6G की तैयारी: एआई और मशीन लर्निंग से युक्त होगा 6जी नेटवर्क, आईआईटी को मिली जिम्मेदारी
5G के बाद अब 6G की तैयारी शुरू हो गई है, जिस पर शोध शुरू हो गया है। इससे कम्युनिकेशन संबंधी समस्याएं नहीं होंगी। इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से गठित टास्क फोर्स में आईआईटी कानपुर के निदेशक भी शामिल हैं।
विस्तार
5जी की सफलता के बाद आईआईटी कानपुर के कंधों पर अब 6जी की जिम्मेदारी आ गई है। पूरी दुनिया की तरह 6जी को लेकर देश में भी शोध शुरू हो गया है। 6जी नेटवर्क आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) व मशीन लर्निंग तकनीक से युक्त होगा। इससे कम्युनिकेशन संबंधी समस्याएं नहीं होंगी। अभी 5जी नेटवर्क की फ्रीक्वेंसी में दिक्कत आने पर मैनुअल बदलाव करना पड़ता है। एआई और मशीन लर्निंग से ये दिक्कतें ऑटोमैटिक दूर सकेंगी।
केंद्र सरकार के निर्देश पर 6जी नेटवर्क पर शोध के लिए टास्क फोर्स का गठन किया गया है। इसमें आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर, आईआईटी मद्रास, बांबे और हैदराबाद के निदेशक, आईआईएससी, बेंगलूरू के निदेशक के अलावा 4जी बनाने वाली कंपनी तेजस के वैज्ञानिक हैं। आईआईटी कानपुर ने 5जी में बेसबैंड यूनिट विकसित की थी।
यह यूनिट मोबाइल टॉवर के निचले हिस्से में लगती है। इसका काम सिग्नल को डाटा के रूप में बदलने का होता है। यह यूनिट जितना बेहतर काम करती है, नेटवर्क की स्पीड और क्वालिटी उतना बेहतर होती है। आईआईटी के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर ने बताया कि 6जी पर रिसर्च शुरू हो गई है। रिसर्च पूरी होने में पांच साल का समय लगेगा। तब तक मोबाइल की दुनिया में 5जी और 5जी+ तकनीक के नेटवर्क कार्य करेंगे।
6जी से ये होंगे फायदे
- 6जी नेटवर्क स्थिति को देखते हुए खुद ही फ्रीक्वेंसी को कंट्रोल कर लेगा।
- 5जी नेटवर्क में आ रहीं सभी समस्याओं को 6जी नेटवर्क में दूर किया जाएगा।
- डाउनलोडिंग स्पीड काफी तेज हो जाएगी।
- ऑनलाइन वीडियो चलाने में बफरिंग नहीं होगी।
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस
एआई की मदद से एक मशीन इंसानी मदद या अनुभव के बिना ही कंप्यूटर में मौजूद डाटा की मदद से किसी समस्या का समाधान कर सकती है। स्मार्टफोन के मैप या सोशल मीडिया में फोटो टैगिंग में एआई का प्रयोग होता है। इसकी मदद से मैप आपको जाम, खराब रोड की जानकारी देता है, तो फोटो टैगिंग में सोशल मीडिया में मौजूद सभी लोगों में आपके दोस्त की पहचान हो जाती है।
मशीन लर्निंग
मशीन लर्निंग कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की एक ऐसी तकनीक है, जिसमें किसी कंप्यूटर प्रोग्राम को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि वह प्रोग्राम खुद से नई नई चीजों को सीख सके। साथ ही जरूरत पड़ने पर खुद कोई निर्णय ले सके। इसके प्रयोग से मल्टी वैरियंट डाटा को आसानी से हैंडल किया जा सकता है।