात
अमर उजाला नेटवर्क, कानपुर देहात Published by: शाहरुख खान Updated Sun, 17 Dec 2023 09:48 AM IST
सार

कानपुर देहात के घाटमपुर में संतान की चाहत में मासूम की हत्या कर कलेजा खाने वाले दंपती समेत चार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। 14 नवंबर 2020 को दीपावली की रात वारदात को अंजाम दिया गया था। दिवाली की रात पटाखों के शोर में बच्ची की चीखें दब गईं थीं।

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Advocate says Death penalty should have been there Innocent was killed in a brutal manner in kanpur dehat
kanpur dehat news - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कानपुर देहात के घाटमपुर क्षेत्र में हुई मासूम की हत्या के मामले में अदालत का फैसला आने से पहले ही कचहरी के अधिवक्ताओं में दोषियों की सजा पर चर्चा होती रही। जैसे ही मामले में अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, तो कुछ अधिवक्ताओं ने अदालत के फैसले का स्वागत किया तो कुछ ने फांसी की सजा न होने पर अफसोस जताया। उनका कहना था कि ऐसे लोग मानव के रूप में पिशाच हैं। इन्हें केवल फांसी की सजा ही होनी चाहिए।
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मृत्युदंड ही होना चाहिए था
कचहरी के वरिष्ठ अधिवक्ता जीतेंद्र प्रताप सिंह चौहान ने कहा कि औलाद पाने के लिए किसी दूसरे की औलाद को नृशंस तरीके से मारकर उसके अंगों को निकालकर खाना मानव सभ्यता के विपरीत है। ऐसे लोग मानव के रूप में पिशाच हैं, ऐसे अपराध में दोषियों को सिर्फ मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, इससे पीड़ित परिवार को न्याय मिला है।
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मामले में पहले आना चाहिए था फैसला
अधिवक्ता सरोज दीक्षित ने कहा कि मासूमों के साथ घटित मामलों में अदालत को दिन प्रतिदिन सुनवाई करते हुए जल्द अपना फैसला देना चाहिए। इस मामले में तीन साल बाद फैसला आया है। पीड़ित परिवार को न्याय के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा है। मासूम के साथ हुई घटना के दोषियों को सिर्फ फांसी होनी चाहिए थी।
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मृत्युदंड देने से समाज में जाता संदेश
अधिवक्ता पवनेश कुमार शुक्ला ने कहा कि अदालत अगर मामले में दोषियों को उम्रकैद के स्थान पर मृत्यु दंड की सजा सुनाती तो समाज में ऐसे अपराध करने वालों को एक संदेश जाता। साथ ही ऐसे अपराध करने का कोई दुस्साहस नहीं करता।

नृशंस तरीके से हुई मासूम की हत्या
अधिवक्ता महेश यादव ने कहा कि अदालत से दोषियों को उम्रकैद की सजा से पीड़ित परिवार को संतुष्टि मिली होगी, लेकिन अगर अदालत दोषियों को फांसी की सजा सुना देती तो उन्हें खुशी होती साथ ही ऐसे अपराधियों के लिए सबक मिलता।

संतान की चाहत में मासूम की हत्या कर कलेजा खाने वाले दंपती समेत चार को उम्रकैद
बता दें कि कानपुर देहात के घाटमपुर के एक गांव में 14 नवंबर 2020 को दीपावली की रात सात साल की मासूम बच्ची की हत्या कर उसका कलेजा खाने के मामले में चार दोषियों को सजा सुना दी गई है। तीन साल तक चली सुनवाई के बाद शनिवार को अपर जिला जज 13 पॉक्सो एक्ट की अदालत ने आरोपी दंपती परशुराम व सुनैना को आजीवन कारावास और 20-20 हजार अर्थदंड की सजा सुनाई है।

वहीं दंपती के भतीजे अंकुल और उसके साथी वीरेन को पूरे जीवनकाल का कारावास और 45-45 हजार अर्थदंड का लगाया है। सहायक शासकीय अधिवक्ता राम रक्षित शर्मा, प्रदीप पांडेय प्रथम व अजय कुमार त्रिपाठी ने बताया कि एक गांव निवासी एक व्यक्ति ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें बताया था कि उसकी सात वर्षीय पुत्री 14 नवंबर 2020 को घर के बाहर खेलते समय गायब हो गई थी।

अगले दिन उसका क्षत-विक्षत शव गांव के बाहर खेत में मिला था। पुलिस ने पिता की तहरीर पर गांव के अंकुल, वंशलाल, कमलराम, बाबूराम और सुरेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू की थी। विवेचना के दौरान पुलिस को पता चला था कि संतान की चाहत में एक तांत्रिक के कहने पर दंपती परशुराम व सुनैना ने बच्ची का कलेजा खाया था।

 

मासूम की हत्या के मामले में शनिवार दोपहर 12 बजे से सुनवाई शुरू हुई। डेढ़ घंटे दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की एडीजे-13 बकार शमीम रिजवी ने दलील सुनी। इस समय तक दोषियों के चेहरे पर किए का पछतावा नहीं था। दोपहर साढ़े तीन बजे जैसे ही फैसला सुनाया गया, तो सुनैना, परशुराम, अंकुल व उसका साथी वीरेन फफक कर रोने लगे। वहीं मृतका की मां व पिता ने कहा कि दरिंदों को फांसी पर लटकाते तो कलेजे को ठंडक मिलती। कहा कि जिस तरह उनकी बेटी की साथ दरिंदगी की गई, एसके लिए फांसी से कम सजा नहीं होनी चाहिए।
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