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डॉक्टरों ने दुत्कारा, 21 घंटे तड़पी फौजी की मां
Kanpur
Updated Thu, 05 Jun 2014 05:31 AM IST
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कानपुर। हैलट अस्पताल में तमाम घटनाओं के बाद भी डॉक्टरों का रवैया सुधरता नहीं दिखता। डॉक्टरों की इसी दुत्कार का नतीजा रहा कि एक फौजी की मां बिना इलाज के 21 घंटे तड़पती रही। हैलट के जूनियर डॉक्टर मरीज को इस विभाग से उस विभाग दौड़ाते रहे और फिर एसजीपीजीआई लखनऊ रिफर कर दिया। डॉक्टरों ने रिफरेंस स्लिप भी नहीं दी। इसलिए एसजीपीजीआई से भी मरीज को लौटा दिया गया। बुधवार को फौजी अपनी मां को फिर हैलट तो उन्हें तपती धूप में वैन में लिटाए रखना पड़ा। इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर (ईएमओ) से शिकायत करने पर महिला को भर्ती किया गया।
कानपुर देहात के ग्राम गुबार (राजपुर पुखरायां) निवासी अनिल यादव की मां ननखी (40) को काफी समय से पीठ में ट्यूमर है। उनका इलाज चल रहा था। एक हफ्ते पहले उनके हाथ में सूजन के साथ पस पड़ गया। हाथ और पैर हिलाना-डुलाना भी मुश्किल हो गया। बकौल अनिल, वह आर्मी में है। पंजाब मेें तैनात है। मां की हालत का पता चलने पर वह उन्हें इलाज के लिए मंगलवार शाम चार बजे हैलट अस्पताल लेकर आया। हैलट इमरजेंसी में पहले ननखी को आर्थो विभाग में ले जाने को कहा गया, वहां से उन्हें सर्जरी विभाग में भेज दिया गया। सर्जरी विभाग के डाक्टरों ने मेडिसिन विभाग में और मेडिसिन वालों ने उसे फिर से आर्थो विभाग भेज दिया। इसके बाद सर्जरी विभाग के जूनियर डाक्टरों ने ननखी की हालत गंभीर बताते हुए एसजीपीजीआई, लखनऊ ले जाने के लिए कहा। परिजन उन्हें लेकर एसजीपीजीआई पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने भर्ती करने से पहले हैलट का रिफर लेटर (रिफरेंस स्लिप) मांगी, लेकिन यहां के जूनियर डॉक्टरों ने यह दिया ही नहीं। इससे एसजीपीजीआई में मरीज को भर्ती नहीं किया गया। ऐसे में परेशान होकर सुबह पांच बजे फिर से तीमारदार मरीज को लेकर हैलट इमरजेंसी आ गए। अनिल समेत अन्य परिजन जूनियर डॉक्टरों से लगातार ननखी को भर्ती करने के लिए गुहार लगाते रहे। अनिल का आरोप है कि जूनियर डॉक्टरों ने ननखी को भर्ती करने के बजाय दो टूक कहा कि यहां इलाज नहीं हो पाएगा। उन्हें घर ले जाओ।
अनिल के मुताबिक इसके बाद ओपीडी में बनवाकर उसने मां को आर्थोपेडिक सर्जन डॉ अजय भारती को दिखाया। उन्होंने कई जांचें लिखीं। मरीज की जांचें करा ली गईं। इसके बाद भी भर्ती न करने की वजह से इमरजेंसी के बाहर तपती धूप में तीमारदार ननखी को वैन में लेकर पड़े रहे। दोपहर एक बजे इसकी जानकारी ईएमओ डॉ. विनय को दी र्गई। तब उन्होंने डाक्टरों से कहकर मरीज को भर्ती कराया। ईएमओ ने बताया कि उन्हें मरीज को भगाए जाने की जानकारी नहीं थी। जैसे ही पता चला मरीज को भर्ती कराकर इलाज शुरू करा दिया गया।
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---डॉक्टरों का ‘हम नहीं सुधरेंगे’ वाला रवैया--(पीडीएफ है)
-13 मई---हैलट के वार्ड नंबर 100 में समय पर दवा नहीं देने पर हमीरपुर की रानी (53) की मौत हो गई। गुस्साए परिजनों ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए डेढ़ घंटे हंगामा किया। इसी दौरान इसी वार्ड की दो अन्य महिला मरीजों की हालत खराब हो गई। एक तीमारदार बेहोश हो गया। पुलिस ने तीमारदारों को समझाकर शांत किया।
