{"_id":"5761b5f74f1c1bae4711b79d","slug":"23-lakh-crore-in-the-ground","type":"story","status":"publish","title_hn":"दो करोड़ की जमीन 23 लाख में ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दो करोड़ की जमीन 23 लाख में
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Thu, 16 Jun 2016 01:39 AM IST
विज्ञापन
फ्लैट
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाहाबाद/कानपुर (ब्यूरो)। कानपुर के सदर इलाके में दो करोड़ रुपये का पट्टा 23 लाख रुपये में करने के मामले में हाईकोर्ट ने पट्टा निष्पादन पर रोक लगाते हुए मौके पर यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने केडीए से इस मामले पर जवाब भी मांगा है। पट्टा बृजरानी मेमोरियल सोसाइटी को 90 साल के लिए दिया गया है। कोर्ट ने सोसाइटी को सचिव नितिन उत्तम के मार्फत नोटिस जारी किया है। नितिन उत्तम एमएलसी और सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश चंद्र उत्तम के बेटे हैं।
विवेकशील शुक्ल की याचिका पर न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल और न्यायमूर्ति कृष्णमुरारी की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। याची का कहना है कि विवादित भूमि तत्कालीन जमींदार ने 1942 में उसके पिता को पट्टे पर दी थी, तब से वह भूमि पर काबिज है। पिता की मृत्यु के बाद याची का नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज हो गया। 2006 में एसडीएम ने भूमि को ग्राम सभा की बताते हुए प्राधिकरण में शामिल कर लिया और उसे नोटिस दिए बिना एकपक्षीय रूप से राजस्व अभिलेख से उसका नाम हटा दिया। इस आदेश के खिलाफ राजस्व परिषद में पुनर्निरीक्षण दाखिल किया गया। परिषद ने यथास्थिति का आदेश दिया। इसके बावजूद प्राधिकरण ने दो करोड़ रुपये मूल्य की भूमि एमएलसी नरेश चंद्र उत्तम के बेटे की सोसाइटी को 90 साल के पट्टे पर दे दी। कोर्ट ने कहा कि जब भूमि गांव सभा की नहीं थी तो प्राधिकरण में कैसे निहित हो गई। मौके पर यथास्थिति कायम रखते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। इस संबंध में केडीए के अपर सचिव पीके सिंह ने कहा कि अभी कोर्ट के आदेश की प्रति नहीं मिली है। फैसले का अध्ययन करने के बाद कोर्ट के आदेशानुसार कार्रवाई की जाएगी।
विज्ञापन
विवेकशील शुक्ल की याचिका पर न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल और न्यायमूर्ति कृष्णमुरारी की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। याची का कहना है कि विवादित भूमि तत्कालीन जमींदार ने 1942 में उसके पिता को पट्टे पर दी थी, तब से वह भूमि पर काबिज है। पिता की मृत्यु के बाद याची का नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज हो गया। 2006 में एसडीएम ने भूमि को ग्राम सभा की बताते हुए प्राधिकरण में शामिल कर लिया और उसे नोटिस दिए बिना एकपक्षीय रूप से राजस्व अभिलेख से उसका नाम हटा दिया। इस आदेश के खिलाफ राजस्व परिषद में पुनर्निरीक्षण दाखिल किया गया। परिषद ने यथास्थिति का आदेश दिया। इसके बावजूद प्राधिकरण ने दो करोड़ रुपये मूल्य की भूमि एमएलसी नरेश चंद्र उत्तम के बेटे की सोसाइटी को 90 साल के पट्टे पर दे दी। कोर्ट ने कहा कि जब भूमि गांव सभा की नहीं थी तो प्राधिकरण में कैसे निहित हो गई। मौके पर यथास्थिति कायम रखते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। इस संबंध में केडीए के अपर सचिव पीके सिंह ने कहा कि अभी कोर्ट के आदेश की प्रति नहीं मिली है। फैसले का अध्ययन करने के बाद कोर्ट के आदेशानुसार कार्रवाई की जाएगी।
विज्ञापन