14 र्मई-बीघापुर के कमलेंद्र के 8 वर्षीय भतीजे का सिर फट गया था। घंटों इंतजार के बाद भी इलाज न मिला तो सीएमएस डॉ. एसबी मिश्रा से 20 मिनट तक हाथ जोड़कर मिन्नतें करते रहे। लेकिन उन्होंने यह कहकर चलता कर दिया कि डॉक्टर आएगा तो इलाज मिल जाएगा। इसी दिन हैलट इमरजेंसी में 50 वर्षीय ऊषा को डॉक्टरों ने घर ले जाने को कहकर बाहर कर दिया। मरीज के बुजुर्ग तीमारदार स्ट्रेचर खोजते रहे, लेकिन नहीं मिला। ऊषा के तीमारदार ने सीएमएस से मिलने की कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाया।
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कानपुर देहात के ग्राम गुबार (राजपुर पुखरायां) निवासी अनिल यादव की मां ननखी (40) को काफी समय से पीठ में ट्यूमर है। उनका इलाज चल रहा था। एक हफ्ते पहले उनके हाथ में सूजन के साथ पस पड़ गया। हाथ और पैर हिलाना-डुलाना भी मुश्किल हो गया। बकौल अनिल, वह आर्मी में है। पंजाब मेें तैनात है। मां की हालत का पता चलने पर वह उन्हें इलाज के लिए मंगलवार शाम चार बजे हैलट अस्पताल लेकर आया। हैलट इमरजेंसी में पहले ननखी को आर्थो विभाग में ले जाने को कहा गया, वहां से उन्हें सर्जरी विभाग में भेज दिया गया। सर्जरी विभाग के डाक्टरों ने मेडिसिन विभाग में और मेडिसिन वालों ने उसे फिर से आर्थो विभाग भेज दिया। इसके बाद सर्जरी विभाग के जूनियर डाक्टरों ने ननखी की हालत गंभीर बताते हुए एसजीपीजीआई, लखनऊ ले जाने के लिए कहा। परिजन उन्हें लेकर एसजीपीजीआई पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने भर्ती करने से पहले हैलट का रिफर लेटर (रिफरेंस स्लिप) मांगी, लेकिन यहां के जूनियर डॉक्टरों ने यह दिया ही नहीं। इससे एसजीपीजीआई में मरीज को भर्ती नहीं किया गया। ऐसे में परेशान होकर सुबह पांच बजे फिर से तीमारदार मरीज को लेकर हैलट इमरजेंसी आ गए। अनिल समेत अन्य परिजन जूनियर डॉक्टरों से लगातार ननखी को भर्ती करने के लिए गुहार लगाते रहे। अनिल का आरोप है कि जूनियर डॉक्टरों ने ननखी को भर्ती करने के बजाय दो टूक कहा कि यहां इलाज नहीं हो पाएगा। उन्हें घर ले जाओ।
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अनिल के मुताबिक इसके बाद ओपीडी में बनवाकर उसने मां को आर्थोपेडिक सर्जन डॉ अजय भारती को दिखाया। उन्होंने कई जांचें लिखीं। मरीज की जांचें करा ली गईं। इसके बाद भी भर्ती न करने की वजह से इमरजेंसी के बाहर तपती धूप में तीमारदार ननखी को वैन में लेकर पड़े रहे। दोपहर एक बजे इसकी जानकारी ईएमओ डॉ. विनय को दी र्गई। तब उन्होंने डाक्टरों से कहकर मरीज को भर्ती कराया। ईएमओ ने बताया कि उन्हें मरीज को भगाए जाने की जानकारी नहीं थी। जैसे ही पता चला मरीज को भर्ती कराकर इलाज शुरू करा दिया गया।
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---डॉक्टरों का ‘हम नहीं सुधरेंगे’ वाला रवैया--(पीडीएफ है)
-13 मई---हैलट के वार्ड नंबर 100 में समय पर दवा नहीं देने पर हमीरपुर की रानी (53) की मौत हो गई। गुस्साए परिजनों ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए डेढ़ घंटे हंगामा किया। इसी दौरान इसी वार्ड की दो अन्य महिला मरीजों की हालत खराब हो गई। एक तीमारदार बेहोश हो गया। पुलिस ने तीमारदारों को समझाकर शांत किया।
14 र्मई-बीघापुर के कमलेंद्र के 8 वर्षीय भतीजे का सिर फट गया था। घंटों इंतजार के बाद भी इलाज न मिला तो सीएमएस डॉ. एसबी मिश्रा से 20 मिनट तक हाथ जोड़कर मिन्नतें करते रहे। लेकिन उन्होंने यह कहकर चलता कर दिया कि डॉक्टर आएगा तो इलाज मिल जाएगा। इसी दिन हैलट इमरजेंसी में 50 वर्षीय ऊषा को डॉक्टरों ने घर ले जाने को कहकर बाहर कर दिया। मरीज के बुजुर्ग तीमारदार स्ट्रेचर खोजते रहे, लेकिन नहीं मिला। ऊषा के तीमारदार ने सीएमएस से मिलने की कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाया।